लेखक~श्यामनारायण मिश्रा
♂÷ प्रसून जोशी से लेकर मनोज मुंतशिर तक और कुमार विश्वास से लेकर म्यूजिक कंपनी के तुकबाज लफ्फाजों तक को यदि हम शंकराचार्य मान बैठते हैं तो दोष किसका है!?
मुरारी बापू से लेकर जग्गी वासुदेव तक को यदि हम श्रीकृष्ण द्वैपायन व्यास मान बैठते हैं तो दोष किसका है?*
जागरण में पीताम्बर ओढ़े नाचने गाने वालों को यदि हम श्री चैतन्य महाप्रभु का साक्षात् रूप समझ लेते हैं तो दोष किसका है?
राधे माँ से लेकर निर्मल बाबा तक के दरबार में यदि हम अपनी अपनी बुद्धि घर में छोड़कर जाते हैं तो दोष किसका है?
भगवान के दशावतारों से इतर मजार से लेकर कृत्रिम एवं प्रत्यारोपित देवी देवताओं तक में यदि हम अंधस्थ हो जाते हैं तो दोष किसका है?
अपने शास्त्र एवं शास्त्रज्ञों को छोड़कर यदि हम एकता कपूर और आमिर खान आदि को अपना याज्ञवल्क्य मान लेते हैं तो दोष किसका है?
हिन्दू, हिन्दुत्व और हिन्दू मान विन्दुओं का प्रात: उठते ही अपमान करनेवाले के हाथों में आरती की थाल देखते ही इन अवसरवादी मौसमी कीड़ों को यदि हम राजा दिलीप मान बैठते हैं तो दोष किसका है?
मंदिर का विध्वंस कर उसकी मूर्ति को गंगा में फेंक देनेवाले को यदि हम तर्पण करनेवाला गोकर्ण समझ बैठते हैं तो दोष किसका है?
वन, उपवन और नगर में आग लगा देने वाले आततायी राक्षस यदि हमें भगवान विश्वकर्मा लगता है तो दोष किसका है?
प्रभु श्रीराम का मंदिर तोड़ा जाना, लगभग हजार वर्षों तक अपने धर्मस्थलों का एक के बाद एक विध्वंस, अपने नारीवर्ग का घनघोर अपमान उत्पीड़न, धर्मगुरुओं का जिन्दा जलाया जाना, आरा से चीरा जाना, दीवारों में चुना जाना, भारत का विभाजन और सत्य कहने पर भी गला रेता जाना इत्यादि यदि हमारे लिए महत्वहीन हों, लेकिन मुफ्त की थोड़ी सी बिजली, पानी और सुविधा ही जीवन का सर्वस्व प्रतीत होते हों तो फिर दोष किसका है और दोषी कौन है?
नोटों की गड्डी देख और सिक्कों की खनक सुन पैरों में झटपट घुंघरू बांध लेने को तत्पर चरण और चरित्र ही यदि हमें अपने आइकॉन लगते हों और हम उनके अनुचर, खच्चर, जलचर आदि सब बनने के लिए लाइन लगा कर खड़े हो जाते हों तो फिर दोष किसका है और अपराधी कौन है?
सर्कस/सिनेमा हाल/मधुशाला/वेश्यालय में जाकर मंदिर की अनुभूति का और स्विमिंग पुल में नहाकर गंगा स्नान के सुफल का यदि हम भाव या इच्छा रखते हैं तो फिर दोष किसका है?
स्मरण रहे कि भगवान कृष्ण गीता में स्पष्ट कहते हैं कि जो जिसकी पूजा करता है, वह वैसा ही हो जाता है, भूत को पूजने वाला भूत और देवता को पूजने वाला देवत्व को ही प्राप्त होता है! इसलिए दोष भूत का है या उसकी पूजा करने वाले मूढ़मति मानव का?
भगवान राम आदिपुरुष नहीं अनादिपुरुष हैं, आदिपुरुष तो महाराज मनु हैं!!
आदि और अनादि का अंतर तक न समझने वाले या जानबूझकर ऐसा करनेवाले कवि, लेखक, कलाकार आदि ही यदि हमें विद्वान लगने लगें तब तो हम शिकार बनेंगे ही और तब ऐसे में दोष किसका है?
भगवान ने अपनी लीला से हमें यही तो दिखाया है कि यदि ब्रह्मर्षि विश्वामित्र के पीछे उनकी सेवा में जाएंगे तो धर्म की रक्षा भी होगी, स्थापना भी होगी और भगवान शंकर की लीला से सीता विवाह का सुमंगल भी होगा, परन्तु यदि ब्रह्म के बदले भ्रम के हिरण के पीछे जाएंगे तो सीता का हरण ही होगा!
यह भी स्मरण रहे कि भगवान का रामावतार धर्म, शील और मर्यादा की स्थापना के लिए हुआ था! प्रभु लोकमंगल के लिए पधारे थे, लोकरंजन या मनोरंजन के लिए नहीं!
उनकी लीला के उस भाव तक श्रद्धा और भक्ति के बिना पहुँचा ही नहीं जा सकता!!
इसलिए हम अपने व्यास और वसिष्ठ को पहचानें, न कि कालनेमियों को ही व्यास समझने की भूल कर उनके जाल में फंस जाएँ!
फिर भी अपने विपुल वांग्मय के होते हुए भी यदि हम बार बार गड्ढे में गिर जाते हैं तो दोष किसका है, गड्ढे का या हमारी आँखों और बुद्धि का ??

÷लेखक आजमगढ़ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक पद से सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी हैं÷




