लेखक:आदित्य प्रताप
पूरे भारत के अधिवक्ताओं द्वारा झेली जा रही एक दीर्घकालिक और प्रणालीगत कठिनाई को रेखांकित किया गया है अर्थात् पेशेवर फीस की वसूली के लिए किसी प्रभावी विधिक तंत्र का अभाव।
यह विधिक प्रस्तुतीकरण भारत सरकार के विधि एवं न्याय मंत्रालय में दाखिल किया है तथा इसकी प्रतिलिपियाँ बार काउंसिल ऑफ इंडिया, सभी राज्य बार काउंसिलों और देशभर के अधिवक्ता बार एसोसिएशनों को प्रेषित की गई हैं।
मुवक्किलों द्वारा फीस का भुगतान न करना या भुगतान में विलंब करना,इसके कारण अधिवक्ताओं को होने वाला पेशेवर एवं आर्थिक संघर्ष बार में सर्वविदित है। पेशेवर सेवाएँ प्रदान करने के बावजूद, अधिवक्ताओं के पास फीस की शीघ्र और प्रभावी वसूली के लिए कोई सक्षम वैधानिक उपाय उपलब्ध नहीं है।
वर्तमान में, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) को MSME विकास अधिनियम, 2006 की धाराएँ 15 से 20 के अंतर्गत एक समर्पित और त्वरित वसूली तंत्र प्राप्त है, जबकि अधिवक्ताओं के लिए अधिवक्ता अधिनियम, 1961 के अंतर्गत ऐसा कोई तुलनीय उपाय उपलब्ध नहीं है। यह असमानता विशेष रूप से इसलिए गंभीर है क्योंकि अधिवक्ता:
- मुवक्किल के ब्रीफ पर कोई वैधानिक लियन (अधिकार) नहीं रखते,
- मुवक्किल के अनुरोध पर अनापत्ति प्रमाणपत्र (NOC) जारी करने के लिए नैतिक रूप से बाध्य होते हैं, तथा
- पेशेवर आचार संहिता के नियमों के कारण किसी भी प्रकार के दबावपूर्ण वसूली उपाय अपनाने से प्रतिबंधित हैं।
परिणामस्वरूप, बकाया पेशेवर फीस की वसूली के लिए अधिवक्ता के पास एकमात्र कानूनी उपाय सिविल वाद दायर करना रह जाता है, जिसमें:
- पर्याप्त न्यायालय शुल्क का भुगतान,
- वर्षों तक चलने वाली लंबी न्यायिक प्रक्रिया, तथा
- भारी अवसर लागत शामिल है, क्योंकि फीस विवादों में व्यतीत समय को अन्य लाभकारी पेशेवर कार्यों में लगाया जा सकता था।
इससे अधिवक्ताओं को तीन ग़हरी हानि होती है:
- पेशेवर फीस का न मिलना,
- न्यायालय शुल्क के रूप में अतिरिक्त आर्थिक बोझ, और
- उत्पादक पेशेवर समय की हानि।
उपरोक्त परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, मैंने विधि एवं न्याय मंत्रालय से, बार काउंसिल ऑफ इंडिया तथा राज्य बार काउंसिलों के परामर्श से, अधिवक्ता अधिनियम, 1961 के अंतर्गत “अधिवक्ता शुल्क वसूली अधिकरण” (Advocates’ Fee Recovery Tribunal) की स्थापना हेतु विधायी प्रक्रिया प्रारंभ करने का आग्रह किया है।
MSME अधिनियम की धाराएँ 15 से 20 के सिद्धांतों पर आधारित ऐसा अधिकरण अधिवक्ताओं को उनके वैध पेशेवर बकाये की वसूली के लिए एक त्वरित, किफायती और प्रभावी उपाय प्रदान करेगा, साथ ही नैतिक मानकों और मुवक्किलों के अधिकारों की रक्षा भी सुनिश्चित करेगा।
चूँकि अधिवक्ता अधिनियम, 1961 तथा पेशेवर आचार नियम मुवक्किल के ब्रीफ पर किसी प्रकार के लियन को मान्यता नहीं देते, इसलिए एक विशेष वैधानिक मंच की स्थापना केवल वांछनीय ही नहीं, बल्कि पेशेवर गरिमा, आर्थिक सुरक्षा और विधिक पेशे की स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए अत्यावश्यक है।
(लेखक मुम्बई उच्च न्यायालय में वरिष्ठ अधिवक्ता होने के साथ ही आदित्य प्रताप लॉ ऑफिसेस के संस्थापक हैं)




