(मनोज श्रीवास्तव)
(लखनऊ)
राजा साहब बाँदा कुर्की में जिसके घर टीन की थाली, पतेली और बर्तन मिले थे वह हमको बता रहे हैं,शायद सदन की कार्यवाही में मिल जाये।
बस यही याद है कि यही कह कर बसपा सरकार के कद्दावर मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी को विधानसभा में विपक्ष में रह कर अपने तीखे तेवरों से आजम खान ने सदन में पस्त किया था। समय का चक्र देखिये आजमखान जेल में हैं,रविवार को नसीमुद्दीन सिद्दीकी समाजवादी पार्टी की महफिल लूट रहे हैं।
पार्टी मुखिया अखिलेश यादव स्वयं उन्हें अपने साथ लेकर पार्टी कार्यालय पहुंचे। नसीमुद्दीन सिद्दीकी रविवार को समाजवादी पार्टी में यह कहते हुये शामिल हो गये कि नेता जी (मुलायम सिंह याद) को वह हमेशा अपना नेता मानते थे।सबसे बड़ा प्रश्न यह उठता है कि क्या मायावती की पार्टी केवल गद्दारों से पटी रही,नसीमुद्दीन सिद्दीकी कितना सच बोल रहे हैं।
मंत्री होते थे मायावती सरकार में, बसपा छोड़ा तो कांग्रेस में चले गये,बड़ी-बड़ी डींग मार कर कांग्रेस में गये थे। जब कांग्रेस में फुस्स पटाखा हो गये तो वहां भी हाशिये पर ढकेल दिये गये। जानकारों की मानें तो नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने समाजवादी पार्टी में घुसने के लिये हर वह उद्यम किया जो एक हतोत्साहित नेता करता है। बसपा से सपा में आये लालजी वर्मा, राम प्रसाद चौधरी, राजेन्द्र चौधरी, अंबिका चौधरी के बाद बसपा से कांग्रेस वहां से समाजवादी पार्टी में पहुंच कर नसीमुद्दीन सिद्दीकी क्या वह राजनैतिक सम्मान स्थापित कर पायेंगे जो बसपा में रहते हुये बसपा सुप्रीमो मायावती ने दिया था। मन मे बस यही सवाल है कि आदमी का असली रूप क्या है,जिन दलबदलुओं को लेकर अखिलेश यादव वर्ष 2027 में सरकार बनाने की सोच रहे हैं कहीं वह समाजवादी पार्टी के वफादार कार्यकर्ताओं को बगावत की राह पर चलने को न मजबूर कर दे। अपने सपने को सच करने के लिये कहीं अखिलेश यादव अपने उन रणबांकुरों के भविष्य से तो नहीं खेल रहे जिनके कारण वह इस सौदेबाजी के लायक बने हैं। भाजपा-बसपा से निकले नेताओं को सपा में शामिल कराने में कोई दिक्कत नहीं थी। लेकिन सहयोगी कांग्रेस के नेताओं को सपा में शामिल करना अखिलेश यादव को वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव में भारी न पड़ जाये क्योंकि कुछ कांग्रेस के नेता इसे पीठ में छुरा घोंपना मान रहे हैं।



