भारतीय जनता पार्टी ने अन्ततः लंबे मंथन के बाद महाराजगंज से सांसद और केन्द्रीय वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी को उत्तर प्रदेश भाजपा का अध्यक्ष बना दिए गए हैं। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद कौन के सवाल पर अलग—अलग नेताओं के महत्वाकांक्षा की जंग से जूझ रही भाजपा की राजनीति में यूपी की राजनीति होल्ड पर है। पंकज चौधरी नंबर एक प्रधानमंत्री की पसंद हैं नंबर दो की नहीं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यूपी में असली खेला बाकी है?
बहरहाल इन नियुक्ति से कई सवाल खड़े हो रहे हैं—
— मसलन क्या सीएम योगी आदित्यनाथ को अभयदान मिल गया है?
— क्या संघ की बात मान कर पीएम मोदी अब अपनी पसंद का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनवा लेंगे?
— क्या प्रधानमंत्री मोदी की 2029 की राह आसान हो गई है?
यह सवाल इसलिए कि संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि उनका उत्तराधिकारी कौन होगा, इसका फैसला खुद मोदी और भाजपा लेगी।
— अब केशव मौर्या का क्या होगा?
— केंद्रीय नेतृत्व के मार्गदर्शन से एक इंच इधर से उधर नहीं होने वाले निवर्तमान अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी का क्या होगा?
सवाल यह भी है कि क्या पंकज चौधरी यूपी की सियासत में इस स्थिति में हैं कि योगी आदित्यनाथ को टक्कर दे पाएंगे। ठीक है कि चौधरी कई बार के सांसद हैं, दो बार के केंद्रीय मंत्री हैं। यादवों के बाद ओबीसी की सबसे बड़ी जाति कुर्मी वर्ग से हैं हालांकि मुझे नहीं लगता कि पूरा उत्तर प्रदेश जानता है। यह ठीक है कि उनकी पहचान मृदुभाषी राजनेता की है मगर उनसे पहले स्वतंत्र देव सिंह अपनी कोई छाप नहीं छोड़ पाए। उनकी सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि प्रशासन से पीड़ित ओबीसी वर्ग के लिए वह कोई रास्ता निकाल पाते हैं या नहीं। 69 हजार शिक्षक भर्ती मामले का कोई समाधान दे पाते हैं या नहीं। उन पर ओबीसी वर्ग का बड़ा दबाव होगा।
नई सियासी परिस्थितयों में लगता है कि उप मुख्यमंत्री केशव मौर्य दिल्ली आएंगे और प्रदेश को दो नए डिप्टी सीएम मिलेंगे। पश्चिम और जाट राजनीति को साधने के लिए भूपेंद्र चौधरी की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।
फिर अहम पक्ष यह है कि योगी भाजपा का हिंदुत्व, राष्ट्रवाद और कानून व्यवस्था का सख्ती से पालन करने वाले सबसे अहम चेहरा हैं। मोदीजी ने भाजपा को ब्राहृमण—बनिया चेहरे से मुक्ति दिलाई। औबीसी, दलितों में पार्टी का अपना अलग आधार तय किया। हालांकि कानून व्यवस्था, राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के मामले में योगी की देश की राजनीति में अलग पहचान है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक के चुनाव में उनकी मांग सबसे ज्यादा है। वर्तमान राजनीति में बेहतर कानून व्यवस्था भी अहम वोट बैंक है। अहम वोट बैंक इसलिए कि यह जाति से ही परे नहीं बल्कि कई मामलों में धर्म से भी परे है।
कुल मिला कर पंकज चौधरी को उत्तर प्रदेश का बीजेपी अध्यक्ष बनाने के बाद भाजपा को कई अहम फैसले लेने हैं। यूपी में कौन किस पर भारी पड़ा, इस सवाल का जवाब जानने के लिए हमें खरमास खत्म होने का इंतजार करना होगा। खरमास के बाद मोदी मंत्रिमंडल और मोदी मंत्रिमंडल में विस्तार के बाद स्थिति बहुत हद तक साफ होगी,इससे पहले भाजपा अपना राष्ट्रीय अध्यक्ष भी तय करेगी।
इन निर्णयों से पता चलेगा कि वाकई भाजपा की राजनीति किस धुरी पर घूम रही है।

(लेखक अमर उजाला समाचार पत्र में नेशनल ब्यूरो के पद पर नई दिल्ली में कार्यरत हैं)




