लेखक: उपेन्द्र सिंह राठौड़
संगठन को कोसने से पहले स्वयं से पूछें—पत्रकार हितों के संघर्ष में हमारा योगदान कितना है?

आजकल पत्रकारिता जगत में एक विचित्र परिपाटी विकसित होती दिखाई दे रही है। जब भी किसी पत्रकार के सामने विपरीत परिस्थितियां उत्पन्न होती हैं अथवा पत्रकार हितों से जुड़ा कोई विषय सामने आता है, तो उसके समाधान के लिए सामूहिक विचार-विमर्श करने और एकजुट होकर संघर्ष की रणनीति बनाने के स्थान पर पत्रकार संगठनों को कोसने तथा उनमें कमियां निकालने का सिलसिला प्रारंभ हो जाता है।इस प्रवृत्ति का सबसे हास्यास्पद पहलू यह है कि कई बार संगठनों की कार्यप्रणाली पर सबसे अधिक प्रश्नचिह्न वही लोग लगाते दिखाई देते हैं, जिनका पत्रकार संगठनों से दूर-दूर तक कोई सक्रिय संबंध नहीं रहा होता। संभव है, उन्होंने कभी औपचारिकता निभाने के लिए किसी संगठन की एकाध बार सदस्यता अवश्य ग्रहण कर ली हो, लेकिन संगठन की गतिविधियों, बैठकों, आंदोलनों अथवा पत्रकार हितों के संघर्ष में उनकी भागीदारी लगभग शून्य रही होती है।इसके बावजूद उनकी अपेक्षाएं ऐसी होती हैं, मानो पत्रकार संगठनों के पदाधिकारी उनके अधीनस्थ कर्मचारी हों, जो उनके एक इशारे पर किसी जिन्न की तरह प्रकट होकर उनकी प्रत्येक समस्या का तत्काल समाधान कर दें।आखिर ऐसे लोगों को यह सामान्य-सी बात कौन समझाए कि पत्रकार संगठन कोई जादुई व्यवस्था नहीं, बल्कि पत्रकारों द्वारा, पत्रकारों के लिए संचालित एक सामूहिक शक्ति का नाम है।संगठन की वास्तविक शक्ति उसके पदाधिकारियों के नाम, पद अथवा संख्या में नहीं, बल्कि उससे जुड़े पत्रकारों की सक्रियता, एकजुटता, समर्पण और संघर्षशीलता में निहित होती है।जब पत्रकार स्वयं ही निष्क्रिय हो जाएंगे, संगठन की गतिविधियों से दूरी बना लेंगे और सामूहिक जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ लेंगे, तो फिर संगठन के प्रभावशाली होने की अपेक्षा किस आधार पर की जा सकती है?संकट में संगठन की याद, संघर्ष के समय दूरी क्यों?यह प्रश्न भी अत्यंत विचारणीय है कि कुछ पत्रकारों को संगठन की उपयोगिता केवल तभी क्यों याद आती है, जब परिस्थितियां उनके प्रतिकूल हो जाती हैं?जब पत्रकार संगठन पत्रकार सुरक्षा कानून, पत्रकारों की आजीविका, सम्मान, स्वतंत्रता और अन्य लंबित मांगों को लेकर संघर्ष का आह्वान करते हैं, जब सड़कों पर उतरने, धरना-प्रदर्शन करने अथवा सरकार के समक्ष सामूहिक शक्ति प्रदर्शित करने का अवसर आता है, तब संगठन की आलोचना करने वाले इन तथाकथित जागरूक पत्रकारों का कहीं अता-पता तक नहीं चलता।उस समय न तो उनकी सक्रियता दिखाई देती है और न ही सोशल मीडिया पर उनके वे बड़े-बड़े विचार और क्रांतिकारी वक्तव्य नजर आते हैं, जो विपरीत परिस्थितियों में संगठनों को कटघरे में खड़ा करने के लिए अचानक सामने आने लगते हैं।यह कैसी विडंबना है कि संगठन से अधिकारों की अपेक्षा तो सभी को है, लेकिन संगठन के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन करने के लिए बहुत कम लोग आगे आते हैं।हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि किसी भी संगठन के पदाधिकारी भी उसी पत्रकार समाज का हिस्सा होते हैं। वे भी अपनी व्यक्तिगत, पारिवारिक और व्यावसायिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए संगठन के लिए समय निकालते हैं। अनेक अवसरों पर उन्हें अपने संसाधनों, समय और व्यक्तिगत हितों का त्याग भी करना पड़ता है।ऐसे में उनसे हर परिस्थिति में तत्काल उपस्थित होने की अपेक्षा रखना, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर उन्हें अपना सहयोग तक नहीं देना, आखिर किस प्रकार की संगठनात्मक सोच का परिचायक है?अधिकारों की अपेक्षा से पहले कर्तव्यों का निर्वहन भी आवश्यकमेरा यह मानना है कि पत्रकार संगठनों की कार्यप्रणाली पर प्रश्न उठाना कोई अनुचित बात नहीं है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में आलोचना, समीक्षा और जवाबदेही का अपना महत्व है। पत्रकार संगठनों के पदाधिकारी भी आलोचना से परे नहीं हो सकते।लेकिन आलोचना और अनावश्यक दोषारोपण में अंतर होना चाहिए।रचनात्मक आलोचना संगठन को मजबूत बनाती है, जबकि बिना तथ्यों और सहभागिता के केवल दोषारोपण करने की प्रवृत्ति संगठनात्मक एकता को कमजोर करती है।जो लोग वास्तव में पत्रकार संगठनों को प्रभावशाली देखना चाहते हैं, उन्हें केवल कमियां गिनाने के बजाय उनके समाधान में भी अपनी भूमिका सुनिश्चित करनी चाहिए।संगठन से सवाल पूछने का नैतिक आधार तब और मजबूत होता है, जब सवाल पूछने वाला स्वयं भी संगठन के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का ईमानदारी से निर्वहन करता हो।पत्रकार संगठनों के पदाधिकारी किसी के व्यक्तिगत सेवक अथवा अधीनस्थ नहीं हैं। वे सामूहिक हितों के लिए जिम्मेदारी निभाने वाले साथी हैं। उनसे सहयोग की अपेक्षा करना स्वाभाविक है, लेकिन उस सहयोग को अपना एकतरफा अधिकार समझ लेना उचित नहीं है।एकजुटता भाषणों से नहीं, सहभागिता से सिद्ध होती हैआज पत्रकारिता जिन चुनौतियों से गुजर रही है, उनमें पत्रकारों की सुरक्षा, आजीविका, स्वतंत्रता और सम्मान से जुड़े प्रश्न पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं।ऐसे समय में पत्रकारों का आपसी बिखराव और संगठनों के प्रति अविश्वास किसी एक व्यक्ति अथवा संगठन का नहीं, बल्कि समूचे पत्रकार समाज का नुकसान है।हमें यह समझना होगा कि जब किसी एक पत्रकार के अधिकारों का हनन होता है, तो वह केवल उसका व्यक्तिगत संकट नहीं होता, बल्कि भविष्य में अन्य पत्रकारों के लिए भी ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न होने की आशंका का संकेत होता है।इसलिए किसी भी पत्रकार के साथ अन्याय होने पर संगठन और पत्रकार समाज को एकजुट होना चाहिए। लेकिन यह एकजुटता केवल संकट के समय की अपेक्षा बनकर नहीं रहनी चाहिए, बल्कि सामान्य परिस्थितियों में भी संगठन के प्रति सक्रिय सहभागिता के रूप में दिखाई देनी चाहिए।जो पत्रकार संगठन के संघर्ष में साथ खड़ा नहीं होता, उसे कम से कम यह आत्ममंथन अवश्य करना चाहिए कि वह संकट के समय संगठन से किस नैतिक आधार पर असीमित अपेक्षाएं रख रहा है।संगठन को कमजोर करके पत्रकार मजबूत नहीं हो सकतेमेरा ऐसे सभी पत्रकार साथियों से विनम्र लेकिन स्पष्ट आग्रह है कि जब भी पत्रकार हितों से जुड़ा कोई विषय सामने आए, तो उसे व्यक्तिगत प्रतिष्ठा, आपसी मतभेद अथवा आरोप-प्रत्यारोप का विषय बनाने के बजाय सामूहिक जिम्मेदारी के रूप में स्वीकार करें।एक-दूसरे की भावनाओं, परिस्थितियों और योगदान का सम्मान करें। मतभेद हों तो संवाद करें, कमियां हों तो सुधार के सुझाव दें और संघर्ष की आवश्यकता हो तो स्वयं आगे बढ़कर भागीदारी सुनिश्चित करें।यह भी स्मरण रखें कि संगठन की शक्ति केवल उसके पदाधिकारियों से नहीं, बल्कि उसके प्रत्येक सक्रिय सदस्य से निर्मित होती है।यदि हम स्वयं ही संगठन से दूरी बनाकर रखेंगे, उसके आह्वान की उपेक्षा करेंगे और संकट आने पर उसी संगठन को दोषी ठहराएंगे, तो परिणाम वही होंगे जो अब तक होते आए हैं।संगठन को कमजोर करके कोई पत्रकार स्वयं को मजबूत नहीं बना सकता।अंततः हमें यह स्वीकार करना होगा कि पत्रकार संगठन कोई जिन्न नहीं है, जिसे आवश्यकता पड़ने पर याद किया और काम निकल जाने पर भुला दिया जाए।संगठन विश्वास है, सहयोग है, समर्पण है और सामूहिक संघर्ष की वह शक्ति है, जो तभी प्रभावशाली बनती है, जब उसके साथ जुड़े लोग केवल अधिकारों की अपेक्षा नहीं, बल्कि अपने कर्तव्यों का भी निर्वहन करते हैं।याद रखिए—संगठन से शक्ति मांगने से पहले संगठन की शक्ति बनना सीखिए।संकट में साथ की अपेक्षा करने से पहले संघर्ष में साथ खड़ा होना सीखिए।क्योंकि संगठन किसी एक पदाधिकारी का नहीं, हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी का नाम है।(राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं राजस्थान प्रदेशाध्यक्षइंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स (IFWJ) )




