लेखक: हिमांशु मिश्र
नीतीश मनमौजी हैं, उन्होंने
वर्ष 2015 में भी करीबी लोगों से कहा था, ज्यादा परेशान न हो, दस साल में बिहार के लिए इतना किया है कि राज्य के लोग मुझे गाली नहीं देंगे।
उसके बाद दस साल और गुजर गए। इस बीच नीतीश कुमार ने दो बार राजद का साथ पकड़ा। फिर उनकी राजग में घर वापसी हुई, मगर राज्य की सियासत में उनका रुतबा अब भी बुलंद है। अभी भी यही स्थिति है। नीतीश को वोट नहीं देने वालों के मन में भी उनके लिए सम्मान है,यह सम्मान क्यों है?
जिस राज्य की पहचान जाति हो, उस सरकार के मुखिया की जाति से बीते दो दशक में एक भी बाहुबली नहीं। इस दौरान किसी ने नहीं कहा कि सरकार के मुखिया की जाति के दबंगों ने उनका जीना मुहाल कर दिया है। जमीन पर कब्जा कर लिया है। सरकार में उसी जाति का दबदबा है। थाना और प्रशासन में उसी जाति का कब्जा है। संजय झा, ललन सिंह की तमाम कोशिश के बावजूद नीतीश ने अपने पुत्र निशांत को अपना उत्तराधिकारी घोषित करना तो दूर चुनाव तक लड़ने नहीं दिया। बीते साढ़े तीन दशक की बिहार की राजनीति में नीतीश इस मामले में अजूबा हैं।
अब चुनावी जंग की शुरुआत के बाद बिहार कई नए सियासी संदेश दे रहा है। नीतीश एकबार फिर से नए रूप में हैं। पीएम मोदी के साथ जनसभा तो छोड़िये, राज्य की राजधानी पटना में प्रधानमंत्री के रोड शो से भी उन्होंने दूरी बरत ली। लगता है चुनाव बाद नीतीश कुमार एक बार फिर राजनीति की नई इबारत लिखने के लिए तैयार हैं। सवाल है कि क्या चुनाव के बाद दुश्मन दोस्त हो जाएंगे और दोस्त दुश्मन! किसके साथ किसकी दोस्ती दुश्मनी और दुश्मनी दोस्ती में बदल जाएगी!
हां, भाजपा से चुनाव में बड़ी चूक हुई है। उसे सम्मान के साथ नीतीश को राजग के मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करना चाहिए था। ऐसा करते तो भाजपा के नेताओं को हर जनसभा और प्रेस कांफ्रेंस में नीतीश ही मुख्यमंत्री होंगे का गाना नहीं गाना पड़ता। मोदी—नीतीश की जोड़ी हिट होती। नीतीश को नेता घोषित करते तो राजग के लिए तमाम किंतु—परंतु के बाद लड़ाई आसान होती। भाजपा की इस एक गलत कदम ने मुकाबले को रोमांचक बना दिया है। नीतीश समर्थक वोट बैंक में जमीनी स्तर पर असमंजस की स्थिति है। भाजपा समझ नहीं पाई कि राज्य में उसके पास नेता नहीं है। जिन नेताओं को खड़ा करने की कोशिश की उसका पानी प्रशांत किशोर ने उतार दिया है। सम्राट चौधरी, मंगल पांडे, दिलीप जायसवाल जैसे उनके द्वारा तैयार किए गए नेताओं से जुड़े सवाल भाजपा के लिए चुनौती बन गए हैं।
अब सवाल है कि आगे क्या होगा? जाहिर तौर पर राजग को बहुमत मिला तो नीतीश एक बार फिर मुख्यमंत्री बनेंगे। खंडित जनादेश की स्थिति में भी नीतीश के बिना न तो भाजपा का काम बनेगा और न ही विपक्षी महागठबंधन का। कुल मिला कर दो दशक बाद भी बिहार की सियासत के केंद्र में नीतीश हैं। मतलब राजग को बहुमत मिलने या खंडित जनादेश की स्थिति में भी किसी के पास नीतीश का विकल्प नहीं होगा।
हां, इस चुनाव के बाद बिहार की सियासत में या तो जदयू का अस्तित्व रहेगा या राजद का। जो दल सत्ता से दूर हुआ, वह अतीत बन जाएगा। हार की स्थिति में तेजस्वी के लिए पारिवारिक विवाद संभाले नहीं संभलेगा। इसी स्थिति में जदयू में आया राम गया राम की परिस्थिति पैदा होगी। राजग की हार की स्थिति में केंद्र में मोदी सरकार मजबूत हो जाएगी। जदयू के 12 में से अधिकांश सांसद भाजपा में शामिल होंगे, जिससे मोदी सरकार पर चंद्रबाबू नायडू का दबाव कम हो जाएगा।

(लेखक अमर उजाला समाचार पत्र में नेशनल ब्यूरो के पद पर नई दिल्ली में कार्यरत हैं)




