लेखक -अरविंद जयतिलक
महीनों बातचीत के उपरांत आखिरकार भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील का फ्रेमवर्क सामने आ गया है। अमेरिकी टैरिफ घटने से बाजार की गतिशीलता बढ़ गई है और कारोबार का पहिया नाच उठा है। दोनों देशों के कारोबारियों के माथे पर जो द्विपक्षीय व्यापारिक तनाव की शिकन थी अब वह उत्साह में तब्दील होने लगी है। आर्थिक संबंधों की नई उर्जा के प्रवाह ने निर्यात के उछाल की उम्मीद को जगा दी है। माना जा रहा है कि टैरिफ घटने से बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर सृजित होंगे और आर्थिक समृद्धि के द्वार खुलेंगे। भरोसे का संकट खत्म होता हुआ साफ दिख रहा है जिससे संबंधों के एक नए युग की नींव की उम्मीद की जा सकती है। उल्लेखनीय है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड टं्रप ने जुलाई 2025 में 25 फीसदी टैरिफ का ऐलान किया था और उसके बाद रुसी तेल खरीद पर अतिरिक्त 25 फीसदी पेनॉल्टी लगाकर टैरिफ को 50 फीसदी कर दिया था। इससे न केवल भारत की मुश्किलें बढ़ी थी बल्कि अमेरिकी बाजार भी अनिश्चितता का भेंट चढ़ने लगा था। कहना गलत नहीं कि टैरिफ बढ़ाने का खामियाजा अमेरिका को ही भुगतने की नौबत आन पड़ी थी। कारण अमेरिका में न सिर्फ महंगाई बढ़ने लगी थी बल्कि उसे कम जीडीपी और डॉलर के कमजोर होने का खतरा भी उत्पन हो गया था। टैरिफ के सप्लाई-साइड इफेक्टस और एक्सचेंज रेट में बदलाव का नकारात्मक असर भी अमेरिकी बाजार पर साफ दिखने लगा था। लेकिन इस ट्रेड डील के बाद अमेरिका से आने वाले सभी औद्योगिक सामनों पर भारत का आयात शुल्क खत्म हो जाएगा। कैंसर हार्ट, न्यूरो संबंधी बीमारी की दवाओं और बच्चों के इलाज में काम आने वाली दवाओं पर भी शुल्क खत्म हो जाएगा। निःसंदेह इससे अमेरिकी कारोबारियों को बड़े पैमाने पर फायदा होगा। इस ट्रेड डील के फ्रेमवर्क पर नजर दौड़ाएं तो भारत आने वाले पांच वर्षों में अमेरिका से 500 बिलियन डॉलर के तेल व गैस समेत उर्जा-उत्पाद, विमान के पूर्जे, सोना, कीमती धातुएं, तकनीकी-उत्पाद और कोकिंग कोल खरीदेगा। भारत और अमेरिका ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट के अलावा डेटा सेंटर्स में उपयोग होने वाली दूसरी चीजों के व्यापार को बढ़ाएंगे। निःसंदेह इससे अमेरिका को बड़े पैमाने पर लाभ होगा। चूंकि यहां ध्यान देना होगा कि भारत ने यूरोपीय संघ से ट्रेड डील करके अमेरिका को संकेत दे दिया था कि भारत का बाजार सिर्फ अमेरिकी बाजार के भरोसे नहीं है। ऐसे में अमेरिकी राष्ट्रपति के पास भारत पर टैरिफ कम करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचा था। ऐसे में अमेरिका पर ट्रेड डील का दबाव बढ़ गया था। यह अच्छी बात रही कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड टं्रप ने इस तथ्य और सच्चाई को समझा और भारत पर से 50 फीसदी टैरिफ घटाकर 18 फीसदी कर दिया। रुस के साथ तेल व्यापार के चलते लगाया गया अतिरिक्त 25 फीसदी टैरिफ भी पूरी तरह खत्म कर दिया गया है। सकल आंकलन करें तो तकरीबन 32 फीसदी टैरिफ की राहत मिली है। इससे अमेरिका में कारोबार करने वाली भारत की बड़ी कंपनियों की मार्जिन में सुधार होगा और उनकी माली सेहत भी सुधरेगी। गौर करें तो पहले भारत पर अमेरिकी टैरिफ 3 से 4 फीसदी हुआ करता था। निःसंदेह 18 फीसदी टैरिफ भारत के लिए बड़ी चुनौती है। लेकिन यह चुनौती एक अवसर का द्वार भी खोलती है, जो भारत को अपने निर्यात ढ़ांचे को अधिक विविधतापूर्ण और प्रतिस्पर्धी बनाने में मदद मिलेगी। अब भारत को दीर्घकालिक रणनीति के रोडमैप को मूर्त रुप देकर वैश्विक कारोबारी चुनौतियों से पार पाना होगा। यहां अच्छी बात यह है कि दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले भारत पर अभी भी टैरिफ कम है। उदाहरण के लिए भारत पर बांग्लादेश और वियतनाम से 2 फीसदी टैरिफ कम है। यह हमारे टेक्सटाइल्स और फूटवियर सेक्टर के लिए वरदान सरीखा है। ऐसा इसलिए कि वैश्विक बाजार में विशेषकर अमेरिकी बाजार में इन दोनों देशों से टेक्सटाइल्स और फूटवियर सेक्टर में कड़ी चुनौती मिलती है। अब हम बेहतर उत्पाद और कम टैरिफ के साथ अमेरिकी बाजार में अपनी पकड़ मजबूत कर सकते हैं। इसी तरह चीन की तुलना में भी भारत पर टैरिफ कम है। इस कारण चीन से हमें अतिरिक्त डिमांड मिलने की संभावना प्रबल हो गई है। गौर करें तो अमेरिका ने जिन सेक्टरों पर टैरिफ घटाया है वे हमारे श्रम-उत्पाद निर्यात की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण हैं। इन सेक्टरों से हम बड़े पैमाने पर अपने उत्पादों को अमेरिका निर्यात करते हैं। इनमें रेडिमेड गारमेंट, जूलरी, झींगा मछली, हीरे-जवाहरात, इंजीनियरिंग सामान, कीमती पत्थर इत्यादि प्रमुख हैं। कर कम होने से वस्त्र और परिधान, चमड़ा और जूते, प्लास्टिक और रबर, जैविक रसायन, गृहसज्जा, हस्तशिल्प उत्पाद जैसे भारत के श्रम-प्रधान क्षेत्रों और कुछ मशीनरी के निर्यात को व्यापक बढ़ावा मिलेगा। गौर करें तो अमेरिकी टैरिफ घटने से सोने-चांदी की जूलरी पर 25 फीसदी, रेडिमेड गारमेंट पर 37 फीसदी, कालीन पर 13.7 फीसदी, बेडशीट पर्दे पर 27 फीसदी और झींगा तथा हीरे पर 7 फीसदी टैरिफ कम हुआ है। इससे इन सेक्टरों के उत्पादों के लागत में कमी आएगी और डिमांड बढ़ेगा। जेनेरिक दवाओं, रत्नों, हीरों और विमानों के कल पूर्जों सहित कई प्रकार की वस्तुओं का टैरिफ शुन्य हो गया है जिससे भारतीय कारोबारियों को बड़े पैमाने पर फायदा होगा। साथ ही भारत की निर्यात प्रतिस्पर्धी क्षमता और ‘मेक इन इंडिया’ और बढ़ावा मिलेगा। टैरिफ में कमी का सीधा फायदा भारत के उन उद्योगों को मिलेगा जहां बड़ी संख्या में श्रमिक काम कर रहे हैं। दूसरी ओर टैरिफ कम होने से भारतीय उपभोक्ताओं को लैपटॉप, मोबाइल, गैजेट्स, कंप्यूटर, इलेक्ट्रॉनिक्स और उनके पार्टस कम कीमत पर उपलब्ध होगा। गौर करना होगा कि अमेरिका ने सेक्शन 232 के तहत स्टील और एल्युमिनियम पर 50 फीसदी टैरिफ पूरी दुनिया के लिए लगाया है लिहाजा उतना ही भारत पर भी है। ट्रेड डील पर फ्रेमवर्क सामने आने से अब विदेशी निवेशक भी भारत की ओर रुख तेज करेंगे। विशेष रुप से अमेरिकी निवेशकों का भारतीय बाजार पर भरोसा बढ़ेगा। ऐसा इसलिए कि भारत और अमेरिका के बीच आर्थिक संबंध वर्तमान में अपने सबसे मजबूत दौर में है। वर्ष 2000 से वर्ष 2025 के बीच अमेरिका भारत में तीसरा सबसे बड़ा विदेशी निवेशक रहा है, जिसमें 70.65 अरब डॉलर से अधिक का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आया है। वित्त वर्ष 2024-2025 में भारत और अमेरिका के बीच 186 बिलियन डॉलर का व्यापार हुआ है। इस दौरान भारत ने अमेरिका से सिर्फ 45.30 बिलियन डॉलर का आयात किया है जबकि 140 बिलियन डॉलर का निर्यात किया है। यह रेखांकित करता है कि यह दिपक्षीय व्यापार और संतुलन भारत के पक्ष में है। अच्छी बात यह है कि ट्रेड डील में भारत ने अपने संवेदनशील क्षेत्रों मसलन कृषि और डेयरी सेक्टर के हितों की रक्षा सुनिश्चित करने में सफल रहा है। इसे लेकर ढ़ेर सारी आशंकाएं जताई जा रही थी। लेकिन कॉमर्स एंड इंडस्ट्री मिनिस्टर पीयूष गोयल ने दो टूक कहा कि देश के किसानों और दुग्ध उत्पादकों के हित सुरक्षित रहेंगे। दोनों देशों के बीच संपन्न डील के फ्रेमवर्क पर नजर दौड़ाएं तो ऐसा ही होता दिखा है। मसलन मक्का, गेहूं, चावल, सोया, मुर्गी पालन, दूध, पनीर, एथेनॉल, तंबाकू समेत सब्जियां और मांस आदि संवेदनशील कृषि और डेयरी उत्पादों को पूरी तरह से संरक्षित किया गया है। मतलब साफ है कि भारत के किसान जिन कृषि उपजों को बड़े पैमाने पर उपजाते हैं और जिनमें आत्मनिर्भर हैं उन उपजों को अमेरिका से आयात नहीं किया जाएगा। यानी कह सकते हैं कि उन वस्तुओं को ट्रेड डील से बाहर रखा गया है। हां, यह सही है कि भारत ने अपने हितों को दृष्टिगत रखते हुए उन वस्तुओं के लिए अपना बाजार जरुर खोला है जिनके लिए हम आज भी अमेरिका अथवा दूसरे देशों पर निर्भर हैं। बहरहाल कुल मिलाकर यह ट्रेड दोनों देशों के हित में है। ऐसे में उम्मीद किया जाना चाहिए कि इस ट्रेड डील से दोनों देशों के कारोबारी रिश्ते को नई ऊंचाई मिलेगी और आर्थिक समृद्धि बढ़ेगी।

(लेखक राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं)




