संसद मे बजट सत्र का पहला चरण हुई कई घटनाओं का गवाह बना है और इस दौरान जिस प्रकार से संसदीय गरिमा और मर्यादाओं को तार तार होते देखा गया है, उसकी पृष्ठभूमि में देश की राजनीति के गिरते स्तर की तस्वीर साफतौर से नजर आई है। हालांकि ये पहला मौका नहीं है जब सत्ता पक्ष और विपक्ष का टकराव सामने आया हो। पिछले कई दशकों से संसद सत्रों के दौरान कामकाज कम और विभिन्न मुद्दों पर टकराव ज्यादा रहा है। ऐसे में सवाल है कि संसद सत्रों के दौरान लोकतांत्रिक जवाबदेही के बजाय टकराव की वजह से विधायी कार्यों, बजट चर्चाओं और महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा तक नहीं हो पाती, तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है? खासतौर पर जब लोकसभा में मौजूदा बजट सत्र में राष्ट्रपति अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर परंपरा के अनुसार प्रधानमंत्री का संबोधन तक नहीं हो सका हो।
भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में विधायी प्रक्रिया की प्रभावशीलता और लोकतांत्रिक जवाबदेही के लिहाज से संसद की बैठकों की संख्या में लगातार हो रही कटौती भी राजनीति के गिरते स्तर का कारण मानी जा सकती है। संसद की संस्थागत शक्तियों और लोकतंत्र को कमजोर करने की वजह भी बिगड़ती राजनीतिक तस्वीर है, जो महज चुनाव जीतने के स्वार्थ तक सिमित होने लगी है। इसी कारण से संसद या विधान मंडलों में विधायी कामकाज, बहस और जवाबदेही स्वत: ही कमजोर हो रही है, जो लोकतांत्रिक दृष्टि से एक बेहद बड़ी चिंता का विषय ही नहीं है, बल्कि हमारा लोकतंत्र और ज्यादा शर्मसार होता है। संसद सत्र के दौरान हाल ही में लोकसभा में प्रधानमंत्री के राष्ट्रपति अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर संबोधन से पहले विपक्ष की कुछ महिला सांसद हाथों में पारे लिखी तख्तियां लेकर प्रधानमंत्री की सीट के पास पहुंच गई थी, जिसके कारण लोकसभा स्पीकर के आग्रह पर पीएम सदन में नहीं आये। संसद में पिछले 22 सालों में ऐसी दूसरी घटना हुई, जब संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर प्रधानमंत्री धन्यवाद प्रस्ताव पर लोकसभा में अपना संबोधन नहीं कर पाए। इसका कारण लोकसभा स्पीकर ने अगले दिन पीएम की सुरक्षा का हवाला देकर स्पष्ट कर दिया था। स्पीकर ने सदन में सत्ता पक्ष और विपक्ष का टकराव के कारण पीएम के साथ सदन में कोई अप्रिय घटना होने की आशंका से उनसे सदन में न आने का आग्रह किया था। हालांकि अगले दिन राज्यसभा में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर अपनी बात रखी। इससे पहले 10 जून 2004 को तत्कालीन प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह विपक्षी दल राजग के विरोध के सामने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर अपनी बात सदन में नहीं रख सके थे।
लोकसभा अध्यक्ष से खफा विपक्ष
सदन के भीतर और बाहर वैसे तो सत्ता पक्ष और विपक्ष के एक दूसरे के खिलाफ आरोप प्रत्यारोप चलता रहा है, लेकिन लोकसभा में एक दूसरी बड़ी घटना हुई, जब राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी 2020 के चीन गतिरोध पर पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल एमए नरवणे की अप्रकाशित आत्मकथा का हवाला देना चाहते थे, लेकिन लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने नियमों का हवाला देकर उन्हें इस पुस्तक पर बोलने की इजाजत नहीं दी, तो कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी दलों के सांसदों ने सदन में प्रधानमंत्री और केंद्र सरकार के खिलाफ नारेबाजी शुरु कर दी थी। सदन में विपक्षी नेता राहुल गांधी की बार-बार की अड़चनों और विवादों के कारण संसदीय कार्यवाही में भी तनाव के चलते अध्यक्ष ओम बिरला को हस्तक्षेप करना पड़ा, तो विपक्ष उनसे इतना खफा नजर आया कि संसद में सरकार और विपक्ष के बीच टकराव विकराल रुप लेता नजर आया कि विपक्ष ने लोकसभा अध्यक्ष पर सदन की कार्यवाही में पक्षपात पूर्ण रवैया अपनाने का आरोप लगाते हुए 118 सांसदों के हस्ताक्षरों के साथ लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस ही दे दिया। इससे पहले विपक्ष सदन में कांग्रेस समेत आठ सांसदों को अनुशासनहीन व्यवहार के चलते बजट सत्र की शेष अवधि के लिए निलंबित करने से नारज था। दूसरी तरफ भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के खिलाफ विशेषाधिकार प्रस्ताव का मुद्दा उठाते हुए आरोप लगाया कि राहुल गांधी के सोरोस फाउंडेशन और फोर्ड फाउंडेशन से संबंध हैं। वहीं भाजपा ने राहुल गांधी के आचरण पर भी चर्चा की मांग करते हुए उनकी सदस्यता रद्द करने और भविष्य में चुनाव लड़ने से रोक की मांग की, जो अक्सर निर्वाचन आयोग, सर्वोच्च न्यायालय और लोकसभा अध्यक्ष जैसे संवैधानिक संस्थाओं पर आरोप लगाते रहे हैं। सत्ता पक्ष और विपक्ष के एक दूसरे पर ऐसे ही आरोप-प्रत्यारोप संसद और संसद के बाहर टकराव का कारण बने हैं।
बदजुबानी तक पहुंची सियासत
लोकसभा अध्यक्ष को हटाने के लिए दिये गये नोटिस के बाद संसद में यह सियासी टकराव ओर ज्यादा तेज हो गया है, जब केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने विपक्ष पर आरोप लगाया है कि प्रियंका गांधी और केसी वेणुगोपाल के साथ कांग्रेस के कुछ सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष के कक्ष में जाकर उनके साथ गाली-गलौज की। रिजिजू ने यह भी दावा किया कि उस समय कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रियंका गांधी और केसी वेणुगोपाल, सांसदों के इस व्यवहार का विरोध करने के बजाय अपने सांसदों को और उकसा रहे थे। ऐसे सियासी टकराव के कारण साफ संकेत हैं कि बजट सत्र का पहला चरण हंगामे में ही कटेगा, क्योंकि नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सदन के सुचारु संचालन के लिए बजट पर चर्चा से पहले भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता पर संक्षिप्त चर्चा की शर्त रखी थी, जिसके जवाब में सरकार ने उनसे सत्र के दौरान सदन में हुई घटनाओं पर खेद जताने की शर्त रखी है। बजट सत्र के दौरान अप्रकाशित किताब, सांसदों के निलंबन, विपक्षी महिला सांसदों पर पीएम पर हमले की साजिश जैसे मुद्दे ने सरकार और विपक्ष के संबंधों की खाई चौड़ी कर दी है। संसद के बजट सत्र का पहला चरण सत्ता पक्षा और विपक्ष के हंगामें के बीच औद्योगिक संबंध संहिता (संशोधन) विधेयक, 2026 पारित कराने के बाद संपन्न तो हो गया, लेकिन 9 मार्च से शुरु होने वाले दूसरे चरण के लिए भी सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों पक्षों के बीच इस टकराव को दूर करने की चुनौती खड़ा कर गया है? हालांकि इस बीच इस टकराव को दूर करने की दिशा में दोनों पक्षों के लिए कोई न कोई रास्ता तलाशने का प्रर्याप्त मौका है और देश व जनहित में यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए जरुरी भी है।

(लेखक स्वतन्त्र पत्रकार हैं)



