लेखक: हिमांशु मिश्र
मुस्लिम सियासत पर मुझे शोले फिल्म का यह डायलॉग देश में मुस्लिम सियासत के संदर्भ में अनायास याद आ जाता है। खासतौर से बिहार के नतीजे के बाद एक बार फिर से यह डायलॉग हिट है।
कारण बिहार और मुस्लिम सियासत में एआईएमआईएम के मुखिया असदुद्दीन ओवैसी का उभार। बिहार के नतीजे ने यह साफ कर दिया है कि दशकों से अपने नेता का इंतजार कर रही मुस्लिम बिरादरी की तलाश हैदराबादी फायर ब्रांड नेता ओवैसी पर पूरी हो गई है। सूबे के मुस्लिम युवाओं में ओवैसी को ले कर दीवानगी है। सबसे पहले बिहार खासकर सीमांचल के मुस्लिम मतदाताओं में गब्बर सिंह (भाजपा) का डर खत्म हो गया। गैरभाजपा और खुद को सेक्युलर मानने वाले दल जिस तरह की राजनीति कर रहे हैं, उससे मुझे अंदेशा है कि अन्य राज्यों में विपक्ष के गब्बर सिंह का भय खत्म हो जाएगा। इसकी अब पहली परीक्षा अगले साल पश्चिम बंगाल और इसके एक साल बाद उत्तर प्रदेश में होगी। अगर ओवैसी यहां भी सफल रहे तो वह देश में मुसलमानों के नेता के तौर पर स्थापित हो जाएंगे।
मुझे यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि दलों ने मुसलमानों को हमेशा वोट बैंक के रूप में देखा। शरियत, कुरान और धार्मिक परंपराओं से कभी उबरने ही नहीं दिया। कभी हमें वोट दे दो नहीं तो भाजपा आ जाएगी से चल कर विपक्ष की यात्रा हमारा साथ दो नहीं तो मोदी आ जाएगा तक पहुंची। मुसलमानों ने देखा कि इस डायलॉग के झांसे में आ कर मोदी-भाजपा का विजय रथ तो नहीं रुक रहा, मगर संसद और विधानसभाओं में उनकी नुमाइंदगी शून्य की ओर बढ़ रही है। भाजपा को रोकने के ठेके से उपजे इस दुष्परिणाम ने इस बिरादरी को कहीं का नहीं छोड़ा। मुस्लिम मन भाजपा को रोकने की ठेकेदारी से दूर हो रहा है। बिहार इसकी शुरुआत है। पता नहीं यह यात्रा कहां जा कर रुकेगी। गब्बर का डर किन-किन राज्यों में खत्म होगा।
हां, बिहार के नतीजे के बाद कमजोर वर्ग के प्रवासियों की वापसी की तस्वीरें डाल कर उनका मजाक उड़ाया जा रहा है। उस वर्ग का जो विपक्ष की राजनीति की ताकत रहे हैं। ऐसा वर्ग जिसने बाबरी विध्वंस के बाद भाजपाशासित चार में से तीन राज्यों में पार्टी की वापसी नहीं होने दी। उत्तर प्रदेश में हिंदुत्व हृदय सम्राट कल्याण सिंह हारे, हिमाचल प्रदेश और मध्यप्रदेश में कांग्रेस जीती। भाजपा किसी तरह राजस्थान में वापसी कर थोड़ी बहुत इज्जत बचा पाई। सवाल यह है कि जिस वर्ग ने बाबरी विध्वंस की ‘गौरवपूर्ण हादसे’ के बाद भी भाजपा से चार में से तीन राज्यें छीन ली। महज प्याज की कीमत बढऩे पर दिल्ली में सत्ता छीन ली। वही वर्ग अगर कहता है कि पेट्रोल पांच सौ रुपये भी हो जाए तो कोई बात नहीं, बस उसे भाजपा चाहिए। जो प्रवासी बिहारी हैं, दिल्ली, सूरत, मुंबई जैसे महानगरों में बेहद कष्टïपूर्ण जीवन जी कर भी अगर भाजपा के समर्थक हैं तो यह सबसे पहले विपक्ष के लिए और इसके बाद मुसलमानों के लिए विचार का विषय होना चाहिए। यहां वोट चोरी की थ्योरी नहीं चलेगी। मुसलमानों को पत्रकारों की इस मदारी टोली के वर्ग के झांसे में नहीं आना चाहिए कि 23 प्रतिशत वोट ले कर राजद को महज 25 सीटें और उससे कम वोट ले कर भाजपा सौ के कैसे करीब जीत गई। यह आपको कभी नहीं बताएंगे कि 2015 में करीब 18 फीसदी वोट ला कर राजद 80 और करीब 17 फीसदी से कम वोट ला कर जदयू 71 सीटें जीत गई थी। तब इस चुनाव में राजद से ज्यादा करीब 25 फीसदी वोट ला कर भाजपा महज 53 सीटें ही जीत पाई थी।
कुल मिला कर बिहार में अभी बहुत कुछ होना है। जमीनी सच्चाई यह है कि एम और वाई में एम गंवा देने वाले राजद का अब कोई भविष्य मुझे नजर नहीं आता। नीतीश बमुश्किल एक-डेढ़ साल नेतृत्व देने की स्थिति में हैं। आप माने या न माने बिहार की राजनीति में तेजस्वी टेस्टेड एंड रिजेक्टेड पीस हैं। न तो जदयू और न ही भाजपा के पास ऐसा कोई नेतृत्व है तो भरोसा पैदा कर सके। हां, प्रशांत किशोर को मत भूलिये। भले शून्य पर आउट हो गए हैं, मगर चुनाव में मुद्दा तो उन्हीं का था। राजनीतिक आपाधापी में उनके साथ इस चुनाव में यही होना था। सवाल है कि प्रशांत अगर गांधीजी की तरह डटे रहे तो उनके लिए राज्य में व्यापक संभावानाएं हैं। बीच में छोड़ गए तो कोई बात नहीं। हां, प्रचंड जनादेश के बाद भी बिहार की सियासत का यक्ष प्रश्न और मजबूत हुआ है।

(लेखक अमर उजाला समाचार पत्र में नेशनल ब्यूरो के पद पर नई दिल्ली में कार्यरत हैं)




