लेखक-अरविंद जयतिलक
अपने 11 वर्ष के ऐतिहासिक कालखंड में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक स्तर पर भारत की सफलता और साख के नए कीर्तिमान गढ़े हैं। उन्होंने जहां एक ओर अपनी सफल विदेशनीति से अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान, जर्मनी और रुस सरीखे ताकतवर देशों को अपना मुरीद बनाया है वहीं चीन और पाकिस्तान को अंतर्राष्ट्रीय मोर्चे पर करारी पटकनी देकर उनके असली चेहरे को बेनकाब कर दिया है। किसी भी राष्ट्र की विदेशनीति को प्रभावित करना अथवा अपने अनुकूल बनाना आसान नहीं होता। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने अपने 11 वर्ष के कालखंड में यह कारनामा कर दिखाया है। सबसे पहले दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका की बात करें तो उन्होंने अपने 11 वर्ष के कालखंड में दोनों देशों के बीच सामरिक-आर्थिक और भू-रणनीतिक साझेदारी को नया आयाम दिया है। बात चाहे फाइटर प्लेन के एफ-414 इंजन बनाने की तकनीकी समझौते का हो अथवा प्रिडेटर ड्रोन एमक्यू-9बी की खरीद का, दोनों देशों ने आगे बढ़कर फैसले लिए हैं। मोदी के नेतृत्व वाला भारत अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा के साथ अर्टेमिस संधि में भी शामिल होने का फैसला कर चुका है। गौर करें तो अमेरिका-भारत रक्षा सौदे का बजट जो पिछले एक दशक में 2008 तक शुन्य था वह आज 2025 में बढ़कर तकरीबन 22 बिलियन डॉलर के पार पहुंच चुका है। अगर दोनों देशों के बीच इसी तरह सामरिक सामंजस्य और भरोसा बना रहा तो वर्ष 2030 तक दोनों देशों के बीच रक्षा सौदा 30 बिलियन डॉलर के पार पहुंच सकता है। दुनिया के ताकतवर देशों में शुमार रुस की बात करें तो प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी सदाबहार दोस्ती से दोनों देशों के रिश्ते को मिठास से भर दिया है। गौर करें तो अमेरिका की लाख मनाही के बावजूद भी रुस ने भारत को एस-400 एयर डिफेंस मिसस्टम की आपूर्ति करके रेखांकित कर दिया कि दोनों देश सदाबहार साथी हैं और किसी के दबाव में झुकने वाले नहीं हैं। रक्षा समझौतों के अलावा दोनों देश रेलवे, फर्टिलाइजर, अतंर्राष्ट्रीय संस्थानों में सहयोग, आतंकवाद व नशीली पदार्थों के खिलाफ साझा जंग और सौर व नाभिकीय उर्जा का शांतिपूर्वक उपयोग जैसे अन्य मसलों पर भी साथ-साथ हैं। रिश्तों की प्रगाढ़ता और मोदी-पुतिन केमेस्ट्री की चमक का ही असर है कि दोनों देश एकस्वर में आतंकवाद के विरुद्ध मिलकर लड़ने की प्रतिबद्धता पर कायम हैं। रुसी राष्ट्रपति पुतिन कह भी चुके हैं कि आतंकवाद से निपटने के लिए जो भी ताकत हो उसका इस्तेमाल किया जाना चाहिए। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान देखा भी गया कि आतंकवाद के मसले पर रुस भारत के साथ खड़ा दिखा। अमेरिका और रुस की तरह भारत-फ्रांस संबंध भी नए शिखर पर है। दोनों देशों के बीच डिफेंस स्पेस पार्टनरशिप, सैटेलाइट लांच के लिए नए स्पेस इंडियन लिमिटेड और एरियन स्पेस के बीच एमओयू हो चुके हैं। टाटा और एयरबस स्थानीय कंपनी के साथ मिलकर 125 हेलीकॉप्टर बनाने को तैयार हैं। दोनों देश विज्ञान, तकनीक, स्वास्थ्य सेवा सहयोग, कृषि समेत पब्लिक एडमिनिस्टेªशन एंड रिफार्म्स के मसले पर भी साथ-साथ हैं। प्रधानमंत्री मोदी फ्रांस को ‘मेक इन इंडिया’ और आत्मनिर्भर भारत का महत्वपूर्ण साझाीदार बताते हुए सुनिश्चित कर चुके हैं कि दोनों देश पनडुब्बी हो या नौसैनिक विमान सभी क्षेत्र में कंधा जोड़ आगे बढ़ने को तैयार हैं। तब दोनों देश ‘भारत-फ्रांस हिंद-प्रशांत रोडमैप’ जारी करते हुए रणनीतिक रुप से महत्वपूर्ण हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक संतुलित और स्थिर व्यवस्था बनाने पर सहमत हैं। प्रधानमंत्री मोदी की पहल का ही नतीजा है कि 2018 के बाद से फ्रांस भारत का दूसरा सबसे बड़ा रक्षा आपूर्तिकर्ता देश बन चुका है। मौजूदा समय में भारत अपनी कुल रक्षा आयात का तकरीबन 29 फीसदी फ्रांस से करता है। दोनों देशों के बीच बढ़ती निकटता ने कारोबारी, रणनीतिक और सामरिक कुटनीति को नए क्षितिज पर पहुंचा दिया है। दोनों देश एकदूसरे के सैनिक अड्डे का इस्तेमाल और वहां अपने युद्धपोत रखने के अलावा उर्जा, तस्करी, आव्रजन, शिक्षा, रेलवे, पर्यावरण, परमाणु, आतंकवाद और अंतरिक्ष मामलों में मिलकर काम कर रहे हैं। भारत और आस्टेªलिया के संबंधों की बात करें तो भले ही दोनों देश भौगोलिक रुप से दूर हैं लेकिन ऐतिहासिक संबंधों के डोर से बंधे हुए हैं। आस्टेªलिया के संसद से भारत के साथ मुक्त व्यापार समझौता पारित हो चुका है। इस समझौते से कपड़ा, चमड़ा, फर्नीचर, आभुषण और मशीनरी सहित भारत का तकरीबन 6000 से अधिक उत्पाद आस्टेªलियाई बाजारों में शुल्क मुक्त पहुंचने लगा है। भारतीय नागरिकों के लिए वीजा आसान हो गया है। मौजूदा समय में आस्टेªलिया के निर्यात का छठा सबसे बड़ा गंतव्य-स्थान भारत ही है जिसमें कोयला, सोना एवं शिक्षा जैसी सेवाएं शामिल है। दोनों देश व्यापक ज्ञान भागीदारी के सृजन हेतु भी काम कर रहे हैं जिसमें प्राथमिक स्कूल से विश्वविद्यालय स्तर तक की शिक्षा में संयुक्त सहयोग परियोजनाओं सहित विभिन्न क्षेत्रों में संयुक्त अनुसंधान कार्य शामिल है। दोनों देश व्यापक रणनीतिक साझेदारी पर मुहर लगाते हुए टेªड व इन्वेस्टमेंट, डिफेंस व सिक्योरिटी, एजुकेशन एंड इनोवेशन तथा साइंस एवं टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में भी मिलकर काम करने की प्रतिबद्धता जता चुके हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने ब्रिटेन के साथ भी रिश्ते मजबूत किए है। उनकी पहल से दोनों देशों ने बहुप्रतीक्षित मुक्त व्यापार समझौते (फ्री टेªेड एग्रीमेंट) पर सहमति की मुहर लगा दी है। इस डील के उपरांत अब 99 फीसदी भारतीय निर्यात पर अब कोई आयात शुल्क नहीं लगेगा। वहीं भारत ब्रिटेन के टैरिफ को 150 फीसदी से घटाकर 75 फीसदी कर देगा। गौर करें तो 2014 के बाद से दोनों देशों के मध्य व्यापार एवं पूंजी निवेश में तीव्रता आयी है। जहां तक द्विपक्षीय व्यापार का सवाल है तो ब्रिटेन भारत का विश्व में दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक सहयोगी देश है। गौरतलब है कि दोनों देशों का द्विपक्षीय व्यापार जो 2018-19 में 16.7 अरब डॉलर था, वह आज बढ़कर 40 अरब डॉलर यानी चार लाख करोड़ रुपए के पार पहुंच चुका है। इससे दोनों देशों के तकरीबन 5 लाख से अधिक लोगों को रोजगार मिला है। एक वक्त था जब मध्य एशिया से भारत के संबंध बहुत असरकारक नहीं थे। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने मध्य एशिया से युगांतकारी संबंधों की नींव रखी है। उसी का असर है कि आज भारत का मध्य एशियाई देशों से व्यापार तीन अरब डॉलर के पार पहुंच चुका है। इसी तरह भारत-यूएई रिश्ते भी तेजी से परवान चढ़ रहे हैं। गत वर्ष संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के राष्ट्रपति मोहम्मद बिन जायद अल नाह्यान की ‘वाइब्रेंट गुजरात ग्लोबल समिट’ में सहभागिता और विकास में सहयोग का संकल्प रेखांकित करता है कि दोनों देश आपसी रिश्ते को धार देने को तैयार हैं। भारत की आरबीआई और संयुक्त अरब अमीरात के सेंट्रल बैंक के बीच संपन्न हुए समझौते के तहत अब दोनों बैंक एक फ्रेमवर्क तैयार करेंगे जिसमें क्रॉस-बार्डर ट्रांजैक्शन के लिए लोकल करेंसी का इस्तेमाल करेंगे। निःसंदेह इस पहल से आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा। यूएई की तरह सऊदी अरब के साथ भी भारत के रिश्ते बेहद प्रगाढ़ हुए है। एक दौर था जब आतंकवाद के मसले पर सऊदी अरब पाकिस्तान के साथ खड़ा दिखता था। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी कूटनीति से सऊदी अरब को अपने पाले में ला दिया है। देखा गया था कि पुलवामा हमले के दोषियों को सजा दिलाने की भारत की मुहिम को दुनिया भर में मिल रहे समर्थन के बीच भारत सऊदी अरब के युवराज ने भी आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में भारत के साथ कंधा जोड़ने का वादा किया था। यह भारत और सऊदी अरब के प्रगाढ़ होते रिश्ते को ही रेखांकित करता है। दूसरी ओर प्रधानमंत्री मोदी ने पड़ोसी देशों मसलन नेपाल, भूटान, श्रीलंका, मालदीव, मॉरीशस, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के साथ-साथ आसियान, बिम्सटेक, सार्क, जी-20, जी-7 जैसे वैश्विक संगठनों से भी रिश्ते मजबूत बनाए हुए हैं। रही बात चीन और पाकिस्तान की तो प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी रणनीतिक कूटनीति से दोनों देशों के असली चेहरे को बेनकाब कर दिया है। ऑपरेशन सिंदूर के जरिए पाकिस्तान को घुटने पर ला दिया है वहीं चीन को संदेश दे दिया है कि आज का भारत 1962 का भारत नहीं है।

(लेखक राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं)




