लेखक- अर्पित मुद्गल
तिब्बत एक शांतिप्रिय देश था अतः वहां बहुत अधिक फौज रखने की आवश्यकता नहीं थी,पर रातों रात सब बदल गया जब चीनियों ने एकाएक तिब्बत पर कब्जा कर लिया।
चीन के मामले में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का आकलन गलत निकला जब।
चीन में साम्यवादी सरकार की स्थापना हुई तब पंडित नेहरू ने चीन से अत्यंत मधुर संबंध बनाने का प्रयास किया परंतु चीन ने धोखे से तिब्बत को हड़प लिया।
धीरे धीरे चीन की मुख्य भूमि के साम्यवादी फौजियों ने तिब्बत की संस्कृति को भी कुचल कर रख दिया। नेहरू की गलत नीतियों के कारण चीन ने भारत पर धोखे से आक्रमण कर दिया। यहां भारत का दुर्भाग्य ही था कि चीन और भारत के बीच हुए इस अप्रत्याशित युद्ध में भारत बुरी तरह पराजित हो गया।
चीन ने 20 अक्टूबर वर्ष 1962 को भारत पर जबरन युद्ध थोप कर 82000 वर्ग किलोमीटर भारतीय भूमि पर कब्जा कर लिया। चीन द्वारा कब्जे में ली गई इस भूमि को 60 वर्ष बीत जाने के बावजूद भी हम मुक्त नहीं करवा पाये हैं। इसके साथ ही चीनियों ने तिब्बत के स्वतंत्रता स्वायत्तता और संस्कृति का भी समूल नाश कर दिया है।
14 नवंबर वर्ष 1962 को भारतीय संसद के दोनों सदनों में संयुक्त प्रस्ताव पारित किया गया जिसमें चीन द्वारा हथियाई गई भारतीय भूमि को मुक्त कराने का संकल्प लिया गया।
अतः 14 नवंबर को बाल दिवस ना मनाकर आज भारत तिब्बत सहयोग मंच इस दिन को संकल्प स्मरण दिवस के रूप में मना रहा है। उसी संकल्प को याद कर सभी कार्यकर्ता बंधु वचनबद्ध हैं कि तिब्बत को चीन के चंगुल से मुक्त करवा कर ही मानेंगे।
(भारत तिब्बत सहयोग मंच युवा विभाग के कार्यकारी अध्यक्ष हैं और यह उनके निजी विचार हैं)




