लेखक-अरविंद जयतिलक
♂÷सीमा पर चीन की बढ़ती दादागिरी को देखते हुए आवश्यक है कि भारत भी तिब्बत की स्वतंत्रता पर अपनी मुखरता बढ़ाकर चीन को उसकी ही भाषा में करारा जवाब दे। अगर भारत तिब्बत की स्वतंत्रता और मानवाधिकार हनन के मसले को अन्तरराष्ट्रीय कुटनीति की तीव्र आंच पर रखता है तो सच मानिए चीन की पेशानी पर बल आना तय है। तिब्बत की स्वतंत्रता चीन की कमजोर नस है और भारत इसे मानवाधिकार हनन का नश्तर बनाकर चीन की हेंकड़ी का सफल आॅपरेशन कर सकता है। लेकिन आश्चर्य है कि आजादी के बाद से अभी तक किसी भी सरकार ने तिब्बत के मसले को हथियार बनाकर चीन से मनोवैज्ञानिक युद्ध लड़ने की हिम्मत नहीं दिखायी। दरअसल इसका कारण यह है कि चीन ने भारत के पूर्व सत्तासीन अधिष्ठाताओं से समय-समय पर कुबुलवा रखा है कि ताईवान और तिब्बत उसका हिस्सा है। लेकिन आज की तारीख में चीन की बढ़ती आक्रामकता और दुस्साहस को देखते हुए पूर्व की इस स्वीकारोक्ति से बंधे रहना कहां तक उचित है। वह भी यह जानते हुए कि चीन जम्मू-कश्मीर और अरुणांचल प्रदेश पर अपनी कुदृष्टि लगाए हुए है। उसकी रणनीति इस इलाके में अपनी सीमा का विस्तार करना है। उसकी कोशिश है कि जम्मू कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश में भारतीय प्रभुसत्ता को अवैध ठहरा दिया जाय। इसी रणनीति के तहत वह पिछले कुछ वर्षों से जम्मू-कश्मीर में तैनात भारतीय सैन्य अधिकारियों को वीजा देने से परहेज करता है। याद होगा गत वर्ष पहले उसने प्रस्ताव रखा था कि भारत अगर अरुणाचल के तवांग इलाके को चीन को सौंप देता है तो वह भी बदले में उसे अक्साई चीन का इलाका दे सकता है। लेकिन भारत ने उसके इस साजिश भरे प्रस्ताव को ठुकरा दिया। जम्मू-कश्मीर में उसकी दुस्साहसपूर्ण गतिविधियां इसलिए चिंता पैदा करने वाली है कि पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर का आंगन चीन के लिए खोल दिया है। आज उसी का नतीजा है कि इस्लामाबाद से चीन के उरुमची तक आवागमन तेज हो गया है। अगर भारत सतर्कता नहीं बरतता है तो बीजिंग-इस्लामाबाद का नापाक गठजोड़ भारत की संप्रभुता के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। याद होगा गत वर्ष पहले न्यूयार्क टाईम्स के हवाले से कहा गया था कि गुलाम कश्मीर में सामरिक रुप से महत्वपूर्ण गिलगित-बल्टिस्तान क्षेत्र पर चीन अपना वर्चस्व बढ़ा रहा है। यहां हजारों चीनी सैनिकों की मौजूदगी बराबर देखी जा रही है। चीन इन क्षेत्रों में निर्बाध रुप से हाईस्पीड सड़कें और रेल संपर्कों का जाल बिछा रहा है। सिर्फ इसलिए की युद्ध के समय वह भारत तक अपनी पहुंच आसान बना सके। चीन अरबों रुपये खर्च करके कराकोरम पहाड़ को दो फाड़ करते हुए गवादर के बंदरगाह तक रेल डालने के प्रयास में जुटा है। यह स्थिति चिंतित करने वाली है। उधर, अरुणाचल प्रदेश में भी चीन की चालबाजी विगत कई सालों से देखी जा रही है। जब भी भारत प्रतिकार करता है तो उसकी ओर से धौंसपट्टी दी जाती है। सच तो यह है कि वह आज भी अरुणांचल प्रदेश को भारत का हिस्सा मानने को तैयार नहीं है। या यों कहें कि भारत द्वारा तिब्बत को चीन का हिस्सा स्वीकारने के बावजूद भी वह अरुणंाचल प्रदेश पर अपना दावा छोड़ने को तैयार नहीं है। वह एक कुटनीति के तहत भारत के साथ सीमा विवाद हल करने के बजाए उलझाए रखना चाहता है। उसका मकसद भारत पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाए रखना है। वह आज भी अरुणाचल प्रदेश के 90,000 वर्ग किमी पर अपना दावा छोड़ने को तैयार नहीं है। यही नहीं वह अरुणाचल प्रदेश के चुने गये किसी भी जनप्रतिनिधि को वीजा देने को तैयार नहीं है। जबकि भारत सीमा विवाद सुलझाने के लिए 1976 से लगातार प्रयास कर रहा है। लेकिन चीन आज तक दस्तावेजों के आदान प्रदान में अपने दावे के नक्शे को भारत को उपलब्ध नहीं कराया है। इसके बावजूद भी भारत चीन की तमाम शर्तों को स्वीकारते हुए सीमा विवाद को सुलझाने के लिए तैयार है। अब भारत को चीन के आगे दबने के बजाए अपने रुख में कड़ा बदलाव लाने की जरुरत है। भारत को समझना होगा कि उसकी दोस्ताना नीति से चीन के खतरनाक इरादों में बदलाव आने वाला नहीं है। इसलिए कि चीन का पारंपरिक इतिहास ही पीठ में छूरा भोंकने वाला रहा है। उचित होगा कि भारत भ्रम के खोल से बाहर निकलकर तिब्बत पर अपनी मुखरता बढ़ाए। यह सच्चाई है कि तिब्बत पर शुतुर्गमुर्गी रवैए के कारण ही चीन के मामले में भारत की विदेशनीति भटकाव का शिकार रही है। चीन के जवाब में भारत के पास सौदेबाजी की नेहरु काल की बची हुई सीमित ताकत यानी तिब्बत का मसला परवर्ती हुक्मरानों ने मुफ्त में गंवा दी है। सिर्फ इस उम्मीद में की उनकी नरमी से चीन के रुख में बदलाव आएगा और दोनों देशों के संबंध सुधरेंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। गौर करें तो देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु से लेकर आज तक सभी ने तिब्बत को स्वशासी क्षेत्र स्वीकार किया है। उसी का नतीजा है कि चीन बेफिक्र होकर कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश के मसले पर भारत के खिलाफ साजिश रख्ता है। देखा जा रहा है कि वह कश्मीर मसले पर खलकर पाकिस्तान के साथ है। यहां ध्याान देना होगा कि चीन जब भी भारत से सीमा विवाद पर वार्ता करता है सबसे पहले भारत से स्वीकार कराता है कि तिब्बत चीन का हिस्सा है। लेकिन भारत कभी भी चीन से स्वीकार नहीं करा पाता कि कश्मीर भी भारत का अविभाज्य अंग है। अगर भारत चीन से कबूलवा लेता तो फिर भारत के खिलाफ चीन को साजिश रचने या पाकिस्तान के साथ गलबहियां करने का अवसर नहीं मिलता। आज चीन भारत के पड़ोसी देशों मसलन नेपाल, बंगलादेश और म्यांमार में अपना हस्तक्षेप बढ़ा रहा है। भारत समेत दुनिया के सभी देश अच्छी तरह अवगत हैं कि चीन श्रीलंका में बंदरगाह बना रहा है। अफगानिस्तान में अरबों डाॅलर निवेश कर तांबे की खदानें चला रहा है। म्यांमार की गैस संसाधनों पर कब्जा करने की जुगत में है। खबर तो यहां तक है कि वह कोको द्वीप में नौ सैनिक बंदरगाह बना रहा है। सामरिक हित को ध्यान में रखते हुए वह नेपाल में रेलवे लाईन बिछाने और बेहतरीन सड़कों के निर्माण में जुटा है। इसके अलावा वह नेपाल के अन्य क्षेत्रों मसलन शिक्षा, बिजली में भी भरपूर धन खर्च कर रहा है। वह नेपाल के लोगों को प्रभावित करने के उद्देश्य से वहां पुस्तकालय, विज्ञान प्रयोगशाला के अतिरिक्त हजारों की संख्या में स्कूल खोल रहा है। चिंताजनक तथ्य यह कि चीन को नेपाल के माओवादियों का खुला समर्थन हासिल है। नेपाल में माओवादियों की एक विशाल आबादी वैचारिक रुप से स्वयं को चीन के निकट पाती है। चीन इस वस्तुस्थिति से सुपरिचित है। इसीलिए वह उसका भरपूर फायदा उठा रहा है। साथ ही वह वैचारिक निकटता का हवाला देकर भारत विरोधी माओवादियों को भड़काने की भी कोशिश करता है। दूसरी ओर नेपाल के माओवादी नेता भी स्वयं को भारत विरोधी प्रचारित करने से बाज नहीं आते हैं। चीन की शह पर ही वहां की माओवाद जमात 1950 की भारत-नेपाल मैत्री संधि का विरोध कर रहे हैं। जबकि यह संधि भारत के लिए सामरिक लिहाज से अति महत्वपूर्ण है। उचित होगा कि भारत नेपाल में चीन के बढ़ते हस्तक्षेप पर अंकुश लगाने के लिए ठोस रणनीति को धार दे। अच्छी बात यह है कि देश के मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पड़ोसी देशों से बेहतर संबंध स्थापित करने के हिमायती है। नतीजा पड़ोसी देशों से संबंध प्रगाढ़ है। बावजूद इसके चीन के हर कदम पर सतर्क नजर रखना आवश्यक है। इसलिए और भी कि वह अपनी रक्षा बजट में लगातार इजाफा कर रहा है। जबकि भारत का रक्षा बजट चीन की तुलना में आधे से भी कम है। चीन को अर्दब में रखने के लिए भारत को चाहिए कि वह तिब्बत का मसला उठाकर चीन विरोधी देशों को लामबंद करे। अगर भारत तिब्बत मसले पर अपनी कुटनीतिक धार को पैना करने में कामयाब होता है तो सच मानिए चीन भी अरुणाचल और जम्मू-कश्मीर अपनी जुबान पर लाने में सौ बार सोचेगा।

÷लेखक राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं÷




