लेखक जयतिलक
देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में बढ़ रहे बाल विवाह को लेकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कड़ी टिप्पणी की है। एक नाबालिग लड़की के अपहरण के आरोप में दर्ज एफआईआर रद्द करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान जस्टिस राजीव गुप्ता और जस्टिस अजय कुमार की बेंच ने कहा कि आज तक एक भी ऐसा मामला सामने नहीं आया है जिसमें पुलिस ने बाल विवाह पर ‘बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006’ के तहत केस दर्ज किया हो। अदालत ने राज्य के डीजीपी को जरुरी गाइडलाइंस और सर्कुलर जारी करने के निर्देश दिए हैं। उल्लेखनीय है कि ‘बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006’ के तहत बाल विवाह कराने वालों या इसमें शामिल होने वालों को दो वर्ष तक का कठोर कारावास और एक लाख रुपए तक का जुर्माना हो सकता है। भारत में बाल विवाह एक कानूनी अपराध है जो बच्चों खासकर लड़कियों के स्वास्थ्य, शिक्षा और भविष्य को बर्बाद कर देता है। कानूनी स्तर पर 18 वर्ष से कम आयु की लड़की या 21 वर्ष से कम आयु के लड़के का विवाह होता है तो उसे बाल विवाह माना जाता है। अच्छी बात यह है कि भारत में बाल विवाह की दर में तेजी से गिरावट आई है। राष्ट्रीय स्तर पर यह दर वर्ष 2006 के लगभग 47 प्रतिशत थी जो वर्ष 2021 में गिरकर 22.3 प्रतिशत रह गई है। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के ‘बाल विाह मुक्त भारत’ अभियान का लक्ष्य इस दर को तेजी से गिराकर वर्ष 2026 तक 10 प्रतिशत तक लाना और वर्ष 2030 तक पूरी तरह खत्म करना है। उधर, राज्य सरकारें भी बाल विवाह को रोकने की दिशा में लगातार प्रयासरत हैं। अभी दो वर्ष पूर्व ही उत्तर प्रदेश समेत देश के आठ राज्य बिहार, झारखंड, उत्तराखंड, मध्यप्रदेश, राजस्थान, पंजाब और हरियाणा ने बाल विवाह रोकने की दिशा में ठोस कदम उठाए हैं। इन सभी राज्यों ने अधिसूचनाएं जारी कर प्रशासन को ताकीद किया है कि बाल विवाह की रोकथाम सुनिश्चित करने के लिए गांवों और प्रखंडों में कड़ी निगरानी रखी जाए। यह पहल इस मायने में महत्वपूर्ण है कि आजादी के साढ़े सात दशक गुजर जाने के बाद भी देश में बाल विवाह जारी है। जनगणना के 2011 के आंकड़ों पर गौर करें तो देश में प्रतिदिन 4000 से अधिक बच्चों का विवाह कर दिया जाता है। झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल, उत्तरप्रदेश और राजस्थान में सबसे अधिक बाल विवाह होते हैं। गत वर्ष पहले नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे से खुलासा हुआ था कि तमाम जागरुकता भरे कार्यक्रम और कड़े कानूनी प्रावधानों के बावजूद भी देश में बाल विवाह जारी है। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग और गैर सरकारी संगठन यंग लाइव्स की रिपोर्ट में भी कहा जा चुका है कि गांव के साथ-साथ महानगर भी बाल विवाह जैसी सामाजिक बुराई की चपेट में हैं। गत वर्ष पहले संयुक्त राष्ट्र के एक रिपोर्ट से उ्घाटित हुआ था कि भारत भी बाल विवाह के मामले में दुनिया के शीर्ष देशों में है। यह स्थिति तब है जब भारतीय संविधान में विभिन्न कानूनों एवं अधिनियमों के माध्यम से बाल विवाह रोकने के प्रावधान हैं। 1929 में हरविलास शारदा के प्रयत्नों से बाल विवाह निरोधक अधिनियम पारित हुआ जिसे शारदा एक्ट के नाम से भी जाना जाता है। इसमें प्रावधान है कि विवाह के समय लड़के की आयु 18 वर्ष तथा लड़की की आयु 15 वर्ष होनी चाहिए। इससे कम आयु के विवाह को बाल विवाह माना जाएगा। इस कानून के उलंघन पर 15 दिन का कारावास तथा एक हजार रुपया जुर्माना सुनिश्चित किया गया। लेकिन यह अधिनियम बाल विवाह रोकने में सफल नहीं हुआ। हिंदू विवाह अधिनियम 1955 में भी लड़के व लड़की के विवाह की आयु 18 वर्ष और 15 वर्ष ही रखी गयी। मई, 1976 में इस अधिनियम में संशोधन कर विवाह की आयु 21 वर्ष और 18 वर्ष कर दी गयी। एक दूसरा कानून जो अस्तित्व में है वह बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006 है। इस अधिनियम में बाल विवाह निरोधक अधिनियम में व्याप्त खामियों को दूर कर सुनिश्चित किया है कि एक ऐसी लड़की का विवाह जो 18 साल से कम की है और लड़के का विवाह जो 21 साल से कम का है बाल विवाह कहलाएगा। इस अधिनियम में बाल विवाह के आरोपियों को दो साल तक का कठोर कारावास या एक लाख रुपए तक का जुर्माना अथवा दोनों हो सकता है। बाल विवाह कराने वाले माता-पिता, रिश्तेदार, विवाह कराने वाला पंडित और काजी को भी तीन महीने तक की कैद और जुर्माना भुगतना पड़ सकता है। इस कानून के तहत किसी महिला को कारावास की सजा नहीं दी जा सकती। माता पालक को भी इस अपराध के लिए कैद नहीं किया जा सकता। हां, उन्हें जुर्माना जरुर भरना होगा। इस कानून के अंतर्गत यह भी प्रावधान किया गया है कि बच्चे अपनी इच्छा से वयस्क होने के दो साल के अंदर अपने बाल विवाह को अवैध घोषित कर सकते हैं। चिंता की बात यह भी है कि बाल विवाह के कारण महिलाओं के स्वास्थ पर खतरनाक प्रतिकूल असर पड़ रहा है। बाल विवाह के कारण शिशु मृत्यु दर और अस्वस्थता दर में भी वृद्धि हो रही है। इसके अलावा घरेलू हिंसा, लिंग आधारित हिंसा, बच्चों के अवैध व्यापार, लड़कियों की बिक्री में वृद्धि, बच्चों द्वारा पढ़ाई छोड़ने की आंकड़ों में वृद्धि, बाल मजदूरी और कामकाजी बच्चों का शोषण तथा लड़कियों पर समय से पहले जिम्मदारी संभालने का दबाव भी बढ़ रहा है। चिकित्सकों की मानें तो बाल विवाह की वजह से शिशु को जन्म देते वक्त दुनिया भर में होने वाली कुल मौतों की एक बड़ा हिस्सा अकेले भारत में होती है। कम उम्र में विवाह से प्रसव के दौरान इन महिलाओं में 30 प्रतिशत रक्तस्राव, 19 प्रतिशत एनीमिया, 16 प्रतिशत संक्रमण, और 10 प्रतिशत अन्य जटिल रोगों की संभावना बढ़ जाती है। यहीं नहीं वे गंभीर बीमारियों की चपेट में आ जाती हैं। एक आंकड़े के मुताबिक कम उम्र में गर्भाधान के मामलों में लगातार वृद्धि हो रही है। समय से पहले प्रसव की घटनाओं में इजाफा हो रहा है। मातृ मृत्यु दर में वृद्धि हो रही है। गर्भपात और मृत प्रसव की दर भी बढ़ रही है। मेटरनल मॉर्टेलिटिी रेशियो (एमएमआर) और इंटरनेशनल प्रेग्नेंसी एडवाइजरी सर्विसेज की रिपोर्ट की मानें तो भारत में असुरक्षित गर्भपात से हर दो घंटे में एक स्त्री की जान जाती है। वर्ष 2016 में सरकारी संस्था नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस (एनएसएसओ) की एक रिपोर्ट से उद्घाटित हुआ था कि शहरों में 20 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों में हर सातवें गर्भधारण का अंत गर्भपात के रुप में होता है। 20 साल से कम उम्र की शहरी युवतियों में गर्भपात का रुझान राष्ट्रीय औसत के मुकाबले काफी अधिक है। इस रिपोर्ट के मुताबिक देश भर में ग्रामीण क्षेत्रों में गर्भपात का प्रतिशत 2 तथा शहरी क्षेत्रों में 3 प्रतिशत है। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि शहरों में तो कम लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी असुरक्षित गर्भपात कराए जा रहे हैं जिसकी कीमत युवतियों को जान देकर चुकानी पड़ रही है। गत वर्ष पहले सेव द चिल्ड्रेन संस्था ने खुलासा किया था कि भारत मां बनने के लिहाज से दुनिया के सबसे खराब देशों में शुमार है। भारत में प्रत्येक वर्ष गर्भधारण संबंधी जटिलताओं के कारण और प्रसव के दौरान तकरीबन बीस हजार से पच्चीस हजार महिलाएं दम तोड़ देती हैं। इसका एक प्रमुख कारण बाल विवाह भी है। विडंबना यह है कि कड़े कानूनी प्रावधानों और जागरुकता कार्यक्रम के बावजूद भी पिछले दो दशकों में बाल विवाह की गिरने की दर हर वर्ष एक से दो प्रतिशत के बीच है जो कि बहुत ही कम है। ऐसे तो फिर बाल विवाह खत्म करने में दशकों लग जाएंगे।

(लेखक राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं)



