लेखक- संजय राय
हाल के दिनों में युवा आंदोलन की सफलता के बाद सोनम वांगचुक की पत्नी डॉ. गीतांजलि जे. अंगमो द्वारा सनातन धर्म और अध्यात्म को लेकर की गई टिप्पणी पर व्यापक बहस छिड़ गई। उनके वक्तव्य को लेकर सोशल मीडिया पर अनेक प्रकार की प्रतिक्रियाएँ सामने आईं। कुछ लोगों ने उनके विचारों का समर्थन किया, जबकि कुछ ने यह कहते हुए आलोचना की कि उन्होंने पूरे देश के युवाओं के आंदोलन को किसी एक धार्मिक पहचान से जोड़ने का प्रयास किया। इसके बाद डॉ. गीतांजलि ने स्पष्ट किया कि धर्म और अध्यात्म को एक-दूसरे का पर्याय नहीं माना जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि धर्म से प्रभावित राजनीति लोगों को बाँट सकती है, जबकि अध्यात्म से प्रेरित राजनीति लोगों को जोड़ती है।
उनका यह कथन केवल किसी राजनीतिक विवाद का उत्तर नहीं है, बल्कि भारतीय दर्शन, संस्कृति और आध्यात्मिक परंपरा की उस मूल चेतना की ओर संकेत करता है, जिसने हजारों वर्षों से भारत की आत्मा का निर्माण किया है। उन्होंने यह भी कहा कि सनातन धर्म भारतीय सभ्यता की बुनियाद है और इसे कभी संकीर्ण अथवा संस्थागत अर्थों में धर्म के रूप में नहीं देखा गया। यह कथन भारतीय चिंतन की उस परंपरा से मेल खाता है, जिसमें “धर्म” का अर्थ केवल किसी संप्रदाय या पंथ तक सीमित नहीं, बल्कि जीवन के शाश्वत नियम, कर्तव्य, नैतिकता और लोकमंगल से है।
डॉ. गीतांजलि ने अपने पहले के वक्तव्य में कहा था कि यदि किसी ने दुनिया को यह दिखाया है कि भारत का विश्वगुरु होना वास्तव में क्या है, तो वह भारत की युवा पीढ़ी है, जिसने सनातन पर भाषण नहीं दिए बल्कि उसे अपने आचरण में उतारा। उनके अनुसार युवाओं ने नफरत, हिंसा और अंधानुकरण के स्थान पर साहस, संयम, करुणा और देशभक्ति का परिचय दिया। यदि सनातन को केवल किसी धार्मिक पहचान के रूप में न देखकर जीवन मूल्यों की दृष्टि से देखा जाए तो यह विचार समझ में आता है कि सत्य, अहिंसा, करुणा, सहिष्णुता और आत्मानुशासन जैसे गुण भारतीय आध्यात्मिक परंपरा के मूल तत्व रहे हैं।
अपने स्पष्टीकरण में डॉ. गीतांजलि ने यह भी कहा कि धर्म का उद्देश्य अनुयायी बनाना हो सकता है, जबकि अध्यात्म व्यक्ति के भीतर परिवर्तन लाता है। भारतीय दर्शन में भी अध्यात्म का अर्थ आत्मा की खोज, आत्मबोध और समस्त सृष्टि में एकत्व का अनुभव है। उपनिषदों का “अहं ब्रह्मास्मि” और “तत्त्वमसि” का संदेश इसी आत्मबोध की ओर ले जाता है। इसलिए भारतीय अध्यात्म किसी बाहरी पहचान की अपेक्षा भीतरी परिवर्तन को अधिक महत्व देता है।
उन्होंने श्री अरबिंदो के प्रसिद्ध कथन का भी उल्लेख किया कि “भारत उठेगा, तो इसका अर्थ है कि सनातन धर्म उठेगा।” श्री अरबिंदो के इस कथन का आशय किसी संप्रदाय विशेष की राजनीतिक विजय नहीं था, बल्कि उस शाश्वत सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना के पुनर्जागरण से था जिसने भारत को सहस्राब्दियों तक विश्व में विशिष्ट बनाया। उनके अनुसार भारत की शक्ति उसकी आध्यात्मिक दृष्टि में निहित है।
भारतीय परंपरा में “सनातन” शब्द का अर्थ ही है—जो चिरपुरातन भी है और नित्य नूतन भी। अर्थात जो समय के साथ स्वयं को अभिव्यक्त करता रहे, परंतु अपने मूल सत्य को न छोड़े। इसी कारण अनेक विद्वान मानते हैं कि सनातन धर्म किसी एक पैगंबर, एक पुस्तक या एक ऐतिहासिक घटना से प्रारंभ होने वाली व्यवस्था नहीं, बल्कि हजारों वर्षों में विकसित हुई जीवन-दृष्टि है। इसमें विविध दर्शन, अनेक उपासना पद्धतियाँ, असंख्य देव-परंपराएँ, योग, वेदांत, सांख्य, न्याय, मीमांसा, भक्ति, तंत्र और लोक परंपराएँ सभी समाहित हैं। यही इसकी सर्वसमावेशी प्रकृति है।
भारत में धर्म का अर्थ केवल पूजा-पद्धति नहीं रहा। यहाँ धर्म का संबंध कर्तव्य, न्याय, सत्य और लोककल्याण से भी जोड़ा गया। महाभारत में कहा गया है—”धर्मो रक्षति रक्षितः” अर्थात जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है। यहाँ धर्म किसी संप्रदाय का नाम नहीं, बल्कि जीवन के नैतिक आधार का प्रतीक है। इसी कारण भारतीय संस्कृति में “वसुधैव कुटुम्बकम्”, “सर्वे भवन्तु सुखिनः” और “एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति” जैसे विचार विकसित हुए।
इतिहास के संदर्भ में यह तथ्य व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है कि भारतीय वैदिक परंपरा विश्व की प्राचीनतम जीवित सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं में से एक है। इसी प्रकार यह भी ऐतिहासिक तथ्य है कि यहूदी धर्म, ईसाई धर्म और इस्लाम अलग-अलग कालखंडों में विकसित हुए। सामान्य ऐतिहासिक समझ के अनुसार यहूदी परंपरा प्राचीन पश्चिम एशिया में विकसित हुई, ईसाई धर्म पहली शताब्दी ईस्वी में और इस्लाम सातवीं शताब्दी ईस्वी में अस्तित्व में आया। इसलिए कालक्रम की दृष्टि से भारतीय वैदिक-सनातन परंपरा अत्यंत प्राचीन मानी जाती है।
इसी संदर्भ में कुछ विचारकों का यह मत भी है कि मानव सभ्यता के आरंभिक चरणों में भारतीय उपमहाद्वीप की वैदिक-सांस्कृतिक परंपरा अत्यंत प्रभावशाली थी और इस दृष्टि से यह कहा जाता है कि हम सबके पूर्वज सनातनी, वैदिक आर्य थे। यह दृष्टिकोण सांस्कृतिक निरंतरता पर आधारित एक विचार है, किंतु इस विषय पर इतिहास, पुरातत्व, भाषाविज्ञान और आनुवंशिकी के क्षेत्रों में विभिन्न मत और शोध भी उपलब्ध हैं। इसलिए इस प्रकार के निष्कर्षों को एक विचारधारा या सांस्कृतिक व्याख्या के रूप में समझना अधिक उपयुक्त है, न कि सर्वमान्य ऐतिहासिक तथ्य के रूप में। फिर भी इसमें कोई संदेह नहीं कि भारतीय सभ्यता विश्व की सबसे प्राचीन और निरंतर जीवित सभ्यताओं में से एक है तथा उसने मानवता को दर्शन, योग, आयुर्वेद, गणित, ज्योतिष, भाषा, साहित्य और आध्यात्मिक चिंतन की अमूल्य विरासत प्रदान की है।
डॉ. गीतांजलि का यह कहना भी महत्वपूर्ण है कि किसी राजनीतिक दल का सनातन पर एकाधिकार नहीं हो सकता। वास्तव में सनातन किसी दल, संगठन या सत्ता का विषय नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की दीर्घकालिक धरोहर है। इसे राजनीतिक सीमाओं में बाँधना इसकी मूल भावना के विपरीत होगा। सनातन का सार समावेश, संवाद, विविधता और सत्य की खोज है।
आज जब विश्व हिंसा, कट्टरता, पर्यावरण संकट, मानसिक तनाव और सामाजिक विभाजन जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब भारतीय अध्यात्म की प्रासंगिकता पहले से अधिक दिखाई देती है। योग, ध्यान, आयुर्वेद और भारतीय जीवन-दर्शन का वैश्विक स्वीकार इसका प्रमाण है। यदि भारत को पुनः विश्वगुरु बनने की दिशा में आगे बढ़ना है तो वह केवल आर्थिक या सैन्य शक्ति के बल पर नहीं, बल्कि अपने सांस्कृतिक और आध्यात्मिक मूल्यों के माध्यम से ही संभव होगा।
अंततः डॉ. गीतांजलि जे. अंगमो का वक्तव्य एक बड़े विमर्श की ओर संकेत करता है। यदि सनातन को किसी संकीर्ण धार्मिक पहचान के बजाय सत्य, करुणा, आत्मानुशासन, सहिष्णुता, प्रकृति के प्रति सम्मान और समस्त मानवता के कल्याण की जीवन-दृष्टि के रूप में समझा जाए, तो यह भारतीय सभ्यता की उस शाश्वत चेतना का प्रतिनिधित्व करता है जो समय के साथ स्वयं को निरंतर नया रूप देती रही है। भारत की वास्तविक शक्ति उसकी इसी सांस्कृतिक निरंतरता, आध्यात्मिक गहराई और सर्वसमावेशी दृष्टि में निहित है। यही सनातन का सार है—जो चिरपुरातन भी है, नित्य नूतन भी, और जिसका अंतिम उद्देश्य समस्त मानवता का कल्याण है।

(लेखक आज अख़बार में नेशनल ब्यूरो हैं)





