लेखक -सुभाषचंद्र
पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट में जंतर मंतर पर पुलिस की कथित Exesses पर सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस सूर्यकांत जी ने कहा -Right to protest, peaceful protest, lawful protest, is absolutely guaranteed under the constitutional scheme. So long as there is a peaceful agitation, merely because there is an agitation, there can’t be excesses,” CJI Surya Kant said.
There should be a protocol in place. If they want to agitate on an issue… They should be provided with proper space… There should be no restriction or impediment in that. But if there is someone else, some anti-social element, or somebody has done anything wrong, that of course can be taken care of.”
देश ने देखा था कि किसानों का आंदोलन भी शांतिपूर्ण प्रदर्शन के नाम पर चला लेकिन कितनी शांति रही ये दुनिया ने देखा 26 जनवरी, 2021 को कथित किसानों ने हजारो ट्रैक्टरों के साथ दिल्ली मार्च निकाला।
पहले का रिकॉर्ड देख कर पुलिस ने चीफ जस्टिस शरद बोबडे से अपील की थी कि इस प्रदर्शन पर रोक लगा दीजिए क्योंकि भारी हिंसा हो सकती है लेकिन चीफ़ जस्टिस शरद बोबडे ने टका सा जवाब दिया था कि law and order संभालना आपका काम है।
कौन नही जानता कि उसके बाद ही भीषण दंगा हुआ लाल किले पर, तिरंगे का अपमान हुआ जिसके लिए केवल और केवल तत्कालीन चीफ़ जस्टिस बोबडे साहेब जिम्मेदार थे।
आप कथित छात्रों पर पुलिस ज्याददातियों पर ध्यान देने से पहले एक बात समझने की जरूरत को समझें कि पुलिस हुड़दंगियों से पिटने के लिए नहीं है।पुलिस वाले भी इंसान हैं उनके भी परिवार है और छात्रों के agitation के नाम पर उन पुलिस वालो पर हमला किया जाए, पथराव किया जाए और उनकी linching के कोशिश की जाए तो क्या इलाज है।
आप कैसे मान सकते हैं कि छात्रों के नाम पर प्रोटेस्ट में अपराधी शामिल नहीं हो सकते।
आप कहते है कि if there is someone else, some anti-social element, or somebody has done anything wrong, that of course can be taken care of.”
मगर यह भी बताइए ऐसे लोगों को कैसे Taken care of किया जाएगा पुलिस लाठीचार्ज करेगी तो आपको शिकायत पहुंच रही है कि छात्रों पर ज्यादती की गई ,ऐसे लोगों पर लाठीचार्ज छात्रों के नाम पर लगा दिया जाएगा जो किया जा रहा है।
सुनवाई करते हुए यह भी Demarcation होना चाहिए कि क्या शांतिपूर्ण प्रदर्शन होता है और क्या हिंसक होता है। इन कथित छात्रों के रूप में अराजकतत्वों ने देश को बांग्लादेश और नेपाल बनाने की धमकियां दी।
140 करोड़ जनता के प्रतिनिधि प्रधानमंत्री को भद्दी से भद्दी गालियां दी,मोदी साला भड़वा, मोदी साला चोर है, मोदी को माँ की गाली दी,किसी ने मोदी की तेरहवीं की ख़ुशी में berger पार्टी कर दी,भद्दे भद्दे पोस्टर लहराए गए, मीम बनाए गए और न जाने क्या क्या उलजुलूल अर्धनग्न लड़कियों ने मोदी जी के लिए कहा।
संसद भवन को उखाड़ फेकने की धमकी दी और धमकी देने वाले के साथ अभिजीत दिपके बैठकर मौज मस्ती कर रहे थे।
ये सब कुछ अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर बर्दाश्त नहीं किया जा सकता और ऐसी बातो के चलते “प्रदर्शन” को शांतिपूर्ण नहीं कहा जा सकता। ऐसी बाते प्रदर्शन को अलग तरीके से हिंसक रूप देती हैं।
आपके सुप्रीम कोर्ट में कोई जूता फेंकने की कोशिश करता है या फाइल फेंकता है तो वह बर्दाश्त नहीं किया जाता फिर देश और प्रधानमंत्री के लिए गाली गलौज कैसे बर्दाश्त की जा सकती है।
मुझे बस इतना कहना है कि पुलिस वालों को भी इंसान समझें और कथित छात्रों के लिए भावनाओं में मत बह जाइए – उनमें neet से प्रभावित छात्र तो थे ही नहीं और जो भी छात्र वहां थे उन्हें न neet का और न CBSE का फुल फॉर्म पता था।
हिंसा करना और अपने लोगों को हिंसा के लिए उकसाना एक बात है।
इरोम शर्मीला ने 2000 से 2016 तक अनशन किया था लेकिन उसके अनशन में कोई हिंसा नहीं हुई लेकिन आपने कभी उसकी चिंता नहीं की जैसे सोनम वांगचुक के लिए की।

(लेखक उच्चतम न्यायालय में वरिष्ठ अधिवक्ता हैं और यह उनके निजी विचार हैं)



