लेखक-अरविंद जयतिलक
♂÷यह राहतकारी है कि केंद्र सरकार ने झारखंड राज्य के गिरीडीह में पाश्र्वनाथ पहाड़ी पर स्थित जैन समुदाय के सर्वोच्च तीर्थस्थल श्री सम्मेद शिखर जी पर इको-टूरिज्म सहित हर तरह की पर्यटन गतिविधियों पर रोक लगा दी है। उसने राज्य सरकार को भी ताकीद किया है कि वह इलाके में इको सेंसेटिव जोन नोटिफिकेशन खंड-3 के प्रावधानों के क्रियान्वयन पर तुरंत रोक लगा दे। केंद्र सरकार की यह पहल अपनी आस्था को लेकर उद्वेलित और विचलित जैन समाज के लिए मरहम जैसा है। लेकिन यह कदम उठाने में देर हुई है। बहरहाल उम्मीद किया जाना चाहिए कि अब जैन समाज आंदोलन की राह त्याग कर सरकार की पहल से संतुष्ट होगा। गौर करें तो पिछले कई दिनों से जैन समाज श्री सम्मेद शिखर जी की पवित्रता की रक्षा के लिए आंदोलत था। यहां तक कि अनशन पर बैठे जैन मुनि सुज्ञेय सागर जी महाराज और समर्थ सागर जी महाराज अपनी जान गंवा चुके हैं। यह दुखद और मर्मांतक है। अगर समय रहते केंद्र व राज्य सरकार जैन समाज की भावनाओं का ध्यान रखा होता तो जैन मुनियों को अपनी जान नहीं गंवानी पड़ती। उल्लेखनीय है कि देशव्यापी आंदोलन को देखते हुए झारखंड सरकार ने केंद्र सरकार से श्री सम्मेद शिखर जी की पवित्रता बनाए रखने के लिए जैन समाज से मिले आवेदनों पर सार्थक निर्णय लेने की अपील की थी। इस अपील के बाद केंद्र सरकार का ध्यान इस ओर गया। फिलहाल सत्ता-सरकार को समझना होगा कि भारत एक धार्मिक देश है और सभी धर्मों व उनके आस्था केंद्रों का सम्मान सरकार का नैतिक कर्तव्य है। एक लोकतांत्रिक निर्वाचित सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वह अपने नागरिकों की भावनाओं और आस्था का सम्मान करे। निःसंदेह विकास का पहिया गतिमाना होना चाहिए लेकिन इसके एवज में किसी समाज की आस्था को दांव पर नहीं लगाया जा सकता। विचार करें तो जैन समाज एक अल्पसंख्यक और शांतप्रिय समाज है। वह भगवान महावीर और अन्य तीर्थंकरों के बताए अहिंसा के रास्ते पर चलता है। किंतु समझना कठिन है कि यह सब जानते-समझते हुए भी उनकी आस्था का ख्याल क्यों नहीं रखा गया? समय रहते ही उनकी आस्था के प्रति संवेदनशीलता क्यों नहीं बरती गयी? आखिर दो जैन मुनियों को अनशन पर बैठकर अपनी जान क्यों गंवानी पड़ी? अब भले ही केंद्र व राज्य सरकार इस मसले को पर्यटन विकास से जोड़कर अपनी संवेदनहीनता को छिपाने की कोशिश करे लेकिन सच यहीं है कि दोनों सरकारों ने जैन समाज की आस्था को हद तक लहुलूहान किया है। फिर हम इस नतीजे पर क्यों न पहुंचे कि किसी तीर्थस्थल की पवित्रता की रक्षा सरकार तभी करेगी जब समाज आंदोलनरत होगा? क्या सरकारों की यह समझ ठीक है? विचार करें तो जैन समाज की आस्था के मामले में ऐसा ही हुआ है। जैन समाज को श्री सम्मेद शिखर जी से जुड़ी पवित्रता और अपनी आस्था की रक्षा के लिए देश भर में आंदोलन चलाना पड़ा। यह मानने में हर्ज नहीं कि अगर जैन समाज आंदोलन की राह नहीं पकड़ा होता तो शायद उनकी आस्था कुचल दी गयी होती। बेशक केंद्र व राज्य सरकार की जिम्मेदारी है कि वह देश और राज्यों में पर्यटन को बढ़ावा दे। इससे राज्य की अर्थव्यवस्था सुधरती है और स्थानीय स्तर पर आय के नए-नए स्रोत विकसित होते हैं। लोगों को रोजगार मिलता है। लेकिन यह कहां तक उचित है कि आस्था के केंद्रों को पर्यटन केंद्र के रुप में तब्दील कर उसकी पवित्रता को भंग कर दी जाए? विचार करें तो श्री सम्मेद शिखर जी के मामले में ऐसा ही होता दिखा। ऐसा नहीं है कि केंद्र व राज्य सरकार श्री सम्मेद शिखर जी की महिमा और उनके प्रति जैन समाज की आस्था से अपरिचित थी। यह पौराणिक व ऐतिहासिक तथ्य है कि पाश्र्वनाथ पहाड़ी का नाम जैनों के 23 वें तीर्थंकर पाश्र्वनाथ जी के नाम पर पड़ा है। जैन धर्म के 24 तीर्थंकरों में से 20 तीर्थंकर समेत अनगिनत जैन संतों व मुनियों ने यहां निर्वाण प्राप्त किया। यह पवित्र भूमि है और इस पहाड़ी पर 25 मंदिरों में जैन तीर्थंकरों के चरण चिंह मौजूद हैं। यही नहीं इस पहाड़ी की तराई में स्थित मधुवन में कई प्राचीन मंदिरों का अस्तित्व विद्यमान है जिनके प्रति जैन समाज के करोड़ों लोगों की अगाध आस्था है। जिस तरह हिंदुओं के लिए काशी, अयोध्या और मथुरा है और मुसलमानों के लिए मक्का ठीक उसी प्रकार जैन समाज के लिए श्री सम्मेद शिखर जी का अगाध महत्व है। गौर करें तो श्री सम्मेद शिखर जी का सम्मान सिर्फ भारत के जैन समाज के लिए ही नहीं बल्कि दुनिया भर के जैन तीर्थयात्री यहां वंदना करने आते हैं। जैन संतों की माने तो यह सिद्धभूमि है और यहंा का कण-कण पूजनीय है। देखा जाता है कि यहां आने वाला हर जैन अनुयायी नंगे पैर निर्जल रहकर नए सूती परिधान में तकरीबन 27 किमी की कठिन वंदना-यात्रा पूरा करता है। शिखर जी की वंदना में 9 किमी की चढ़ाई, 9 किमी की वंदना और 9 किमी की उतराई है। जैन संतों का कहना है कि यह सरकार की जिम्मेदारी है कि वह इस तीर्थस्थल की पवित्रता को भंग न होने दे तथा इसे अतिशीध्र पवित्र तीर्थ क्षेत्र घोषित करे। श्री सम्मेद शिखर जी से जुड़े विवाद पर नजर दौड़ाएं तो यह मामला तब तूल पकड़ा जब झारखंड की सरकार ने 23 जुलाई 2022 को राज्य के पर्यटन उद्योग को बढ़ावा देने के लिए नई झारखंड पर्यटन नीति 2021 की घोषण की। दरअसल सरकार का मकसद राज्य में धार्मिक-सांस्कृतिक महत्व के स्थानों को पर्यटन केंद्र के रुप में विकसित कर राज्य की अर्थव्यवस्था को गति देना था। इसके लिए उसने पारसनाथ पहाड़ी, मधुवन और इटखोरी को चिंहित किया। राज्य सरकार ने इस लक्ष्य को साधने के लिए 2 अगस्त 2019 को केंद्र सरकार से सिफारिश किया कि वह पारसनाथ पहाड़ी यानी श्री सम्मेद शिखर जी के एक हिस्से को वन्य जीव अभ्यारण्य और इको सेंसेटिव जोन नोटिफाई करे। राज्य सरकार की इस सिफारिश के आधार पर ही केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने गजट जारी कर इसे वन्य जीव अभ्यारण्य और इको सेंसटिव जोन के रुप में नोटिफाई किया। इसके बाद मामला तूल पकड़ लिया। जैन समाज श्री सम्मेद शिखर जी की पवित्रता की रक्षा के लिए सड़क पर उतर आया। देश के सभी हिस्सों में सरकार के निर्णय का विरोध होने लगा। थोड़ा पीछे जाएं तो हेमंत सरकार से पहले रघुवर सरकार ने 26 फरवरी 2019 को एक गजट नोटिफिकेशन जारी कर गिरिडीह के पारसनाथ मधुवन का उल्लेख पर्यटन स्थल के रुप में किया। यानी गौर करें तो श्री सम्मेद शिखर जी का मामला किसी एक सरकार की संवेदनहीनता से नहीं जुड़ा रहा। इसके लिए केंद्र व राज्य सरकार दोनों बराबर की जिम्मेदार हैं। आस्था से जुड़ा पाश्र्वनाथ पहाड़ी की भौगोलिक परिदृश्य पर नजर दौड़ाएं तो यह पूरा इलाका तकरीबन 6490 हेक्टेयर क्षेत्र में पसरा है। इसमें 4933 हेक्टेयर में एक पारसनाथ वाइल्ड सेंचुरी है। यह इलाका सिर्फ जैन समाज की आस्था से ही नहीं जुड़ा है। बल्कि यह इलाका संथाल जनजाति के लोगों की आस्था से भी जुड़ा हुआ है। वे इसे मारंग बुरु के रुप में पहचानते हैं। वे पूरी श्रद्धा से हर वर्ष यहां अपना पारंपरिक त्यौहार मनाते हैं। इस पर्वत पर स्थित जुग जाहेर थान की पूजा करते हैं। ऐसे में इस क्षेत्र की धार्मिक-सांस्कृतिक स्वीकारोक्ति और संवेदनशीलता अधिक बढ़ जाती है। जैन समाज का तर्क है कि पाश्र्वनाथ पहाड़ी आस्था का केंद्र है न कि पर्यटन स्थल। अगर सरकार इसे पर्यटन केंद्र के रुप में विकसित करती है तो यहां आने-जाने वाले पर्यटक मांस-मदिरा का सेवन करेंगे। इससे श्री सम्मेद शिखर जी की पवित्रता भंग होगी। जैन समाज की मांग यह भी है कि यहां के 25 किमी के दायरे को पूरी तरह से पवित्र स्थल घोषित कर दिया जाए। अच्छी बात यह है कि केंद्र सरकार जैन समाज की भावना और उनकी आस्था का सम्मान करते हुए श्री सम्मेद शिखर जी की पवित्रता के प्रति नतमस्तक और आस्थावान हुई है। यह स्वागतयोग्य है।

÷लेखक राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं÷




