लेखक-अरविंद जयतिलक
♂÷पाकिस्तान में गहराते आर्थिक संकट ने उसे कंगाली के कगार पर खड़ा कर दिया है। इस बदहाली का मुख्य कारण उसका बढ़ता हुआ कर्ज, विदेशी मुद्रा भंडार और निर्यात में कमी तथा आयात का बढ़ना है। आज की तारीख में उसका विदेशी मुद्रा भंडार 16.1 फीसदी की तीव्र गिरावट के साथ दस साल के सबसे निम्नतम स्तर पर पहुंच चुका है। उसके केंद्रीय बैंक स्टेट बैंक आॅफ पाकिस्तान (एसबीपी) की मानें तो पिछले वित्त वर्ष के अंत में उसका विदेशी मुद्रा भंडार सिर्फ 3.09 अरब डाॅलर पर आ गया है। इसमें से तीन अरब डाॅलर सऊदी अरब और यूएई के हैं लिहाजा वह इसे खर्च भी नहीं कर सकता। क्यांेकि यह गारंटी डिपाॅजिट हैं। फिलहाल पाकिस्तान के पास जो विदेशी मुद्रा भंडार बचा है उससे वह सिर्फ तीन हफ्तों की आयात जरुरतों का पूरा कर सकता है। इससे साफ जाहिर होता है कि पाकिस्तान आर्थिक बदहाली के कगार पर पहुंच चुका है। उसका रुपया अमेरिकी डाॅलर के मुकाबले तकरीबन 270 रुपए के भाव पर कारोबार कर रहा है। उसकी आर्थिक हालात को देखते हुए अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने 1.2 अरब डाॅलर के कर्ज की तीसरी किस्त देने को तो तैयार है लेकिन उसकी कठोर शर्तों की वजह से पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की बेचैनी बढ़ गयी हैं। प्रधानमंत्री शहबाज खान ने स्वीकार भी किया है कि आईएमएफ की जो शर्तें हैं वह ज्यादा सख्त और खतरनाक हैं। लेकिन उनके पास दूसरा कोई विकल्प भी नहीं है। पाकिस्तान के हालात पर नजर दौड़ाएं तो उत्पादन और खपत दोनों में जबरदस्त गिरावट है। रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतें आसमान छू रही हैं। लाखों परिवारों के सामने भूखमरी की स्थिति है। आटा, दाल और चावल जैसी रोजमर्रा की वस्तएं खरीदने के लिए लोगों को सोचना पड़ रहा है। हालात इतने खराब हैं कि रोटी के लिए लोग जान गंवा रहे हैं। उधर, आयात से भरे शिपिंग कंटेनर बंदरगाहों पर जमा हो रहे हैं। क्योंकि खरीदार उनके लिए भुगतान के लिए डाॅलर सुरक्षित रखने में विफल साबित हो रहे हैं। रोलिंग ब्लैक आउट और विदेशी मुद्रा की भारी कमी के कारण कल-कारखने के पहिए ठप्प पड़ते जा रहे हैं। पेट्रोल और डीजल की कीमतें 250 रुपए प्रति लीटर के पार पहुंच चुकी है। मिट्टी के तेल की कीमत भी 190 रुपए प्रति लीटर के आसपास है। दूसरी ओर बिजली की आपूर्ति ठप्प पड़ती जा रही है। इस समय सिर्फ 20 हजार मेगावाट बिजली का उत्पादन हो रहा है जबकि बिजली की डिमांड 30 हजार मेगावाट से अधिक है। नेशनल ग्रिड बार-बार फेल हो रहा है। इसका असर न सिर्फ कल-कारखानों पर पड़ रहा है बल्कि अस्पतालों में आॅपरेशन थिएटर भी बंद करना पड़ रहा है। आर्थिक विश्लेषकों की मानें तो हालात नहीं सुधरे तो आने वाले दिनों में पाकिस्तान की स्थिति श्रीलंका जैसी हो सकती हैं। भविष्यवाणी तो यह भी की जा रही है कि मई आते-आते देश डिफाल्ट होने की स्थिति में पहुंच जाएगा। सबसे बुरा हाल आम आदमी का है। उसके जीवन पर संकट है। क्योंकि खाद्य वस्तुओं की कीमतें आसमान छूने लगी है। नतीजा सड़कों पर दंगे जैसे हालता उभर रहे हंै। गरीबी और बेरोजगारी रिकार्ड स्तर पर पहुंच चुका है। युवाओं की आबादी का बड़ा हिस्सा नौकरी की तलाश में देश छोड़ रहा है। बीते साल 10 लाख युवाओं ने पाकिस्तान से पलायन किया है। गरीबी के कारण स्थिरता और सुरक्षा देने वाली सामाजिक-पारिवारिक व्यवस्था चरमरा उठी है। विडंबना यह कि एक ओर देश का आम आदमी आटे और चावल के अकाल का सामना कर रहा है वहीं देश में नेता और सेना के अधिकारियों की संपत्ति दिन दूनी और रात चैगुनी बढ़ रही है। सच कहें तो देश खजाना खत्म होने के लिए नेता और सेना के अधिकारी ही जिम्मेदार हैं। इसका फायदा आतंकी संगठन उठा रहे हैं और देश को बारुद के ढ़ेर पर रख दिया है। आए दिन बम विस्फोट में लोगों की जान जा रही है। देश में आतंकवाद की वजह से मानसिक स्वास्थ्य के रोगियों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। हद तो यह है कि 20 करोड़ पाकिस्तानियों के लिए देश में सिर्फ 450 प्रशिक्षित मानसिक चिकित्सालय हैं। आंकड़ों पर नजर दौड़ाएं तो आज पाकिस्तान की एक तिहाई आबादी गरीबी रेखा से नीचे है। नए मानकों के आधार पर जुटाए गए आंकड़ों के अनुसार पाकिस्तान में गरीबी रेखा से नीचे जीवन गुजर-बसर करने वाल लोगों की तादाद 8 करोड़ से पार है। पाकिस्तान के केंद्रीय योजना व विकास मंत्रालय के मुताबिक देश में गरीबों को अनुपात बढ़कर 40 फीसदी के पार पहुंच चुका है। जबकि 2001 में गरीबों की तादाद दो करोड़ थी। आश्चर्य होता है कि एक ओर देश के हुक्मरान विकास का दावा करते हैं वहीं दूसरी ओर गरीबी का लगातार विस्तार हो रहा है। भूखमरी से हर दिन सैकड़ों लोगों की जान जा रही है। रोजगार के अवसर घट रहे हैं और कर्ज का बोझ बढ़ता जा रहा है। आज की तारीख में पाकिस्तान के हर नागरिक पर तकरीबन 1 लाख 50 हजार रुपए से अधिक का कर्ज है। किसानों की हालत बेहद दयनीय है। गरीबी और कर्ज में डूबे होने की वजह से उनकी आत्महत्या की घटनाएं बढ़ रही हैं। इससे सामाजिक ताना-बाना बिखर रहा है। आतंकी संगठन नौजवानों को पैसों का लालच देकर आतंकी बनने को मजबूर कर रहे हैं। नतीजा सामने है। आज पाकिस्तान की स्थिति इराक, सीरिया और लेबनान से भी बदतर हो चुकी है। वहां की राष्ट्रीय आंतरिक सुरक्षा नीति यानी एनआइएसपी के मुताबिक 2001 से 2020 के बीच हिंसा की 21000 से अधिक घटनाएं हो चुकी हैं। गौर करें तो यह आंकड़ा इराक में हुई घटनाओं से ज्यादा अधिक है। अमेरिकी संगठन स्टार्ट की मानें तो पाकिस्तान में इराक से अधिक हमले हुए हैं। विचार करें तो इसके लिए पाकिस्तान स्वयं जिम्मेदार है। वह अपनी धरती पर आतंकियों को प्रश्रय देने के साथ वैश्विक समुदाय से मिल रही आर्थिक मदद को विकास पर खर्च करने के बजाए भारत विरोधी आतंकी गतिविधियों पर खर्च कर रहा है। आतंकवाद पर उसके लचर रवैए का नतीजा है कि आज उसके एक बड़े भू-भाग पर परोक्ष रुप से आतंकियों ने कब्जा कर रखा है। एक दशक से उसके हुक्मरान दहशतगर्दी को नेस्तनाबूद करने का राग अलाप रहे हैं लेकिन परदे के पीछे आतंकियों की मदद कर रहे हैं। याद होगा वर्ष 2016 में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केरल के कोझिकोड की रैली में विशाल जनसमुदाय को संबोधित करते हुए पाकिस्तान के अवाम का आह्नान किया था। उन्होंने कहा था कि उन्हें अपने हुक्मरानों से सवाल पूछना चाहिए कि उनके हुक्मरानों ने किस तरह का देश बना रखा है जिसकी छवि आतंकी देश जैसी बन रही है। उन्हें सवाल पूछना चाहिए कि उनके हुक्मरान अशिक्षा, गरीबी और बेरोजगारी से लड़ने के बजाए आतंकवाद से कंधा क्यों जोड़े हुए हंै। उनसे पूछना चाहिए कि एक साथ आजादी प्राप्त करने के बाद भी क्या कारण है कि भारत साॅफ्टवेयर का निर्यात कर रहा है और उसके हुक्मरान आतंकवाद का निर्यात कर रहे हंै। उन्होंने पाकिस्तान के हुक्मरानों को आईना दिखाते हुए यह भी कहा कि भारत-पाकिस्तान के बीच बेरोजगारी खत्म करने और गरीबी मिटाने के लिए मुकाबला होना चाहिए। यह देखना चाहिए कि कौन-सा देश इन समस्याओं को पहले खत्म करता है। प्रधानमंत्री मोदी का यह कडुवा संदेश तब पाकिस्तानी हुक्मरानों को खूब चुभा था। लेकिन पाकिस्तान और विश्व की मीडिया में प्रधानमंत्री मोदी के इस संदेश की खूब सराहना हुई। दुनिया भर में संदेश गया कि भारत अपने पड़ोसी को लेकर कितना संवेदनशील है। लेकिन पाकिस्तान के रुख में तनिक भी परिवर्तन नहीं आया। वह भारत विरोधी अपने पुराने रुख पर कायम है। नतीजा सामने है। आज भारत विश्व की पांचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश है वहीं पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष से मिलने वाली सहायता पर निर्भर होकर रह गयी है। अगर पाकिस्तान के हालात नहीं सुधरे तो तय मानिए कि आने वाले वर्षों में उसके टुकड़े-टुकड़े होना तय है।

÷लेखक राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं÷




