लेखक~जितेन्द्र सिंह
माफ़िया अतीक व अशरफ़ अहमद,मुख़्तार व अफ़ज़ल अन्सारी के केस में कुछ वर्षों पूर्व कई जजों ने किया था सुनवाई से इनकार, अब पत्रकार भावना व राहुल गाँधी के लिए भी जज ने किया था केस से अलग
♂÷दो दिन पहले “टाइम्स नाउ नवभारत” न्यूज़ चैनल की पत्रकार भावना की नियमित जमानत और कैमरामैन तथा ड्राइवर की जमानत की सुनवाई पंजाब हाई कोर्ट में लिस्टेड थी और जैसे ही जज साहब चेंबर में आए उन्होंने एक लाइन लिख दिया “नॉट बिफोर मी” ..यानी खुद को इस सुनवाई से अलग कर लिया।
इसके पहले पूर्व काँग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने जो मोदी समुदाय पर आपत्तिजनक बयान दिया था उसकी गुजरात हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान एक महिला जज ने “नॉट बिफोर मी” लिख कर अपने को गाँधी के केस से अलग कर लिया था।
लाख टके का प्रश्न है कि जज लोग सिर्फ “नॉट बिफोर मी” क्यों लिखते हैं। वह पूरा कारण बताएं कि वह किस कारण से खुद को इस याचिका को सुनने से इनकार कर रहे हैं।
पूर्व में कुछ जजों ने पूरा कारण बताया भी है जैसे एक जज ने दो कंपनी के विवाद में यह कहकर याचिका को “Not Before Me” कर दी है कि मैं इसमें से एक कंपनी का पूर्व में वकील रह चुका हूं, एक जज ने भी यह कारण लिखा था कि इसमें उनके हितों का टकराव है क्योंकि उनकी पत्नी इससे जुड़ी हुई है लेकिन 1% से भी कम जज लोग पूरे कारणों को बताते व लिखतेंहैं।
इस गम्भीर विषय पर जहाँ भारत के मुख्य न्यायाधीश महोदय को स्वतः संज्ञान लेकर कड़े दिशा निर्देश देने चाहिए तो वहीं केंद्रीय सरकार को एक सख्त कानून बना देना चाहिए कि केस की सुनवाई करना आपकी ड्यूटी है और आप इससे इनकार नही कर सकते।
ऐसे कतिपय जज साहबान लोंगो को यह समझना चाहिए कि देश की जनता उनसे यह अपेक्षा रखती है कि जब आप जस्टिस चेयर पर बैठते हैं तो आप न तो किसी के लगे-सगे होते हैं न ही किसी के लिए पक्ष-विपक्ष,आप सिर्फ़ और सिर्फ़ न्यायकर्ता होते हैं और आप साहबान को निडरता पूर्वक सुनवाई कर फ़ैसला देने की महती जिम्मेदारी बनती है।
फ़िर भी कोई भी जज यदि इस याचिका पर “Not Before Me” करता है तो वह खुल कर बताएं क्या उन्हें डर है, भय है या उन्हें लालच दिया गया है।
जज महोदय जब आपका काम ही है मुकदमों की सुनवाई कर फ़ैसला देने का और आप इसी बात की मोटी सैलरी ले रहें हैं, दूसरे भत्ते ले रहें हैं टैक्सपेयर के गाढ़ी कमाई के पैसे पर, तब आप साहबान लोग कैसे काम करने से इंकार कर दे रहें हैं यह तो आपकी ड्यूटी बनती ?
क्या कोई सेना का अधिकारी युद्ध मैदान में “नॉट बिफोर मी” कहकर लड़ने से इंकार कर सकता है? क्या हम किसी बैंक में जाएं और बैंक मैनेजर “Not Before Me” कहकर हमें दूसरे बैंक जाने पर मजबूर कर सकता है ?
क्या हम किसी बस में बैठे और ड्राइवर “Not Before Me” कह कर बस चलाने से इंकार कर सकता है?
क्या हम ट्रेन,एयरप्लेन में बैठे हैं और अचानक ट्रेन चालक या पायलट “Not Before Me” कहकर प्लेन या ट्रेन से उतार सकता है।
जब भारत में किसी भी सरकारी कर्मचारी को यह अधिकार नहीं मिला है कि वह जिस काम के लिए रखा गया है वह काम करने से इंकार करें तब इन जजों को यह सुविधा क्यों मिली हुई है अपनी ड्यूटी से हटने के लिए?
और यदि यह सुविधा मिली है तब जनता को यह जानने का पूरा हक व अधिकार बनता है कि आखिर किस कारण से यह खुद को इस सुनवाई से अलग कर रहे हैं।
अपुष्ट चर्चा है कि पंजाब सरकार ने हाई कोर्ट के जज को कह दिया था अगर आपने मेरिट पर फैसला दिया तब आपको………?
स्मरण हो कि उत्तरप्रदेश में दशकों तक आतंक का पर्याय बने रहने वाले माफ़िया ब्रदर्स अतीक अहमद,अशरफ़ अहमद,मुख्तार अन्सारी, अफजल अन्सारी के मुकदमों की सुनवाई करने से बहुत से जजों ने “Not For Me” लिख कर अपने को माफियाओं के केस की सुनवाई से अलग करने का इतिहास है।
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
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