लेखक~मुकेश सेठ
दो बीघा ज़मीन,वक़्त, हमलोग और काबुलीवाला फ़िल्म को अपने जीवन्त अभिनय से कालजयी बना गए बलराज साहनी
महात्मा गांधी ने अपने साथ काम करने के दौरान बलराज साहनी को भेजा था लन्दन वापस लौटे तो फ़िल्मो में मिला पहला ब्रेक
♂÷भारतीय हिन्दी सिनेमा जगत के इतिहास में कुछेक ऐसे विरले कलाकार हुए जिन्होंने अपने अद्भुत व अद्वितीय अभिनय से दर्शकों को मोहपाश में बांध रखा है तो वहीं फ़िल्म जगत भी ऐसे अभिनय के महारथी को पाकर दशकों से ख़ुद को धन्य मान इतरा रहा है।
हम बात कर रहे हैं उन सुप्रसिद्ध अभिनेता और लेखक बलराज साहनी की जिन्होंने ‘हम लोग’, ‘दो बीघा जमीन’, ‘वक्त’ और ‘काबुलीवाला’ जैसी फिल्मों के जरिए गूढ़ संदेश समाज को देने की सफ़ल कोशिश की।
आज के पाकिस्तान व तब के अखण्ड भारत के पँजाब सूबे के “भेरा” में अपने माता-पिता को धन्य कर 1 मई वर्ष 1913 में जन्म लेने वाले बलराज साहनी ऐसे कलाकार के रूप में याद किये जाते हैं कि जिन्होंने अपनी कोई एक्टिंग स्टाइल न बनाकर फ़िल्म की कहानी के पात्रों में जीवन्त रूप से ढलकर बहुआयामी अभिनय कला का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर उस क़िरदार को अमर कर दिया।
वामपंथी विचारधारा वाले बलराज साहनी मजदूरों-मेहनतकश ग़रीब तबक़े के लोगों से वह हृदय से लगाव रखते थे।
बलराज साहनी का वास्तविक नाम युधिष्ठिर साहनी था,उनको प्रारम्भ से ही शिक्षा के प्रति गहरा जुनून था उन्होंने “एमए इन इंग्लिश लिटरेचर” की डिग्री हासिल करने के पश्चात कलकत्ता जो अब कोलकाता कहलाता है में गुरुदेव रविन्द्रनाथ टैगोर के शांति निकेतन में लेक्चरर के पद पर कार्य किया।
वर्ष 1938 में बलराज साहनी नें महात्मा गांधी जी के साथ भी मिलकर काम किया,महात्मा गाँधी ने उनकी प्रतिभा को पहचान उनको वर्ष 1939 में ब्रिटेन की राजधानी लन्दन भेजा।
लन्दन में उन्होंने 4 साल तक BBC के लिए बतौर रेडियो उद्घोषक के रूप में काम करने के बाद वह वर्ष 1943 में पुनः हिंदुस्तान वापस आ गए।फ़िर वह पीपुल थियेटर एसोसिएशन(इप्टा) से जुड़े जहाँ उनकी भेंट ख़्वाजा अहमद अब्बास से हुई।अब्बास ने आगे चलकर साल 1946 में प्रदर्शित हुई फ़िल्म “धरती के लाल” में अभिनय के लिए चुना।
इस फ़िल्म में उन्होंने अपनी अदाकारी से दर्शकों को आकर्षित तो किया किन्तु उनको जबरदस्त पहचान मिली वर्ष 1951 में रिलीज़ हुई फ़िल्म “हम लोग”से।
उसके बाद वर्ष 1953 में पर्दे पर प्रदर्शित फ़िल्म “दो बीघा जमीन” में उनके कालजयी किरदार को अपने अभिनय से जीवन्त कर डालने वाले साहनी देश दुनियां के दर्शकों में गहरे जा बसे।
कहा जाता है कि बलराज साहनी पर्दे के किरदारों को जीवन्त बनाने के लिए उसको असल जिंदगी में उतार कर जीने लगते थे।सुप्रसिद्ध अभिनेता दिलीप कुमार के कहने पर वर्ष 1951 में फ़िल्म “हलचल” के निर्माता के.आसिफ़ ने बलराज साहनी को फ़िल्म में जेलर का रोल दिया।बलराज भी जेलर के किरदार को निभाने के लिए बेहद उत्साहित थे और वह प्रोड्यूसर के.आसिफ़ के साथ ऑर्थर रोड जेल जा पहुँचे और तय किया कि वह जेलर के साथ कुछ दिन जेल में रहकर अपने जेलर के रोल को जीवन्त बनाने पर बिताएंगे।
इसी दौरान एक दिवस बलराज साहनी एक जुलूस में शामिल थे जिसमें हिंसा भड़क उठी,पुलिस ने कई लोगों के साथ फ़िल्म अभिनेता बलराज साहनी को भी गिरफ्तार कर जेल भेज दिए गए।
इस वाकये को सुनकर के.आसिफ़ साहनी से मिलने जेल जा पहुँचे,जेलर चूंकि मशहूर अभिनेता बलराज साहनी को पहचानता था और के.आसिफ़ ने अपनी फ़िल्म “हलचल”के लिए बलराज साहनी के जेलर के रोल के लिए जेल में रहते हुए भी शूटिंग करने की इच्छा जताई।जिस पर जेलर ने उन्हें इसकी इजाज़त दे दी और बलराज साहनी प्रत्येक दिन सुबह शूटिंग पर जाते और शाम को वापस जेल के अपने बैरक में लौट आते थे,इस तरीके से लगभग तीन महीने तक बलराज साहनी ने जेल में रहते हुए भी “हलचल” फ़िल्म की शूटिंग की थी।

इसी तरह से कालजयी फ़िल्म “दो बीघा ज़मीन” से उनके जुड़ने का किस्सा भी दिलचस्प है।फ़िल्म निर्माता विमल रॉय ने इस फ़िल्म के लिए पहले अशोक कुमार, त्रिलोक कपूर और नाजिर हुसैन के नाम पर विचार किया था किन्तु इसी दौरान उन्होंने बलराज साहनी की फ़िल्म”हमलोग” देखी और मन में ठाना की मुख्य भूमिका बलराज साहनी ही करेंगे।
उन्होंने बलराज साहनी को अपने ऑफिस में बुलाया तो वह सूट बूट में उनके ऑफिस जा पहुँचे।साहनी को देखकर विमल रॉय ने सोचा कि फ़िल्म के किरदार नौजवान रिक्शेवाले के एंगल से साहनी कहीं से भी ऐसे नही नज़र आ रहे हैं कि वह नौजवान रिक्शेवाले का रोल बखूबी निभा सके।जिसपर विमल रॉय ने कहा कि मिस्टर साहनी आप किरदार में बिल्कुल फ़िट नही बैठते क्योंकि मेरी फिल्म का किरदार एक ग़रीब रिक्शाचालक का है।
इस पर बलराज साहनी ने उनसे अनुरोध किया कि वह उनकी फ़िल्म “धरती के लाल” एक बार अवश्य देंखे।फ़िल्म देखने से बलराज के अभिनय से अभिभूत विमल रॉय ने गरीब रिक्शा चालक की भूमिका उनको दी।जिस पर साहनी ने अपने किरदार को पर्दे पर जीवन्त उतारने के लिए बम्बई की सड़कों पर रोजाना कई-कई घण्टों तक रिक्शा खिंचते थे।
बलराज साहनी ने वर्ष 1936 में दमयंती साहनी से विवाह किया जो उनकी फ़िल्म “गुड़िया” की नायिका रह चुकी थी किन्तु दुर्भाग्य से दमयंती साहनी का कम उम्र में ही निधन हो गया,दो साल के बाद वर्ष 1947 में बलराज साहनी ने सन्तोष चन्डोक से पुनः विवाह किया।
साहनी के बारे में कहा जाता है कि वह तैराकी के बहुत शौकीन थे इसके इतर वे सामाजिक कार्यो में भी बढ़चढ़कर हिस्सा लेते थे।
बलराज साहनी के अभिनेता पुत्र परीक्षित साहनी ने एक बार अपने साक्षात्कार में बताया था कि पिता के साथ उनका रिश्ता पिता-पुत्र का नही बल्कि अनोखा ही रहा।उन्होंने शुरू में ही मुझसे कहा कि मुझे अपना पिता मत समझ,मैं तेरा दोस्त हूँ।वो कहते थे कि मेरे पीछे क्यों सिगरेट पीते हो मेरे सामने पियो।कभी कोई बात मुझसे मत छुपाना।
परीक्षित साहनी ने आगे बताया था कि पहली बार सिगरेट हो या फ़िर वाइन मैंने अपने पिताजी के सामने ही पीनी शुरू की थी।
ऐसा था मेरा पिताजी के साथ अनोखा रिश्ता।
कहना अतिश्योक्ति नही होगा कि हिन्दी फ़िल्म जगत में बलराज साहनी जैसे उम्दा,उत्कृष्ट व ख़ुद में अभिनय की चलती फ़िरती संस्थान जैसे बेजोड़ कलाकार, न भूतों न भविष्यतों की श्रेणी में रखे जा सकते हैं।जिन्होंने अपने क़िरदार में समाकर जीवन्त अभिनय से उन फिल्मों को देश दुनियां के सिने प्रेमियों के मन मस्तिष्क में अमिट स्मृति छोड़ अमरत्व प्रदान कर दिया।

÷लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं÷




