लेखक~वाचस्पति शर्मा
जर्मनी में जन्में कार्ल मार्क्स मुफलिसी में जीवन गुजारने के बाद भी लड़ते रहे पूँजीवादी ताक़तों से,उनके समाजवादी विचारधारा नें दुनियां को बांट दिया दो खेमों में
♂÷विश्व के मानव इतिहास में अपने विचार,विचारधारा और सिद्धान्तों को लेकर जितने भी सर्वाधिक प्रभावशाली शख्स हुए हैं जिन्होंने विश्व को प्रभावित करनें में सफ़ल रहे हैं तो उनमें सबसे अधिक चर्चा होती है जर्मनी की धरती पर जन्म लेने वाले कार्ल मार्क्स की।
ये कोई व्यक्तिपूजक अतिशयोक्तिपूर्ण कथन नहीं वरन एक सच्चाई है।
कार्ल मार्क्स के बाद पूरी दुनिया दो भागों में बंट गयी।
एक वो जो कार्ल मार्क्स को मानते हैं और एक वो जो इसके विरोध में रहतें हैं।
ये वैचारिक द्वन्द मात्र व्यक्तिगत या दर्शन की सीमा में ना होकर राजनितिक आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से इतना आगे गया की पूरी दुनिया का भूगोल संस्कृति और राजनितिक व्यवस्था परिवर्तित हो गयी.
दूसरी दुनिया , तीसरी दुनिया , समाजवादी स्टेटस , पूंजीवादी स्टेटस के नाम पर दुनिया भर के देश अपने अपने खेमों में बट गए। शीत युद्ध के नाम पर लगभग 70 साल लंबा वैचारिक युद्ध चला।
और जो लोग इस विषय को समझते हैं वो जानतें हैं की ये युद्ध अभी भी चल रहा है।
या कहें कि ये वैचारिक युद्ध आज और भी ज्यादा भीषण तरीके से चल रहा है।
दुनिया में शायद ही कोई देश ऐसा हो जहाँ पर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी अस्तित्व में ना हो। और दुनिया दुनिया का कोई कोना ऐसा नहीं जहाँ मार्क्स के सिद्धांतों को मानने वाले ना हों।
÷मार्क्सवाद है क्या ,और ये क्यों हमेशा बहस में रहता है ?♀
असल में मार्क्स से पहले जितने भी दार्शनिक हुए उन्होंने दुनिया भर के विषयों को अपने अपने तरीके से व्याख्यायित किया। लेकिन उनके दर्शन में एक बहुत बड़ी खामी रही थी।
वो खामी थी की उन सभी दर्शनों में भाववाद , आदर्शवाद या उदारवाद का शामिल होना।
मतलब कुछ ऐसा समझिये की – यदि कोई दर्शन गरीबी या किसी आर्थिक या राजनितिक समस्या के बारे में बात करता था तो वो अंततः उसका कोई तकनिकी हल ना देकर उसे किसी तीसरी शक्ति , परमेश्वर या ईश्वर या ऐसे ही किसी भाववादी कारण में लपेट के छोड़ देता था।
इससे होता ये था की समस्या के हल के लिए जनता किसी अवतार या किसी चमत्कार के भरोसे वाले दर्शन में उलझ जाती थी।
लेकिन मार्क्स ने मानव समाज की हर सांस्कृतिक ,आर्थिक और सामाजिक समस्या के विश्लेषण में भाववाद को बिलकुल अलग रखा।
उन्होंने कहा की समाज में होने वाले हर परिवर्तन, हर विकास और हर समस्या का कारण इस समाज में ही मौजूद है। इसे समझने और सुधारने के लिए किसी भी तीसरी शक्ति और चमत्कार की जरुरत नहीं होती है।
अगर हम सिलसिलेवार द्वंद्वात्मक तरीके से घटनाओं का अध्यन करें तो हम उसके कारण समझ सकतें हैं,और ये भी समझ सकतें है की आगे क्या होने वाला है।
÷क्या मार्क्सवाद फेल दर्शन हैं ?♀
मार्क्सवाद को फेल कहने वालों के दिमाग में अक्सर रूस चीन और बंगाल की सरकारें रहती है.
और लेटेस्ट उद्दाहरण वो लोग आपको वेनेजुएला का देते मिल जाएंगे।
मार्क्सवाद को फेल कहने वाले असल में रूस और अन्य समाजवादी मॉडल्स को फेल हो जाने को मार्क्सवाद का फेल हो जाना कहते हैं। उनका तर्क होगा की साहब जो भी सरकार मार्क्सवाद के हिसाब से देश के संसाधन फ्री में लुटाती है वो फेल हो जाती है। और ये कुतर्क मूर्खता की इस सीमा तक जाता है की वो केजरीवाल और कांग्रेस की वेलफेयर स्कीम्स को भी वामपंथी या मार्क्सवादी समाजवाद के उद्दाहरण के रूप में देकर कु-वैचारिक धींगामुश्ती करते है ये बहुत ही हास्यास्पद है।
असल में ये लोग समझतें है की मार्क्स ने समाजवाद या साम्यवाद को लाने और स्थापित करने का आह्वान किया था , और वो हो नहीं पाया इसलिए मार्क्सवाद एक फेल दर्शन हैं।
जबकि मार्क्स ने समाजवाद या साम्यवाद से ज्यादा ,लगभग 80% से ज्यादा अपनी थ्योरी में पूंजीवाद का विश्लेषण किया था।
या यूँ कहें की पूंजीवाद के लक्षण , उसके विकास, पूंजीवाद में आने वाले आर्थिक और सांस्कृतिक संकट और उसकी अंतिम परिणीति लिखने में ही मार्क्स ने अपना अधिकतर साहित्य लिखा था।
तो उन क्षीणबुद्धि के लिए ये समझना जरुरी है कि – वर्तमान में आने वाले आर्थिक संकटों के विश्लेषण के मूल में मार्क्सवाद ही होता है।
या संक्षेप में ये समझें की – पूंजीवाद में आने वाले आर्थिक , सामाजिक और सांस्कृतिक संकट के हर कदम का विश्लेषण मार्क्सवाद ही कहलाता है।
मार्क्स ने अपनी पूरी ज़िन्दगी यही किया था।
समाजवाद और साम्यवाद तो उनकी सकरात्मक अपेक्षाएं थी। जो की बाद में सही साबित हुईं।
÷ मार्क्स का व्यक्तिगत जीवन , परिवार , रिश्तें और गरीबी♀
मार्क्स जर्मनी के प्रशिया प्रांत में पैदा हुए थे।
मार्क्स की जीवटता बेमिसाल थी।
धर्म ,इतिहास , अर्थशास्त्र , गणित , दर्शन ,विज्ञान से लेकर कोई विषय ऐसा नहीं जिसे मार्क्स ने न छुआ हो।
उन्हें कई भाषाओं का ज्ञान था। अपने अंतिम दिनों में भी वो शायद रूसी और चीनी भाषा सीख रहे थे।
पूंजीवाद के बारे में लिखतें हुए वो इतने ज्यादा विश्वास से भरे थे की वो इसे अपनी एक नैतिक जिम्मेदारी मानते थे।
उन्हें समझ आ गया था की ये मेरे व्यक्तिगत सिद्धांत ना होकर एक वैज्ञानिक सामाजिक विज्ञान के नियम हैं जिन्हे लिखना जरुरी है।
वो लन्दन के भीड़ भरे चौराहों पर जनता को सार्वजनिक रूप से सम्बोधित करते थे। और उन्हें अपने सिद्धांतों के बारे में बताते थे की वो किस विषय पर लिख रहें हैं। और ईमानदारी से बताते थे की उन्हें बहुत आर्थिक समस्याएं हैं।
और फिर कामगार तबका उनकी खुलेआम आर्थिक मदद करता था।
वो अपने दोस्त फ्रेडरिक एंगेल्स को पत्रों में निस्संकोच लिखते थे की उनकी पत्नी और बच्चे हफ्ते भर से उबले हुए आलू खा रहें हैं और उनके पास पैसे ख़तम हो चुके हैं। फिर एंगेल्स उन्हें पैसे भेजते थे।
गरीबी का आलम ये था की उनके कई बच्चे अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए , और वो अपने मृत बच्चो के शरीर से कपड़े भी निकाल लेते थे ताकि उनके बाकी बच्चों के काम आ सके।
वो घंटो घंटो खाने के अभाव में आकर अचार खाकर अपनी भूख मारते थे।
एंगेल्स के साथ वो खूब शतरंज खेलते थे। और जब भी मिलते तो वो एंगेल्स के लेखों को ध्यान से सुनते थे। एंगेल्स लंदन में मजदूरों के जीवन पर काफी शोध करते और लिखते थे।
उनकी पत्नी जेनी और मित्र एंगेल्स एक अमीर परिवार से थे।
लेकिन जेनी ने अपना घर परिवार और एक सुविधाभोगी जीवन छोड़कर मार्क्स का जीवन पर्यन्त साथ दिया।
एंगेल्स तो बाकायदा एक पूंजीपति के बेटे थे जिनकी मानचेस्टर में अपनी फैक्ट्री थी।
लेकिन मार्क्स के वैचारिक दर्शन और अपनी वैचारिक ईमानदारी उन्हें मार्क्स के कंधे से कंधा मिलाकर उनकी हर संभव मदद के लिए प्रेरित करती रही।
दास कैपिटल के तीन खंड हैं।
लेकिन मार्क्स अपने जीवित रहते मात्र एक ही खंड पूरा कर पाए।
मतलब की उनके जीवन में मात्र पहला खंड ही प्रकाशित हो पाया। लेकिन बाकी के दो खंड ड्राफ्ट स्टेज में ही रहे उनकी एडिटिंग और फाइनल करने का काम नहीं हो पाया था।
इस काम को मार्क्स के मित्र फ्रेडरिक एंगेल्स ने मार्क्स की मृत्यु के बाद पूरा किया था।
लेकिन आप ईमानदारी की इंतेहा देखिये की फ्रेडरिक एंगेल्स ने दास कैपिटल के बाकी दो खण्डों का पूरा श्रेय कार्ल मार्क्स को ही दिया।
क्योंकि वैचारिक रूप से उसका आधार मार्क्स ने ही लिखा था।
मार्क्स और एंगेल्स की दोस्ती की मिसाल तो दक्षिणपंथी तक देते हैं।
ऐसी थी मार्क्स और एंगेल्स की दोस्ती।
÷ मार्क्स को क्यों पढ़ना चाहिए ?♀
ये सोचकर मत पढ़िए की आपको कोई समाजवादी या कम्युनिस्ट बनना है या किसी प्रकार की क्रान्ति करनी है।
मार्क्सवाद को पढ़ना इसलिए जरुरी है की ये आप में दार्शनिक रूप से “लॉजिकल थिंकिंग” को विकसित करने का सबसे अच्छा तरीका है।
ये आपके अंदर ऐसी समझ विकसित करेगा की आप अपने किसी भी राजनितिक और धार्मिक पूर्वाग्रह को साइड में रखकर हर सामाजिक सांस्कृतिक और आर्थिक संकट और समस्या का वैज्ञानिक विश्लेषण करने का सही तरीका सीख जाएंगे।

मार्क्सवाद आपके किसी भी धार्मिक और आस्थागत विचार को आपसे नहीं छीन सकता।
मार्क्सवाद आपको चीजों को समझने का एक नया दृष्टिकोण एक नया आयाम देता है। वैचारिक दृष्टिकोण के नए दरवाजे खोल देता है।
उसके बाद आखिरी फैसला आपका ही होता यही की आपको क्या करना है।
और अंत में ये बाद याद रखिये की मार्क्सवाद निरंतर दिनों दिन ज्यादा प्रासंगिक होता जा रहा है।
यहाँ तक की आज के दौर में मार्क्सवाद असल में मार्क्स के तत्कालीन जीवनकाल से भी ज्यादा प्रासंगिक है।
आज के दौर की हर पूंजीवादी लूट और इस लूट से ध्यान भटकाने के कारणों का वैज्ञानिक विश्लेषण मार्क्सवाद में सही सही और तार्किक रूप से मिलता है।
इसलिए हर पल मार्क्सवाद और ज्यादा मजबूत होता जा रहा है।
और यही कारण है की आज तक इस दुनिया में मार्क्सवाद को बदनाम करने और वैचारिक रूप से बिगाड़ने के लिए सबसे ज्यादा प्रयत्न हुए हैं / और हो रहें हैं।
÷ लेनिनवाद और माओवाद क्या है ?♀
मार्क्सवाद एक निरंतर विकसित होता सामाजिक विज्ञान है।
और लेनिनवाद असल में मार्क्सवाद का ही एक्सटेंशन है।
पूंजीवाद की चरम अवस्था साम्रज्य्वाद होती है , जिसमे पूँजी एक देश की सीमाएं तोड़कर वैश्विक रूप से शोषण करने का माध्यम बन जाती हैं – ये परिस्थितियां कार्ल मार्क्स के समय जन्मने लगीं थी , लेकिन उनके रहतें परिपक्व नहीं हो पायी थी।
तो इतिहास के जिस वक्त में ये स्थितियां आयीं उन्हें लेनिन ने मार्क्सवाद के सैद्धांतिक आधार पर लिख डाला।
जिसे हम लेनिनवाद कहतें हैं।
इसलिए लेनिनवाद असल में मार्क्सवाद का ही विस्तारित रूप है।
इसलिए मार्क्सवाद शाश्वत है , उत्तरोत्तर विकासशील है और इसे द्वंदात्मक तरीके से विकसित होते ही रहना है।
समाज आगे बढ़ता रहेगा और मार्क्सवाद के नए-नए सिद्धांत इसके दर्शन का नवीनीकरण करते रहेंगे।
÷लेखक मार्क्सवादी कॉमरेड हैं÷




