लेखक-राजेश बैरागी
मैंने इस पोस्ट को पाठकों तक भेजने के लिए आज मध्यरात्रि की प्रतीक्षा की।मेरे सहित आपातकाल 1975 के साक्षी जो लोग वर्तमान में जीवित हैं, उन्हें उस आपातकाल और वर्तमान राजनीतिक स्थिति पर तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करने का स्वयंसिद्ध सांविधानिक अधिकार है। मैं 26 जून 1975 के दिन पांच वर्ष चार माह और 26 दिन का था। मध्यरात्रि को आपातकाल की घोषणा हुई थी। अगले दिन सुबह कोई समाचार पत्र नहीं आया। संचार के एकमात्र साधन रेडियो पर आपातकाल लागू होने की उद्घोषणा की जा रही थी। मैं अत्यधिक संवेदनशील था परंतु साढ़े पांच वर्ष से कम आयु के बालक को आपातकाल समझ आना संभव नहीं था। उससे पहले 1971 में 15 दिनों के लिए और उससे भी पहले 1967 में लगभग चार माह के लिए राष्ट्रीय आपातकाल लग चुका था परंतु उनकी वजह क्रमशः चीन और पाकिस्तान से युद्ध था।1975 का आपातकाल विशुद्ध रूप से तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा अपनी सत्ता बचाने के लिए लगाया गया था। यह 21 महीने चला जबकि संविधान में आपातकाल की अधिकतम आयु छः महीने निर्धारित की गई है। इसके साथ ही यह प्रश्न खड़ा हो गया कि संविधान से सत्ता चलती है या सत्ता की इच्छा से संविधान को हांका जा सकता है। तत्कालीन प्रधानमंत्री का एक पुत्र सुपर पीएम के तौर पर तंत्र को हांक रहा था।मुझे भली प्रकार स्मरण है कि सड़कों पर सन्नाटा पसरा रहता था। पुलिस की गाड़ियां दौड़ती रहती थीं और उन्हें देखकर देश के नागरिक इधर उधर छिपने के लिए दौड़ लगाने लगते थे। हालांकि वे निर्दोष होते थे। परिवार नियोजन के मनमाने लक्ष्य को हासिल करने के लिए प्रजनन की योग्यता को ताक पर रख दिया गया था।पुलिस आज के जितनी बेलगाम हो गई थी। किसी की कहीं सुनवाई नहीं थी, आज की तरह। हां, सरकारी कर्मचारी भी कांपते थे, आज के विपरीत। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कल 18 वीं लोकसभा के आगाज पर आपातकाल के बहाने से कांग्रेस और आज उसके साथ खड़े राजनीतिक दलों को शर्मशार करने का खूब प्रयास किया। आपातकाल की पचासवीं वार्षिकी के एक दिन पहले कांग्रेस और उसके साथी संविधान की प्रतियां उठाए संसद भवन पहुंचे। प्रधानमंत्री ने सैद्धांतिक तौर पर घोषणा की,’अब फिर से आपातकाल लगाने के बारे में कोई सोच भी नहीं सकता ‘। मैं दोनों से ही इत्तेफाक नहीं रखता।मुझे लगता है कि आपातकाल सरकार की नीयत का प्रतिबिम्ब होता है। नीयत अच्छी न हो तो बिना घोषणा किए भी आपातकाल लागू किया जा सकता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)




