लेखक-अरविंद जयतिलक
रुस-यूक्रेन और मध्य-पूर्व में जारी संकट के बीच रुस के कजान शहर में ब्रिक्स देशों का 16 वां शिखर सम्मेलन संपन्न हो गया। यह सम्मेलन इस मायने में महत्वपूर्ण रहा कि सदस्य देशों के सभी राष्ट्राध्यक्षों ने एक सुर में आतंकवाद को साझा खतरा बताते हुए आतंकवादी विचारधारा के प्रसार, आतंकी उद्देश्यों के लिए आधुनिक प्रौद्योगिकियों के दुरुपयोग, एक देश से दूसरे देश में आतंकियों की आवाजाही और आतंकवाद के वित्तपोषण को रोकने के लिए निर्णायक कदम उठाने का संकल्प लिया। सदस्य देशों ने आतंकवाद के अलावा अपने संयुक्त घोषणापत्र में न्यायसंगत वैश्विक विकास और सुरक्षा के लिए बहुपक्षवाद पर जोर देते हुए ग्लोबल साउथ की आवाज को बढ़ाने के साथ-साथ जी-20 एजेंडे में उनकी प्राथमिकताओं को एकीकृत करने की प्रतिबद्धता पर भी सहमति जताई। मौजूदा युद्धरत वैश्विक माहौल में भारत का पक्ष रखते हुए भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो टूक कहा कि हम युद्ध का नहीं बल्कि बातचीत और कूटनीति का समर्थन करते हैं।
उन्होंने आतंकवाद पर दोहरा रवैया न अपनाने की अपील करते हुए एक साथ मिलकर चुनौतियों से निपटने पर बल दिया। प्रधानमंत्री मोदी ने ब्रिक्स में शामिल नए सदस्य देशों मिश्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात का स्वागत करते हुए कहा कि ब्रिक्स विश्व को सही रास्ते पर ले जाने में सकारात्मक भूमिका निभा सकता है। प्रधानमंत्री मोदी ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और अन्य वैश्विक निकायों में सुधार की भी वकालत की। पड़ोसी देश चीन के साथ द्विपक्षीय वार्ता के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने स्पष्ट कर दिया कि दोनों देशों के रिश्तों को बेहतर बनाने के लिए साझा भरोसा, सम्मान और संवेदनशीलता आवश्यक है। अच्छी बात है कि दोनों देशों न इस सच्चाई को स्वीकारा कि दोनों पड़ोसी इस धरती के बड़े राष्ट्र हैं और इनके रिश्तों का क्षेत्रीय और वैश्विक शांति एवं समृद्धि पर असर पड़ेगा। लिहाजा दोनों के बीच स्थिर एवं शांतिपूर्ण द्विपक्षीय संबंध होना चाहिए। उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी चिनपिंग के बीच द्विपक्षीय वार्ता 5 वर्ष बाद हुई है। अक्टूबर, 2019 में दोनों नेताओं के बीच महाबलीपुरम में द्विपक्षीय वार्ता हुई थी। देखना दिलचस्प होगा कि दोनों देश भरोसे की राह पर कितना खरा उतरते हैं। लेकिन एक बात सच है कि ब्रिक्स सम्मेलन ने दोनों बडे़ देशों के बीच बेहतर रिश्ते जोड़ने की जमीन जरुर तैयार कर दी।
चीन के अलावा भारत का रुस के साथ भी द्विपक्षीय वार्ता संपन्न हुआ जिसके तहत दोनों देशों ने डिफेंस, एजुकेशन और एनर्जी क्षेत्र में मिलकर काम करने पर सहमति जताई। इसके अलावा प्रधानमंत्री मोदी ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान के साथ द्विपक्षीय वार्ता में चाबहार बंदरगाह, इंटरनेशनल नार्थ-साउथ कॉरिडोर के अलावा कनेक्टिविटी को मजबूत करने पर चर्चा हुई। याद होगा वर्ष 2022 के सम्मेलन में ब्रिक्स भागीदारों के बीच इंटरनेशनल मैकेनिज्म के लिए विश्वसनीय वैकल्पिक तंत्र विकसित करने की बात उठी थी। सदस्य देश चाहते हैं कि ब्रिक्स देशों के बीच डॉलर व यूरो के बगैर लेन-देन का ऐसा तरीका ईजाद हो ताकि अमेरिका और नाटो देशों पर से निर्भरता कम हो सके। लेकिन इस सम्मेलन में इस मसले पर कोई ठोस पहल होती हुई नहीं दिखी। जानना आवश्यक है कि ब्रिक्स दुनिया की पांच प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों का संगठन है।
इसमें ब्राजील, रुस, भारत, चीन और दक्षिण अमेरिका शामिल है। ब्रिक्स संगठन की उपलब्धियों और चुनौतियों पर नजर डालें तो 2009 में रुस के शहर येकाटेंरिनवर्ग से शुरु हुई यह यात्रा आर्थिक साझेदारी की उपलब्ध्यिों से भरपूर रही है। चूंकि ब्रिक्स के सदस्य देश उभरती हुई शानदार अर्थव्यवस्थाएं हैं और ऐसे में आने वाले दशकों में अमेरिका और यूरोपिय संघ की अर्थव्यवस्थाओं को पीछे छोड़ देते हैं तो आश्चर्य नहीं होगा। ब्रिक्स के कुछ शिखर सम्मेलनों पर गौर करें तो इस संगठन ने कुछ महत्वपर्ण व ऐतिहासिक निर्णए लिए हैं। मसलन 13 वें शिखर सम्मेलन के अध्यक्ष रहे प्रधानमंत्री मोदी ने ब्रिक्स को ताकतवर, जिम्मेदार और जवाबदेह संगठन बनाने की वकालत करते हुए आतंकवाद के खिलाफ मजबूती से लड़ने का आह्नान किया। ब्रिक्स देशों के सभी राष्ट्राध्यक्षों ने एक सुर में ‘नई दिल्ली घोषणा पत्र’ को मंजूरी दी। 12वें शिखर सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद समेत विश्व व्यापार संगठन, विश्व स्वास्थ्य संगठन और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष जैसी बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार पर जोर दिया गया।
इसके अलावा सदस्य देशों के बीच व्यापार-कारोबार क्षेत्र में एकदूसरे की मदद करने, विकास परियोजनाओं का मदद की प्रक्रिया तेज करने, आपसी सहयोग से मौद्रिक नीति को अनुकूल बनाने, प्राकृतिक संपदा का संरक्षण करने तथा पर्यावरण सुरक्षा के प्रति संवेदनशील रुख अपनाने पर सहमति बनी। चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग की अध्यक्ष्यता में डिजिटल माध्यम से संपन्न 14 वें शिखर सम्मेलन में सदस्य देशों के सभी राष्ट्राध्यक्षों ने एक सुर में उच्च गुणवत्ता वाली ब्रिक्स साझेदारी को बढ़ाने पर जोर दिया। इसी तरह गोवा के आठवें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में ब्रिक्स देशों ने संयुक्त राष्ट्र के ‘कंप्रिहेंसिव कनवेंशन ऑन इंटरनेशनल टेररिज्म’ (सीसीआइटी) के जल्द अनुमोदन के लिए मिलकर काम करने पर सहमति जतायी। जोहान्सबर्ग सम्मेलन में सदस्य देशों ने एक स्वर में एकतरफावाद को खारिज करते हुए नियम-आधारित विश्व व्यवस्था गढ़ने, बहुपक्षीय संस्थानों को सुदृढ़ता प्रदान करने और अंतर-व्यापार को मजबूती देने की प्रतिबद्धता जाहिर की। इस घोषणापत्र में कट्टरपंथ से निपटना, आतंकवादियों के वित्त पोषण के माध्यमों को अवरुद्ध करना, आतंकी शिविरों को तबाह करना और आतंकी संगठनों द्वारा इंटरनेट के दुरुपयोग को रोकना मुख्य रुप से शामिल रहा।
वर्ष 2013 में डरबन शिखर सम्मेलन में सदस्य देशों ने आपातकालीन स्थिति में ऋण संकट से उबरने के लिए 100 बिलियन डॉलर का एक आपातकालीन कोष बनाने का सपना देखा और उसे 2014 के फोर्टलेजा शिखर सम्मेलन में साकार कर दिया। उल्लेखनीय है कि ब्रिक्स देशों के पास विश्व का 25.9 फीसद भू-भाग एवं 40 फीसदी आबादी है। विश्व में सकल घरेलू उत्पाद में इनका योगदान 32 फीसदी है। अच्छी बात यह है कि ब्रिक्स देशों की आर्थिक ताकत लगातार बढ़ रही है। लेकिन राजनीतिक व कुटनीतिक नजरिए से देखें तो ब्रिक्स वर्तमान मत प्रणाली में ब्रिक्स देशों के मत देने का अधिकार उनकी आर्थिक शक्ति के लिहाज से काफी कम है। लेकिन ब्रिक्स बैंक की स्थापना से वैश्विक अर्थव्यवस्था में उनकी धाक मजबूत होगी। कहना गलत नहीं होगा कि ब्रिक्स देशों के पास प्रचुर मात्रा में संसाधन है जिससे वे एकदूसरे का सहयोग कर आर्थिक विकास को नई दिशा दे सकते हैं। चीन विनिर्माण के क्षेत्र में दुनिया में अव्वल है। दुनिया उसकी टेक्नालाजी की कायल है। रुस के पास उर्जा का असीमित भण्डार है।
प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में वह सिरमौर है। ब्राजील कृषि क्षेत्र का महाशक्ति कहा जाता है। भारत कृषि और आईटी दोनों में तेजी से विकास कर रहा है। दक्षिण अफ्रीका प्राकृतिक संसाधनों से लैस है। यह स्थिति ब्रिक्स देशों को मजबूत बनाता है। अगर ब्रिक्स देश आपसी सहयोग दिखाते हैं तो इन देशों में पसरी गरीबी, भूखमरी और कुपोषण जैसी समस्याओं से निपटने में आसानी होगी और वैश्विक राजनीति में उनकी भागीदारी सशक्त होगी। उम्मीद जताया जा रहा है कि 2050 तक ब्रिक्स देशों की स्थिति और अधिक मजबूत होगी। चीन 70.71 मिलीयन डॉलर के साथ पहला, भारत 37.66 मिलियन डॉलर के साथ तीसरा, ब्राजील 11.36 मिलियन डॉलर के साथ चौथा और रुस का 8.58 मिलियन डॉलर के साथ छठा पायदान पर होगा। निश्चित रुप से ब्रिक्स ने कम समय में महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं लेकिन उसके समक्ष चुनौतियां भी कम नहीं है। देश-दुनिया के सामने उसके सदस्य देशों का आपसी विवाद जगजाहिर है। अगर इसे दूर नहीं किया गया तो आने वाले दिनों में ब्रिक्स के समक्ष कई किस्म की समस्याएं पैदा हो सकती हैं।
मसलन भारत के साथ चीन का जटिल सीमा विवाद है। पाकिस्तान के संदर्भ में चीन की भारत विरोधी नीति और दक्षिण चीन सागर में हाइड्रोकार्बन संपदा के प्रति उसका साम्राज्यवादी रवैया ब्रिक्स के उद्देश्यों को प्रभावित कर सकता है। ब्रिक्स देशों को समझना होगा कि आपसी विवादों का निपटारा और आतंकवाद के मसले पर समान दृष्टिकोण से ही दक्षिण एशिया में शांति, सहयोग और आर्थिक विकास का वातावरण निर्मित हो सकेगा।

(लेखक राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं)




