लेखक-अरविन्द जयतिलक
आज जनजातीय गौरव दिवस है। वर्ष 2021 में केंद्र सरकार ने महान स्वतंत्रता सेनानी भगवान बिरसा मुंडा की जयंती 15 नवंबर को राष्ट्रीय जनजातीय गौरव दिवस के रुप में घोषित किया। बिरसा मुंडा भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के जनजातीय विद्रोहों और क्रांति के प्रतीक के रुप में पूजे जाते हैं। उन्होंने जनजातीय समाज को राष्ट्र की स्वतंत्रता के साथ-साथ जनजातीय लोकसंस्कृति के प्रति दृढ़ निष्ठावान रहने को प्रेरित किया। आज देश आजाद है लेकिन जनजातीय संस्कृति और लोकपरंपरा संक्रमण के दौर से गुजर रही हैं। बिरसा मुंडा को सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी जब जनजातीय संस्कृति को सहेजने और संवारने की ईमानदार पहल होगी। देश के पूर्वोत्तर राज्य असम, मणिपुर, मेघालय अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, सिक्किम, त्रिपुरा के साथ झारखंड, बंगाल, बिहार और उड़ीसा अपनी विशिष्ट संस्कृति, परंपरा व जीवंतता के लिए सुविख्यात हैं। इनकी लोकपरंपरा, लोकरंग और जीवन माधुर्य भारतीयता के माथे पर रत्नजड़ित मुकुट है। ये राज्य जनजाति प्रधान हैं और इनकी विशिष्ट सांस्कृतिक परंपरा भारत राष्ट्र की विविधता के विभिन्न आयामों का प्रतिनिधित्व करता है।
इन राज्यों में खासी, गारो, सूमी, कुकी, देवरी, भूटिया, बोडो, अंगामी और अपतानी जजजातियां विशेष रुप से उल्लेखनीय हैं जो अपने सांस्कृतिक मूल्यों का आज भी निर्वहन करते हैं। इन जनजातियों की भाषा, कला, परंपरा, और त्यौहार मानवीय मूल्यों समृद्ध, उदात्त और प्रकृति के सापेक्ष और एकरसता से परिपूर्ण हैं। इस समवेत क्षेत्र में 200 से अधिक भाषाएं एवं उपभाषाएं बोली जाती हैं और चार सैकड़ा से अधिक जनजातीय समुदाय इस पूर्वोत्तर के उपवन को गुलजार करते हैं। आंकड़ों पर गौर करें तो भारत के कुल क्षेत्रफल का तकरीबन 8 से 10 प्रतिशत वाला यह क्षेत्र इतना वैविध्यपूर्ण और छटाओं से भरपूर है कि अगर इसे भारत की सामाजिक-सांस्कृतिक प्रयोगशाला कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। यह भूमि जितना सहज व सुंदर हैं उतना ही धर्म व आध्यात्म से परिपूर्ण मानवतावादी भी। इस क्षेत्र के आध्यात्मिक वातावरण में आज भी श्रीमंत शंकरदेव की आध्यात्मिक पूंजी, राधाकिशोरपुर की देवी त्रिपुर सुंदरी की पवित्रता, परशुरामकुंड की निर्मलता, मां कामाख्या के प्रति समर्पण का अद्वितीय भाव और श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध और बाणासुर की पुत्री उषा का निश्छल प्रेमभाव लोगों के हृदय को झंकारित करता है। यहां के जनजातीय समुदाय के लोगों का मौलिक धर्म प्रकृतिपूजा है। जनजातीय समुदाय आज भी पारंपरिक विधि व निषेध का दृढ़ता व सहजता से पालन करते हैं। उसका मूल कारण अपनी सांस्कृतिक के प्रति अदम्य निष्ठा और विश्वास है। यहीं कारण है कि अन्य राज्यों की तरह आज भी पूर्वोत्तर में पर आधुनिकता का विकृत रुप अपना असर नहीं छोड़ पाया है। यहां अब भी लोक संगीत ही जीवन को रसों से सराबोर करती है। जनजातीय समाज की लोकसंस्कृति में परंपरा और स्थानीयता का मूलभाव रचा बसा है।
इसमें लोकगीत, मिथक, उत्सव और त्यौहार उनकी अंतश्चेतना के लय, सूर व ताल को जोड़ता है। यह जुड़ाव न सिर्फ जनजातीय समुदाय की कलात्मक जीवन शैली की विविधता को निरुपित करता है बल्कि इससे भारत राष्ट्र की चारित्रिक विविधता को भी निरुपित करता है। पूर्वोत्तर भारत की जनजातीय कला व शिल्प अद्वितीय और अलौकिक प्रतिमानों से भरपूर है। कालीन बनाना, मुखौटे गढ़ना, पेंट किए गए लकड़ी के पात्र बनाना, बांस और बेंत की अद्भुत कलाकारी, मजबूत कांसे की कटोरियां, कानों की बालियां, हार, बाजूबंद, संगीत वाद्य और लकड़ी की नक्काशी का काम इनकी दिनचर्या का हिस्सा है। यह कार्य इनका आर्थिक उपार्जन के साथ-साथ पूर्वोत्तर की अर्थव्यवस्था को मजबूती देता है। पर एक तथ्य यह भी कि आधुुनिकता के बढ़ते तेज प्रवाह से अब जनजातीय समुदाय भी अछूता नहीं रहा। इसका सकारात्मक और नकारात्मक असर दोनों दिख रहा है।
सकारात्मक असर यह है कि जनजातीय समाज मुख्य धारा के साथ जुड़ रहा है वहीं नकारात्मक असर यह कि वह अपनी संस्कृति के मूलतत्वों से दूर हो रहा है। नतीजा यह कि उनमें परसंस्कृति ग्रहण तेज हुआ है जिसके कारण वह दोराहे पर है। न तो वह अपनी संस्कृति बचा पा रहा है और न हीे आधुनिकता से लैस होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में मजबूत सहभागिता की दिशा में पूरी शिद्दत से शामिल हो रहा है। इस बीच की स्थिति से उसकी सभ्यता और संस्कृति दोनों दांव पर हैैै। विचार करें तो यह सब कुछ उनके जीवन में बाहरी हस्तक्षेप के कारण हो रहा है। यह तथ्य है कि भारत में ब्रिटिश शासन के समय सबसे पहले जनजातियों के सांस्कृतिक जीवन में हस्तक्षेप की प्रक्रिया प्रारंभ हुई। ईसाई मिशनरियों ने जनजातयी समुदाय में पहले हिन्दू धर्म के प्रति तिरस्कार और घृणा की भावना पैदा की और फिर उसके बाद उन्हें ईसाई धर्म ग्रहण करने के लिए प्रोत्साहित किया।
इसके लिए उन्होंने लालच को अपना हथियार बनाया। नतीजा बड़े पैमाने पर जनजातीय समुदाय का धर्म परिवर्तन शुरु हो गया। लेकिन बिडंबना कि धर्म परिवर्तन के बाद भी उनके जीवन में आमूलचुल परिवर्तन होता नहीं दिखा। ईसाईयत न तो उनकी गरीबी कम कर पायी और न ही उन्हें इतना सशक्त और शिक्षित बनाया कि वे स्वावलंबी होकर अपने समाज का भला कर सकें। हां, इतना जरुर हो गया कि अब उनके लिए अपनी संस्कृति के मूलतत्वों को सहेजना मुश्किल और चुनौतीपूर्ण हो गया है। उदाहरण के लिए एक वक्त मिजोरम के लोग प्रकृतिपूजक व ब्रहमवादी थे। वे देवी-देवताओं में विश्वास करते थे। लेकिन आज मिजोरम का अधिकांश जनजातीय समुदाय समुदाय ईसाई धर्म स्वीकार कर चुका है। अपनी संस्कृति को तिलांजलि दे चुका है। इसी तरह पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों में भी ईसाईयत ने जनजातीय समुदाय की सांस्कृतिक धरोहर को नष्ट-विनष्ट कर दिया है। आध्यात्मिक प्रतीकों और उपासना स्थलों की जगह अब गिरजाघर ने ले लिया है। अब जनजातीय समाज के लिए गिरजाघर आस्था का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है। एक समय था जब मणिपुर की संस्कृति वैष्णव धर्म से अनुप्राणित होती थी। निम्बार्क संप्रदाय, रामानंद संप्रदाय और चैतन्य संप्रदाय के अनुयायी मणिपुर को वैष्णव विचारों से गंुजायमान करते थे। लेकिन आज वहां ईसाईयत का बढ़ते प्रभाव ने वैष्णव प्रभाव को पूरी तरह निस्तेज कर दिया है।
पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों में भी ईसाईयत के बढ़ते प्रभाव ने उनकी मौलिक संस्कृति, नैसर्गिक चेतना व चिंतन और आध्यात्मिक परंपरा को क्षति पहुंचा रहा है। एक सच यह भी है कि ईसाईयत के बढ़ते प्रभाव के कारण अब वहां हिन्दू संगठन भी उठ खड़े हुए हैं। वे जनजातियों के बीच हिंदू संस्कृति का प्रचार कर उन्हें अपनी मूल संस्कृति की ओर लौटने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। ईसाईयत और हिन्दू धर्म के प्रभाव के कारण जनजातियों में जाति व्यवस्था के तत्व विकसित हुए हैं। देखें तो आज उनमें भी जातिगत विभाजन के समान ऊंच-नीच का एक स्पष्ट संस्तरण विकसित हो चुका है, जो उनके बीच अनेक सामाजिक-सांस्कृतिक संघर्षो और तनावों को जन्म दे रहा है। इससे जनजातियों की परंपरागत सामाजिक-सांस्कृतिक एकता और सामुदायिकता खतरे में पड़ती जा रही है। आज स्थिति यह है कि धर्म परिवर्तन के कारण बहुत से जनजातियों को संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगा हैं। हिन्दुओं में खान-पान ,विवाह और सामाजिक संपर्क इत्यादि के प्रतिबंधो के कारण वे उच्च हिन्दू जातियों से पूर्णतया पृथक हैं। जबकि ईसाईयों ने भी धर्म परिवर्तन करके हिन्दू बन जाने वाले जनजातियों को अपने समूह में अधिक धुलने मिलने नहीं दिया। विवाह और सामाजिक संपर्क के क्षेत्र में उन्हें अब भी एक पृथक समूह के रुप में देखा जा रहा है।
अनेक जनजातियां संस्कृतिकरण के दुष्परिणाम को न समझते हुए उन्हीं समूहों की भाषा बोलने लगी हैं जिनकी संस्कृति को स्वीकार किया। आज भारत की पूर्वोत्तर की जनजातियों में कितने ही व्यक्ति अंग्रेजी को अपनी मातृभाषा के रुप में स्वीकार कर अपनी मूलभाषा और संस्कृति का परित्याग कर चुके हैं। यह तथ्य है कि प्रत्येक समूह की भाषा में उसके प्रतीकों को व्यक्त करने की क्षमता होती है और यदि भाषा में परिवर्तन हो जाय तो समूहों के मूल्यों और उपयोगी व्यवहारों में भी परिवर्तन होने लगता है। जनजातीय समुदाय के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। जनजातीय समूहों में उनकी परंपरागत भाषा से संबधित सांस्कृतिक मूल्यों और आदर्श नियमों का क्षरण होने से आज जनजातीय समुदाय संक्रमण के दौर से गुजर रहा है।

(लेखक राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं)




