लेखक: सुभाष चंद्र
समय सीमा में केवल चार्जशीट दायर करना ही काफी नहीं है, फैसले तो अदालतों को हैं करनें
पिछले सप्ताहभारत सरकार के गृहमंत्री अमित शाह ने कहा था कि BNS के शुरू होने के बाद 60 दिनों में 60% मामलों में आरोप पत्र दायर कर दिए गए । BNS लागू होते समय ऐसा भी कहा गया था कि ऐसे मामलों का निपटारा एक वर्ष में हो सकेगा। लेकिन मामले चलेंगे तो ट्रायल कोर्ट में और वहां लेटलतीफी होती है। आरोपियों को कानून के अनुसार ट्रायल कोर्ट के आदेश पर कमियां निकालने का पूरा मौका मिल जाता है ,हालांकि BNS के अनुसार केस केवल 2 बार स्थगित किया जा सकता है (adjournment) लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है।
आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली के मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए हरियाणा सरकार पर पानी में जहर मिलाने का आरोप लगाया था और उन पर मुकदमा दर्ज हुआ था।
केजरीवाल 3 बार कोर्ट में हाजिर नहीं हुए और चौथी बार उनके वकील ने कहा कि अब केजरीवाल न तो विधायक हैं और न ही मुख्यमंत्री, इसलिए MP/MLA कोर्ट के पास उनके ट्रायल का अधिकार नहीं है। लेकिन वो भूल गए कि आरोप तो मुख्यमंत्री रहते हुए लगाया था।
सरकारी वकील ने भी कहा कि केजरीवाल के विधायक या सांसद न होने की वजह से उन पर स्पेशल कोर्ट में मुकदमा चलाने की जरूरत नहीं है और हरियाणा में MP/MLA कोर्ट हैं भी नहीं, और इसलिए मामला स्थानीय अदालत में चलना चाहिए। कोर्ट ने अगली सुनवाई की तारीख 9 अक्टूबर तय कर दी यानी 4 महीने बाद।तब जो भी कोर्ट का आदेश होगा, उसके खिलाफ केजरीवाल हाई कोर्ट जा सकते हैं ,जहां पर और एक दो साल लग सकते हैं और उसके बाद फ़िर सुप्रीम कोर्ट , ऐसे में कैसे फैसला हो सकता है फिर एक वर्ष में।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी के खिलाफ वर्ष 2018 में अमित शाह को हत्यारा कहने पर तब से ट्रायल कोर्ट में केस लंबित है।ट्रायल कोर्ट ने समन जारी किए हैं जिसके खिलाफ वह अब इलाहाबाद हाई कोर्ट चले गए हैं।
उनकी याचिका हाई कोर्ट ख़ारिज कर देगा तो राहुल गांधी सुप्रीम कोर्ट जाएंगे ,जहां हो सकता है केस पर रोक लगा दी जाए ।
मतलब BNS की प्रासंगिकता और केंद्र सरकार द्वारा जल्द न्याय देने वाली नीति को पलीता लगना शुरू हो जाएगा।
ऐसे ही वीर सावरकर के खिलाफ अपशब्द बोलने के लिए ट्रायल कोर्ट में राहुल गांधी के खिलाफ केस चल रहा है ,समन जारी हुए, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने समन पर रोक लगाने से मना कर दिया लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने समन को स्टे कर दिया।हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गांधी को फटकार जरूर मारी लेकिन केस तो एक तरह से ठंडे बस्ते में लगा दिया!
एक और केस में राहुल गांधी द्वारा सेना का अपमान करने के लिए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने समन पर रोक लगाने से मना कर दिया लेकिन अगर सुप्रीम कोर्ट उसमें भी कल को स्टे कर दे तो यह मुकदमा भी ठंडे बस्ते में जाना तय है , रसूखदारों के मुकदमों में इस तरह से अवरोध पैदा किया जाता है।
पुणे की अदालत ने राहुल गांधी के द्वारा वीर सावरकर के अपमान के केस में उसकी शिकायतकर्ता की Maternal Family की जानकारी मांगने की अर्जी ख़ारिज कर दी लेकिन कोर्ट ने कोई अगली तारीख तय नहीं की।
जाहिर है इस आदेश के खिलाफ भी राहुल गांधी हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं और कोई तो कोर्ट उनकी बात मान लेगा!
सुब्रमण्यम स्वामी ने हेराल्ड केस में वर्ष 2022 में अतिरिक्त दस्तावेज़ दाखिल करने की अनुमति मांगी थी ट्रायल कोर्ट से, सोनिया ने और राहुल गांधी हाई कोर्ट चले गए और आज 3 साल से मामला हाई कोर्ट ने लटकाया हुआ है , अगर हाई कोर्ट खारिज कर देगा तो सुप्रीम कोर्ट विकल्प रहेगा। मतलब ट्रायल तो 20 साल तक शुरू भी नहीं होगा, जबकि नेशनल हेरॉल्ड केस में 12 वर्ष पहले ही बीत चुके हैं।
इसलिए हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट को किसी भी ट्रायल कोर्ट की कार्रवाई में दखल नहीं देना चाहिए जब तक कानून से संबंधित कोई विशेष विषय न हो ,अन्यथा कितना ही जोर लगा लिया जाए,अदालतें BNS लाने की मंशा और तय समय सीमा के अंदर न्याय देने, दिलाने के मुद्दे पर खरी उतरती नहीं दिख पा रहे है अधिकतर मामलों में और यह बेहद चिंतनीय और गंभीर विषय हैं न्यायतंत्र और लोकतंत्र के लिए।

(लेखक सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता हैं और यह उनके निजी विचार हैं)




