लेखक- एडवोकेट सुभाष चंद्र
इलाहाबाद हाई कोर्ट की एक
टिप्पणी ने प्रदेश की
पूरी कार्यपालिका को कलंकित
कर दिया –
इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस विनोद दिवाकर जी ने पुलिस के कामकाज पर टिप्पणी करते हुए राज्य के सभी प्रशासनिक अधिकारियों को नकारा कह दिया.
पहले उन्होंने कहा कि राज्य पुलिस अफसरों की वफ़ादारी संविधान के प्रति नहीं, बल्कि सत्ताधारी पक्ष के प्रति है, वो ‘ट्रांसफर-पोस्टिंग इकॉनमी’ ध्यान में रखकर आचरण करते हैं.
उसके बाद जस्टिस दिवाकर जी ने कहा कि “यह कड़वा सच है कि कई सरकारों में राज्य की प्रशासनिक मशीनरी राजनीतिक घुसपैठ का शिकार रही है ट्रांसफर, पोस्टिंग और प्रमोशन मेरिट के आधार पर न होकर राजनीतिक सरपरस्ती के औजार बन गए हैं.वफादार अफसरों को मलाईदार जिले इनाम में मिलते हैं, जबकि स्वतंत्रता से काम करने वाले अफसरों को महत्वहीन जगहों पर भेज दिया जाता है”.
मामला गाजियाबाद के 3 व्यक्तियों पर लगे गैंगस्टर एक्ट का था जिसे जस्टिस दिवाकर जी ने निरस्त कर दिया और कहा कि मुझे उन लोगों पर लगे गैंगस्टर एक्ट निरस्त करने पर कोई आपत्ति नहीं है लेकिन यह मान लेना कि वे प्रतिशोध की भावना से लगाए गए, यह भी उचित नहीं है.
उन्होंने बिकरू कांड का जिक्र किया और पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठाए जबकि उस कांड में मरने वाला कुख्यात अपराधी विकास दुबे भी कोई शरीफजादा नहीं था और उस मुठभेड़ में विकास दुबे ने आठ पुलिसकर्मी की जान ले ली थी .
जस्टिस दिवाकर जी को एक कड़वा सच और भी स्वीकार करना चाहिए कि इलाहाबाद हाई कोर्ट के 10 जजों ने कुख्यात माफ़िया मुख़्तार अंसारी की जमानत अर्जी सुनने से मना कर दिया था उनकी वफ़ादारी किसके लिए थी, संविधान के प्रति या फ़िर……? शायद जस्टिस दिवाकर जी के पास इसका जवाब नहीं होगा.
जिस जज दिनेश कुमार सिंह ने दुर्दांत माफिया मुख़्तार अंसारी को 7 साल की सजा सुनाई, उसका कुछ दिन बाद कर्नाटक हाई कोर्ट में ट्रांसफर कर दिया गया.
जस्टिस सुभाष विद्यार्थी एक दिन लोक सभा में नेता प्रतिपक्ष कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर एफ आई आर के आदेश देते हैं और अगले दिन वापस ले लेते हैं और केस ही छोड़ देते हैं.
जस्टिस गोविन्द माथुर ने योगी सरकार को दंगाइयों के फोटो हज़रतगंज चौक पर लगाने से मना कर दिया तो वहीं चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने दंगाइयों से 275 करोड़ के नुकसान की भरपाई न लेने के आदेश योगी सरकार को दिया था.
उत्तर प्रदेश के पुलिस और कार्यपालिका के अधिकारियों का उत्तर प्रदेश की पिछले 9 साल में हुई प्रगति में महत्वपूर्ण योगदान है, जिसे जस्टिस दिवाकर जी ने प्रदेश के सभी अधिकारियों को एक लाठी से हांक कर भुला दिया.
नेतृत्व योगी जी का है लेकिन उनकी योजनाओं का क्रियान्वयन तो अधिकारी ही करते है.आज प्रदेश माफिया और बाहुबलियों से मुक्त है और बीते 9 साल में 293 अपराधी एनकाउंटर में मारे गए और अगर न मारे जाते तो उनके मुक़दमे 20-30 साल अदालतों में धक्के खाते और मारे गए अपराधी प्रदेश में आतंक मचाये रहते.
प्रदेश ने चहुंओर प्रगति की है, 2016-17 में राज्य का जीडीपी 13.30 लाख करोड़ था जो अब 30.25 लाख करोड़ है.राष्ट्रीय जीडीपी में योगदान 8.6% से बढ़ कर 9.5% हो गया है और राज्य देश में दूसरे नंबर की इकॉनमी है.निर्यात वैल्यू 88,000 करोड़ से बढ़कर 1.86 लाख करोड़ रुपए हो गई – टूरिज्म का रेवेनुए 11,000 करोड़ से बढ़ कर 70,000 करोड़ रूपए हो गया .इतना ही नहीं इंफ्रास्टचर में निवेश जो एक्सप्रेस वेज़, एयरपोर्ट्स, और आने वाले प्रोजेक्ट्स में होगा वह राज्य की इकॉनमी को एक ट्रिलियन डॉलर की तरफ ले जा रहा है ,ब्रह्मोस मिसाइल भी प्रदेश में बन रही है.
कहना गलत नहीं होगा कि दौड़ते घोड़े को चाबुक मारना ठीक नहीं है ,एक साधु योगी ने प्रदेश का कायापलट कर दिया .एक दो मामलों की वजह से पूरी कार्यपालिका के अधिकारियों पर कलंक लगाना उचित नहीं है.

(लेखक उच्चतम न्यायालय में वरिष्ठ अधिवक्ता हैं और यह उनके निजी विचार है)




