(संजय राय)
(नई दिल्ली)
ANWO संस्था और विराट एक्टिंग लैब के संयुक्त तत्वाधान में”आजाद और आज़ादी” शीर्षक से मंचन, कविता और कथन का किया आयोजन
अमर बलिदानी चंद्रशेखर आज़ाद की जयंती के अवसर पर आर्ट्स न्यू वे ऑर्गेनाइजेशन (एएनडब्ल्यूओ) और विराट एक्टिंग लैब के संयुक्त तत्वावधान में मंडी हाउस स्थित एलटीजी ऑडिटोरियम के ब्लैंक कैनवास सभागार में ‘आज़ाद और आज़ादी’ शीर्षक से कविता एवं कथन आधारित रंगमंचीय प्रस्तुति का मंचन किया गया। प्रस्तुति ने स्वतंत्रता संग्राम की चेतना को वर्तमान सामाजिक, राजनीतिक और नैतिक चुनौतियों से जोड़ते हुए दर्शकों को आत्ममंथन के लिए प्रेरित किया।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि अमित कुमार पांडेय रहे। विशिष्ट अतिथियों में श्रीमती मणिका मल्होत्रा, मणिपुर कांग्रेस की वरिष्ठ नेत्री श्रीमती संजीता लिशाम, कवयित्री इंदु ‘राज’ निगम तथा कवि-शायर राजेंद्र निगम ‘राज’ शामिल रहे। अतिथियों ने कलाकारों के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि रंगमंच समाज का दर्पण है और ऐसी प्रस्तुतियां लोकतांत्रिक मूल्यों व सामाजिक चेतना को मजबूत करती हैं।
प्रस्तुति में चंद्रशेखर आज़ाद के जीवन और बलिदान को केवल ऐतिहासिक संदर्भ तक सीमित न रखते हुए सामाजिक असमानता, अन्याय, नैतिक पतन, युवाओं की चुनौतियां, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों के क्षरण जैसे समकालीन मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाया गया। नाटक का संदेश था कि आज़ादी केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं, बल्कि हर प्रकार के अन्याय, भय और शोषण के विरुद्ध सतत संघर्ष का प्रतीक है।
आयोजक रिज़वान रज़ा ने कहा कि प्रस्तुति का उद्देश्य केवल चंद्रशेखर आज़ाद को श्रद्धांजलि देना नहीं, बल्कि उनके विचारों और संघर्ष को नई पीढ़ी तक पहुंचाना है। उन्होंने कहा कि अन्याय और असमानता के विरुद्ध निर्भीक समाज का निर्माण ही आज़ाद के सपनों के भारत की दिशा में वास्तविक कदम होगा।
प्रस्तुति में कुलदीप वशिष्ठ ने चंद्रशेखर आज़ाद की भूमिका को प्रभावशाली ढंग से जीवंत किया। वहीं अरविंद कुमार, सी.आर. सुरेश, आरव वत्स, प्रेम प्रजापति, राजीव शर्मा और सायरा अली सहित सभी कलाकारों ने सशक्त अभिनय से दर्शकों की खूब सराहना बटोरी।

नाटक के लेखक, रूपकार एवं निर्देशक आर.एस. विकल ने अपनी प्रस्तुति के माध्यम से यह संदेश दिया कि चंद्रशेखर आज़ाद का संघर्ष आज भी उतना ही प्रासंगिक है और वर्तमान समय की चुनौतियों का सामना करने के लिए उसी साहस, वैचारिक प्रतिबद्धता और सामाजिक चेतना की आवश्यकता है।
कार्यक्रम के अंत में दर्शकों ने कलाकारों और आयोजकों का तालियों की गड़गड़ाहट से स्वागत किया। उपस्थित लोगों ने इसे ऐसी सार्थक सांस्कृतिक प्रस्तुति बताया, जिसने इतिहास और वर्तमान के बीच प्रभावी संवाद स्थापित करते हुए आज़ाद के विचारों को जीवन में उतारने का संदेश दिया।




