लेखक: हिमांशु मिश्र
बिहार चुनाव में क्या होगा, इसे जानने के लिए बस दो रास्ते हैं,
पहला और सबसे अहम- क्या बिहार की यादवों को छोड़ कर राज्य की पिछड़ी जातियों में वाकई यह धारणा मजबूत है कि परिणाम आने के बाद भाजपा नीतीश को धकिया देगी।
यह धारणा जितनी मजबूत होगी राजग सत्ता से उतनी ही दूर है।
दूसरा- क्या इन्हीं गैर यादव पिछड़ी जातियों में वाकई यह धारणा है कि तेजस्वी सत्ता में आए तो उनकी खैर नहीं है। अगर वाकई यह धारणा है तो यह कितनी मजबूत है?
जितनी मजबूत है विपक्षी महागठबंधन सत्ता से उतनी ही दूर है। वह इसलिए कि मंडल राजनीति के बाद बिहार में यादवों से जमीनी स्तर पर प्रताडि़त जातियों में मुख्यत: गैरयादव ओबीसी जातियां हैं।
इसके अलावा परिणाम के संदर्भ में जितनी भी भविष्यवाणियां हैं वह तथ्यों से परे हैं। सीधे शब्दों में कहें तो नई धारणा तय करने में मेन स्ट्रीम मीडिया और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म अपने अपने आकाओं के हित में नई धारणा बनाने मेंं जुटे हैं।
एक बात और, भले जितना भी शोर हो, बिहार चुनाव के नतीजे को मुस्लिम तय नहीं कर सकते। सच्चाई यह है कि यह मियां भाई वाली सीटें राजग की ताकत हैं। बीते तीन चार चुनाव के तथ्य यही कहते हैं। मसलन बीते चुनाव में मियां के प्रभाव वाली 86 सीटों में 57 सीटें जीत कर राजग की सत्ता बरकरार रही। मियां भाई एकपक्षीय वोट करेंगे तो पैरलल या रिवर्स पॉलराइजेशन का लाभ जब तक नीतीश राजग में हैं तब तक उसे ही मिलेगा। साल 2010 में राजग ने इन 86 सीटों में से 71 सीटें जीती थी। इसलिए मियांओं का रुदन राजग के लिए लाभ का सौदा है।
इसके अलावा नतीजे की भविष्यवाणी के लिए जिन तथ्यों का सहारा लिया जा रहा है, उसका जमीनी स्तर पर वाकई कोई महत्व नहीं है।
-मसलन तेजस्वी यादव ने हर परिवार से एक सदस्य को नौकरी का वादा किया है। उनका यह दांव जनसुराज को बैकफुट पर धकेलने के लिए है। याद रहे कि बीते चुनावोंं में सत्ता के प्रति युवाओं की गहरी नाराजगी के कारण ही महागठबंधन ने राजग को कड़ी टक्कर दी थी। तेजस्वी नहीं चाहते कि इस वोट बैंक में प्रशांत किशोर हिस्सा बांटें। कुल मिला कर यह राजद और भाजपा का टेंशन है।
दूसरा वीआईपी के मुकेश साहनी को चुनाव में टर्निंग प्वाइंट माना जा रहा है। यह दावा किया जा रहा है कि सहनी को डिप्टी सीएम का उम्मीदवार बना कर महागठबंधन ने पासा पलट दिया है। मगर रुकिये। इस मामले में राजग के पास भी कुछ है। इस बार लोजपा आर और आरएलएम राजग के साथ्ज्ञ है, जिसने बीते चुनाव में जदयू को सीधे सीधे 40 सीटों का नुकसान पहुंचाया था। इस एंगल की कोई चर्चा नहीं है।
कुल मिला कर अगर राजग यह धारणा नहीं तोड़ पाई कि चुनाव बाद नीतीश ही सीएम होंगे तो उसकी सत्ता बरकरार नहीं रहेगी। इसी प्रकार अगर राजद यह धारणा नहीं तोड़ पाई कि सत्ता मेंं आने के बाद यदुवंशी सबकी खबर लेंगे, ईंट से ईंट बजा देंगे, तो दोनों केलिए सत्ता दूर की कौड़ी है,बाकी सब “फिल अप द ब्लैंक्स” है।
कुल मिला कर मानिये या न मानिये, केंद्र में नीतीश हैं। सीट कितनी कम या कितनी ज्यादा इसका सवाल नहीं है।

(लेखक अमर उजाला समाचार पत्र में नेशनल ब्यूरो के पद पर नई दिल्ली में कार्यरत हैं)




