लेखक: ओम लवानिया
फ़िल्म मेकर आदित्य धर ने आतंकवाद की डिटेल्ड व्याख्या की है न! अद्भुत है। स्क्रीन प्ले साढ़े तीन घंटे से अधिक है और अजय सान्याल (अजीत डोवाल) के दृष्टिकोण को लेकर आगे बढ़ता है। ऐसी फ़िल्म अभी तक नहीं बनी है।
आदित्य धर जिस शैली से आतंकवाद की जड़ों को पकड़कर लाए हैं, वह भारतीय सिनेमा या कहे बॉलीवुड की परंपरागत सीमा से बाहर जाकर खड़े होने जैसा है।
हिंदी फिल्में अक्सर आतंकवाद को सिर्फ़ “अटैक और इश्क़नूमा प्रतिशोध” के फ्रेम में दिखाती रही हैं, लेकिन आदित्य धर का ट्रीटमेंट कहीं ज़्यादा वाइड, राजनीतिक और खतरनाक वास्तविकताओं पर टिका हुआ है।
स्क्रीनप्ले का साढ़े तीन घंटे तक फैलना इसी बात का संकेत है कि यह कहानी किसी एक घटना का नहीं, बल्कि 1999 से 2008 तक की राष्ट्रीय सुरक्षा में हुई दरारों, कूटनीतिक कमज़ोरियों का पूरा हिसाब-किताब बनकर सामने आती है।
इस स्पाई थ्रिलर पहला बड़ा टेक्चर 1999 कंधार अपहरण से शुरू होता है, जब भारत सरकार पूरी दुनिया के सामने बंधक बनकर दिखाई दी। इसके बाद 2001 संसद हमला जहाँ पहली बार भारतीय सुरक्षा ढांचे की पोल खुली।
स्क्रीन प्ले कराची के लियारी अंडरवर्ल्ड की गलियों में उतरता है, एक अलग कड़ी खुलती है। यह वह लियारी है जहाँ अपराध और आतंक का भेद मिट चुका है। रेहमान बलोच जैसा कुख्यात नाम, बाबू डकैत, अरशद पप्पू ये तीन अलग-अलग गैंग नहीं, बल्कि एक क्रॉस-ब्रीडेड क्राइम टेरिटरी बनाते हैं जहाँ पैसा, खौफ़ और राजनीति एक साथ काम करते हैं। यही वह जगह है जहाँ फिल्म यह बताती है कि कैसे आतंकवाद “जिहादी सोच” से पैदा होता है और सबका मकसद एक ही है।
आदित्य ने स्क्रीनप्ले को सात अध्यायों में रखा गया है ताकि कहानी के किरदार अच्छे से स्थापित हो सके। स्क्रीन प्ले स्लो पेस में है क्योंकि हर किरदार को पॉलिटिकल बैकड्रॉप के साथ फिट किया है। अजय सान्याल (अजीत डोवाल) के दृष्टिकोण से हम यह देखते हैं कि भारत केवल बाहरी दुश्मन से नहीं लड़ रहा, बल्कि आंतरिक, कमजोर इंटेलिजेंस-सिंकिंग और राजनीतिक असहमति से भी जूझ रहा था।
अभी तो भारत में बैठे आधे मोर्चे और दाऊद इब्राहिम आना बाकी है। सिर्फ लियारी अंडरवर्ल्ड नहीं है दाऊद भी जुड़ा है। 1999-2008 के बीच भारत ने आतंकवाद पर सख़्त कार्यवाही नहीं की। उस समय भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा नीति ज़्यादातर अमेरिका-प्रेरित कूटनीति पर टिकी हुई थी। सरकारें यह मान बैठी थीं कि अंतरराष्ट्रीय दबाव पाकिस्तान को नियंत्रित करेगा। पर हुआ इसका उल्टा अंडरवर्ल्ड मजबूत हुआ, आईएसआई ने अपने प्रॉक्सी-नेटवर्क को दोबारा सजाया, और भारत की इंटेल एजेंसियों की चेतावनियाँ राजनीतिक स्तर पर अनदेखी की जाती रहीं।
इस संदर्भ में, आदित्य का रिसर्च गहरा है उन्होंने न सिर्फ़ पत्रकार आदित्य राज कौल जैसे सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञ से सलाह ली, बल्कि खुले स्रोतों में उपलब्ध इंटेलिजेंस रिपोर्ट, कोर्ट-डॉकेट्स, और पाकिस्तान की घरेलू राजनीति पर पब्लिक डोमेन रिसर्च को भी अपनी जोड़ा है।
यह फ़िल्म भारत के आतंकवाद की वह अंदरूनी फाइल है जिसे अक्सर भारतीय दर्शकों के सामने सरल बनाकर परोसा जाता था, लेकिन पहली बार बिना काटछांट के दिखाई जा रही है।
अभी तक जितनी फ़िल्में स्पाई जॉनर में आई है उन्होंने इतना डेप्ट नहीं दिया है बल्कि छुआ तक नहीं है सिर्फ़ आईएसआई से इश्क़ लड़ाया है। जबकि आईएसआई ने जिहादी लड़ाये है और निर्दोष लोगों को मारा है। किंतु अब भारत बदल चुका है और चुप नहीं बैठता है बल्कि मुरीदके तक घुसकर ठोकता है। अजीत डोवाल को खुलकर खेलने का मौका मिल रहा है तो अज्ञात योद्धा नई नई सुर्खियां बना रहे है। पूर्व रक्षा मंत्री परिकर साहब का कथन था कि, कांटे से कांटा निकलता है।
आदित्य ने अपनी कहानी के किरदारों के लिए जिन कलाकारों का चुनाव किया है न, इनसे बेहतर कोई दूसरा कलाकार किरदारों को न्याय नहीं दे सकता था।
बीजीएम ने स्क्रीन प्ले को थ्रिलिंग और एंगेजिंग बनाया है।
जिन्हें यशराज फिल्म्स की स्पाई थ्रिलर पसंद है कृपया वे इसे न देखें। कतई समझ नहीं आएगी। तिस पर साढ़े तीन घंटे का स्क्रीन प्ले है तो बोर हो जाओगे।
(लेखक फिल्मी समीक्षक हैं)




