लेखक:ओमप्रकाश तिवारी
मुंबई जैसे बहुभाषी महानगर में आधी शताब्दी, यानी 50 साल से अधिक समय तक अपना प्रभाव बनाकर रखना किसी चमत्कारी व्यक्तित्व के लिए ही संभव हो सकता है। यह चमत्कार था शिवसेना संस्थापक बालासाहेब ठाकरे उर्फ बाल ठाकरे में, जिनका दबदबा यह महानगर उनके पूरे जीवनकाल में महसूस करता रहा। ऐसे कई अवसर आए, जब ठाकरे कानूनन गलत रहते हुए भी लोगों की ढाल बनकर खड़े रहे। 1992 के मुंबई दंगों के दौरान जाति और प्रांतभेद भुलाकर सकल हिंदू समाज के रक्षक बनकर उभरे। जिसके कारण उनकी तारणहार की छवि मुंबई और महाराष्ट्र का दायरा लांघकर दिल्ली, जम्मू-कश्मीर और उत्तर भारत तक जा पहुंची।
कभी मुंबई के एक अंग्रेजी अखबार में कार्टूनिस्ट रहे बालासाहेब ठाकरे की व्यंग्य दृष्टि गजब की थी। वह अक्सर उनके वक्तृत्व में भी झलकती थी। अपनी कार्टूनिस्ट की नौकरी के दिनों में ही उन्होंने मुंबई के सरकारी कार्यालयों में दक्षिण भारतीय कर्मचारियों का बाहुल्य महसूस कर इसके विरुद्ध एक आंदोलन शुरू किया। उन्होंने स्थानीय मराठी युवकों को नौकरी दिलवाने की मुहिम के तहत ‘हटाओ लुंगी, बजाओ पुंगी’ का नारा देकर दक्षिण भारतीयों के विरुद्ध हिंसक आंदोलन शुरू किया, और 19 जून, 1966 को ‘शिवसेना’ की स्थापना की। पार्टी का यह नाम उनके पिता प्रबोधनकार ठाकरे का दिया हुआ था, जिनकी ‘संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन’ में सक्रिय भागीदारी रही थी।
ठाकरे द्वारा उठाए गए मुद्दे स्थानीय भूमिपुत्रों (मराठी मानुष) को भा रहे थे। जिसके कारण कई तेजतर्रार युवा इससे जुड़ रहे थे। यही कारण था कि पार्टी बनने के अगले ही साल 1967 में शिवसेना मुंबई से सटे ठाणे जिले के नगर निगम चुनाव में 40 में से 17 सीटें जीतने में कामयाब रही। सतीश प्रधान और आनंद दिघे उन्हीं दिनों से ठाणे में शिवसेना से जुड़े। सतीश प्रधान बाद के दिनों में लंबी अवधि तक ठाणे के महापौर रहे, तो आनंद दिघे 1984 में ठाणे जिला प्रमुख बने। इन्हीं आनंद दिघे को वर्तमान उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे अपना राजनीतिक गुरु मानते हैं। जब हम आधी शताब्दी तक मुंबई और ठाणे में शिवसेना के प्रभाव की बात करते हैं, तो यह भी बताना प्रासंगिक लगता है कि अपनी स्थापना के पांचवें वर्ष यानी 1971 में ही शिवसेना मुंबई महानगरपालिका में अपना महापौर बनाने में सफल रही थी। तब से लेकर 2022 तक कुछ-कुछ समय के लिए ही कांग्रेस या कुछ अन्य दलों का महापौर रहा, बाकी ज्यादातर समय शिवसेना का ही महापौर बनता आया। शिवसेना के कुछ महापौर तो ऐसे रहे, जिन्होंने बाद में राज्य और केंद्र की राजनीति में भी लंबा सफर तय किया। इनमें मनोहर जोशी पहले राज्य के मुख्यमंत्री रहे, फिर केंद्र सरकार में मंत्री एवं लोकसभा अध्यक्ष भी रहे। दो बार शिवसेना के महापौर रहे छगन भुजबल बाद में कांग्रेस से होते हुए राकांपा में चले गए, और आज भी राकांपा (अजीत) कोटे से भाजपानीत सरकार में मंत्री हैं।
निकाय चुनावों की राजनीति करनेवाली शिवसेना को राज्य और केंद्र की राजनीति में चमकने का अवसर वास्तव में श्रीरामजन्मभूमि आंदोलन के दौरान मिला। 1977 में खुलकर आपातकाल का समर्थन करनेवाले ठाकरे को 1984 में रामजन्मभूमि आंदोलन शुरू होने के बाद इस आंदोलन के उभार का आभास होने लगा था। इसके कारण वह 1980 में अपने नए स्वरूप में स्थापित हुई भाजपा के प्रमोद महाजन जैसे नेताओं के संपर्क में आए। 1988 आते-आते रामजन्मभूमि आंदोलन का स्वरूप सामने आने लगा था। ‘गर्व से कहो हम हिंदू हैं’ के स्टीकर लोगों के घरों और वाहनों पर चिपकाए जाने लगे थे। इसी दौरान 1988 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक बालासाहेब देवरस मुंबई आए। वह संघ के ही एक स्वयंसेवक रमेशभाई मेहता के जुहू स्थित आवास पर रुके। वहीं बालासाहेब ठाकरे की मुलाकात बालासाहेब देवरस से हुई। रमेशभाई मेहता बताते हैं कि उसी मुलाकात में ठाकरे ने देवरस से कहा कि अब मुंबई में भगवा फहराने की जिम्मेदारी आप हम पर छोड़िए, आप बाकी देश देखिए। भगवा और रामजन्मभूमि आंदोलन के प्रति बालासाहेब ठाकरे का अनुराग यहां से जगा तो उन्होंने अपने जीवनकाल में कभी पीछे मुडकर नहीं देखा। उन्हें पूरे देश में ‘हिंदूहृदय सम्राट’ की उपाधि से जाना जाने लगा। किसी भी मामले में पीछे मुड़कर देखने के लिए वह जाने भी नहीं जाते थे। वह जो कहते थे, पूरी बेबाकी से अपनी कही बात के साथ खड़े रहते थे। परिणाम कुछ भी भुगतना पड़े।
अपनी इसी बेबाकी के कारण छह दिसंबर, 1992 को जब भाजपा के भी कई दिग्गज नेता बाबरी ढांचा ढहाए जाने को लेकर बगलें झांक रहे थे, तो ठाकरे ने खुलकर कहा कि “हां, ढांचा हमारे शिवसैनिकों ने ढहाया है”। फिर ढांचा ढहने के बाद मुंबई में हुए सांप्रदायिक दंगों में वह ढाल बनकर मुंबई के हिंदुओं के पीछे खड़े रहे। उनके बयानों के कारण उन्हें लंबे समय तक मुकदमों का सामना करना पड़ा, और मुंबई दंगों की जांच के लिए बने श्रीकृष्ण आयोग ने उन्हें दोषी भी ठहराया। लेकिन हर चीज का उन्होंने पूरी बेबाकी से सामना किया। इसी बीच 1995 में वह भाजपा से गठबंधन करके महाराष्ट्र में सरकार बनाने में भी सफल रहे। तब कहा जाता था कि ठाकरे अपने आवास ‘मातोश्री’ में बैठकर ‘रिमोट कंट्रोल’ से सरकार चलाते हैं। इस जुमले को भी उन्होंने अपना तमगा बना लिया। दुर्भाग्य से आज शुरू हो रहे उनके जन्मशताब्दी वर्ष पर उनकी स्थापित शिवसेना दो भागों में बंट चुकी है। जिस मुंबई के वह बेताज बादशाह रहे, जो मुंबई उनके एक इशारे पर ठप हो जाता करती थी, उसकी सत्ता भी उनके पुत्र उद्धव ठाकरे के हाथ से निकल चुकी है, और सर्वोच्च न्यायालय में चुनाव चिन्ह और नाम की लड़ाई लड़ रहे उद्धव ठाकरे अब अपने पिता बालासाहेब ठाकरे के उन विचारों से भी दूर हो चुके हैं, जिनके कारण बालासाहेब को पूरे देश में लोकप्रियता हासिल हुई।

(लेख साभार दैनिक जागरण)
(लेखक दैनिक जागरण महाराष्ट्र राज्य ब्यूरो हैं)




