(मनोज श्रीवास्तव)
(लखनऊ)
भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व पर दबदबा स्थापित करने वाला गुजरात धड़ा 2027 के विधानसभा चुनाव में यूपी से योगी आदित्यनाथ की सरकार की निरंतर विदाई की राह आसान कर रही है। तरीका जाना पहचाना, अपने सिद्ध मंत्र की राह पर चल कर, “फूट डालो-राज करो” का हथकंडा जारी है। केंद्रीय नेतृत्व द्वारा निर्वाचन प्रणाली की पूर्ण निष्पक्षता के बाद आये परिणामस्वरूप नव निर्वाचित प्रदेश अध्यक्ष बने केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री पंकज चौधरी के सोशल प्लेटफार्म फेसबुक पर सोमवार की सुबह पोस्ट आया जिसमें उन्होंने बजट सत्र के पूर्व लिखा कि “आज से प्रारंभ हो रहा उत्तर प्रदेश विधानमंडल का बजट सत्र 2026–27 राज्य की प्रगति और समृद्धि के नए द्वार खोलेगा। 11 फरवरी को प्रदेश का बजट 2026–27 प्रस्तुत किया जाएगा, जो उत्तर प्रदेश के सर्वसमावेशी विकास की दिशा और गति को नई मजबूती देगा। आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के मार्गदर्शन में ‘डबल इंजन की सरकार’ यूपी को देश का ग्रोथ इंजन बनाने के लिए निरंतर कार्य कर रही है। यह बजट सत्र विकास के नए अध्याय की शुरुआत करेगा”।
कार्यकर्ताओं की आपसी चर्चा में विषय निकला कि भाजपा प्रदेश अध्यक्ष की हैसियत से पंकज चौधरी ने इतना भी उचित नहीं समझे कि देश के सबसे बड़े राज्य का बजट सत्र आरंभ हो रहा है, जिस प्रदेश में भाजपा का रोल मॉडल मुख्यमंत्री बैठा हो, जिन्होंने 2022 के चुनाव में अपने 2017 से 2022 तक के कार्यकाल में अपनी कार्यप्रणाली के बल पर चुनाव लड़ कर दोबारा प्रदेश की सरकार बनाया, देश भर में किसी भी राज्य में चुनाव हो अपने प्रखर हिंदुत्व और शख्स कानून व्यवस्था, ईमानदारी, चरित्रवान छवि के बल पर भाजपा के मुख्यमंत्रियों में जिनकी सर्वाधिक मांग उठती है ऐसे मुख्यमंत्री का नाम न लिख कर सरकार से टकराने की अपनी आगामी भूमिका तय कर दिया है। अपने प्रति अनुशासन को लेकर सजग रहने वाले प्रदेश अध्यक्ष का पिछले दिनों का चर्चित किस्सा है। कानपुर क्षेत्र के स्वागत कार्यक्रम में प्रदेश अध्यक्ष के रूप में अपने स्वागत उद्बोधन के दौरान पार्टी के दो वरिष्ठ नेताओं की मंच पर आपसी बात को संज्ञान में लेकर भरे मंच उसे गैर अनुशासित करार दिया था। आपको लगता है कि आपके संदेश में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के नाम की अनदेखी होगी तो उनका कद घट जायेगा। ध्यान रखना चाहिये जिसको प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कह चुके हैं कि यूपी के लिये “योगी ही उपयोगी”। इसी लिये अभी तक जिसने भी योगी का टांग खींचने की कोशिश किया उसके हाथ योगी की पादुका तक भी नहीं पहुंच पाये। बुधवार को एकात्म मानववाद के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी की पुण्यतिथि पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ यूपी में किसी एक मुख्यमंत्री के पद पर रहते हुये लगातार दसवां बजट प्रस्तुत करके एक और कीर्तिमान अपने नाम करेंगे।लेकिन आपके बजट सत्र के शुभकामना की प्रतिक्रिया को लेकर यही चर्चा है कि चौधरी ने अपनी ओर से उस लोक शिष्टाचार को छोटा कर लिया। भले इसे आप उस राज्य के मुख्यमंत्री का अपमान नहीं मानते, जिस राज्य में आप प्रदेश कार्यसमिति सदस्य से सीधे प्रदेश अध्यक्ष बनाये गये हैं? चूंकि जिस दिन पहली बार प्रदेश अध्यक्ष बनने के लिये लखनऊ आये थे उसी दिन आपने कहा था कि “कार्यकर्ताओं के लिये हम लड़ेंगे भी और अड़ेंगे भी”।
यह लड़ाई आपको किससे करनी है, यह भी स्पष्ट कर देना चाहिये। डबल इंजन की सरकार से, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से या राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन से।
राजनैतिक लड़ाई में अपनी भूमिका को बिना विवादास्पद किये मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से दो-दो हाथ करने का सही समय पर, सही प्रचार कर, सही स्थान पर पहुंचाने में सफल हुए पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की शागिर्दगी में राजनीतिक का कहकहा सीखने वाले डॉ राधामोहन अग्रवाल से भी आप कुछ सीख सकते हैं। ऊपर से योगी आदित्यनाथ का दुर्भाग्य देखिये जो लोग उनके नाम पर तरह-तरह का लाभ प्राप्त कर रहे हैं और उनका नाम बेंच रहे हैं वह भी कभी उनके हित में न खड़े होकर उनके विरोधियों के घर चोरी-चोरी चाय पीने जाते हैं। पद के लिये आपमें पिता देखने वालों की संख्या एकाएक देख कर आपभी अचंभित होंगे। वही समर्पित जो आपको घेर लिये हैं वह अपने सेवकत्व को भाजपा का अनुशासन बताने में लगे होंगे। इससे पहले वालों की सेवा में भी समायोजन के पहले इनका अखंड हिप्नोटिज्म ऐसे ही चलता रहा है। कुछ पूर्व अध्यक्षों से भी पूछ लीजियेगा। सुना है कि अब तक कि प्रगति यहां तक पहुंच चुकी है कि एक साथ आपको घेरने वाले अकेले एक-दूसरे की सांकेतिक चुगली करते-करते खुल कर चुगली की बातें भी करने लगे। अपने चुनावी रणनीति के अनुभवों से सीख लेते हुये कान के रास्ते आपके दिल में उतरने की रगड़ में लगे “हरिराम नाइयों” को पहचानने में चूके तो वापस लोकसभा सदस्य की पहचान लेकर ही रह जायेंगे। आपको उत्तर प्रदेश के साथ देश में स्वयं को स्थापित करने का जो सौभाग्य मिला है उसको बड़े मन और बड़े दिल से ही बड़ा कर पायेंगे। इसका सबसे आदर्श उदाहरण केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह हैं। जो कभी उत्तर प्रदेश में इस विवाद में पड़े ही नहीं कि कार्यालय कैसे चलेगा, भोजन-जलपान कैसे होता है।स्थानीय प्रबंधन पर कैसे कब्जा हो, जिसका परिणाम है कि वह राष्ट्रीय छितिज पर छाते चले गये। डॉ लक्ष्मीकांत बचपेयी और सुनील बंसल के प्रभाव में आने के पहले कई प्रदेश अध्यक्ष पद से हटने के बाद पार्टी कार्यालय की गाड़ी, लॉन्ड्री, अखबार और अन्य सुविधाओं को पाने और भोगने में ताकत लगाने के कारण कहां गुमनामी में हैं कोई जानता नहीं।




