लेखक-संजय राय
पश्चिम एशिया में इजरायल-अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्ध का दायरा खाड़ी के कई देशों में फैल चुका है। कोई भी पक्ष झुकने को तैयार नहीं है। इस युद्ध के कारण दुनिया भर की अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई है और भारत भी इससे अछूता नहीं है।
वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की नस कहा जाने वाला होर्मुज जलडमरूमध्य इस लड़ाई का केंद्र बिंदु बन गया है। दोनों पक्षों की तरफ से जारी हवाई हमलों के बीच अमेरिका और ईरान की सेनाओं के बीच शुरू हुई यह जंग अब जमीनी स्तर पर सैन्य टकराव के मुहाने पर खड़ी है, जिससे पूरी दुनिया में तेल की सप्लाई ठप होने का खतरा बढ़ गया है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की होर्मुज स्ट्रेट पर कब्ज़ा करने की धमकी के जवाब में ईरान ने चेतावनी दी है कि अगर हमले जारी रहे, तब वह मिडिल ईस्ट से एक लीटर तेल भी नहीं भेजने देगा।
गौरतलब है कि होर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया की 20 प्रतिशत तेल की आपूर्ति होती है। ट्रंप ने कहा है कि अगर तेहरान दुनिया भर में तेल के बहाव में दखल देता है, तब यह ईरान का अंत होगा। ट्रंप के बयान से ऐसा लग रहा है कि वह अमेरिका फर्स्ट की नीति पर अमल कर रहे हैं और उनकी सेना होर्मुज जलडमरूमध्य पर कब्जा करने का इरादा पाले हुए है। ऐसा करके ट्रंप चाहते हैं कि वैश्विक तेल बाजार में अमेरिका का वर्चस्व रहे। लेकिन वह ऐसा कर पाएंगे, फिलहाल इसकी संभावना नहीं दिख रही है।
इस युद्ध में सही और गलत की बात करना फिलहाल बेमानी है। यह दरअसल, तेल बाजार पर कब्जे की लड़ाई है। इसमें हथियार निर्माता कंपनियों के भी स्वार्थ जुड़े हुए हैं। अमेरिका को सर्वशक्तिमान राष्ट्र बनाने की ट्रंप की यह सनक दुनिया को किस हालत में पहुंचाने वाली है, किसी को नहीं पता है। ट्रंप को यह समझना होगा कि जोर जबरदस्ती वाली कूटनीति का इस्तेमाल करके वह अमेरिका के प्रति दुनिया के कई अन्य राष्ट्रों की सद्भावना को खो रहे हैं। सबसे बड़ी चिंता का विषय यह है कि अमेरिकी जनता भी उनकी सनक का खामियाजा भुगत रही है। उनकी हरकतों के कारण अमेरिका में भी लोगों को मंहगाई, बेरोजगारी और कई अन्य समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
इस युद्ध के कारण आज भारत के सामने ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक और राजनयिक चुनौती खड़ी हो गई है। भारत का 85 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल खाड़ी देशों से आता है। 2025 में 68 प्रतिशत से अधिक एलएनजी और 91 प्रतिशत से अधिक एलपीजी का आयात इन्हीं देशों से हुआ। ताजा संकट के कारण लॉजिस्टिक्स और आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित होने से उर्वरक, पेट्रोरसायन और अन्य जरूरी सामानों के आयात में रुकावट आ गई है। इन देशों में 90 लाख से अधिक प्रवासी भारतीय काम करते हैं। इनकी रोजी-रोटी और सुरक्षा पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। सरकार इनकी सुरक्षा के हर संभव उपाय कर रही है। जो लोग भारत वापस लौटना चाहते हैं, उनके लिए हवाई सेवा शुरू की गई है और अब तक
होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव से भारत में तेल की कीमतों में वृद्धि के कारण महंगाई में बढ़ोतरी और विदेशी मुद्रा भंडार में कमी होना स्वाभाविक है। इसकी वजह से भारत की आम जनता पर आर्थिक दबाव बढ़ता जा रहा है। रसोई गैस और कॉमर्शियल गैस की कीमतों में क्रमशः 60 रुपये और 115 रुपये की बढ़ोतरी हो चुकी है। सिलिंडरों की कालाबाजारी रोकने के लिए आवश्यक वस्तु अधिनियम (एस्मा) लागू कर दिया गया है। नए नियम के अनुसार अब 25 दिन के बाद ही दूसरा सिलिंडर बुक किया जा सकता है। देश के कई हिस्सों में गैस सिलिंडर के लिए लोगों की लंबी कतारें लगने लगी हैं।
इस युद्ध के कारण न सिर्फ़ तेल और गैस के आयात, बल्कि भारत से दूसरे देशों को होने वाले निर्यात पर असर पड़ा है। जल्दी खराब होने वाली वस्तुओं जैसे फल, सब्जियां, दुग्ध उत्पाद और पेय पदार्थों की भारी मात्रा बंदरगाहों पर अटकी हुई है। यह अच्छी बात है कि सरकार ने समय रहते एहतियाती कदम उठाने शुरू कर दिए हैं।
विदेश मंत्रालय के मुताबिक मार्च के पहले हफ्ते तक खाड़ी देशों से 52 हजार से ज्यादा भारतीय नागरिकों को सुरक्षित निकाला जा चुका है। भारत आज आर्थिक दृष्टि से ऐसे मुकाम पर खड़ा है, जहां से वह सभी पक्षों से केवल शांति की अपील कर सकता है। सबसे अहम बात यह है कि युद्ध में शामिल ईरान, अमेरिका और इजरायल इन तीनों देशों के साथ भारत के रणनीतिक संबंध हैं। ऐसे में कूटनीतिक संतुलन बनाए रखना ही भारत के लिए एकमात्र बेहतर विकल्प है।भारत ने कहा भी है कि समस्या का समाधान कूटनीतिक बातचीत से ही निकाला जाए, युद्ध से समाधान नहीं होगा। भारत की सदाबहार गुट निरपेक्ष नीति की कसौटी पर भी यह रुख बिलकुल सही है।
अंत में भारत में संयुक्त अरब अमीरात के राजदूत के बयान का जिक्र करना बहुत जरूरी है। उनका कहना है कि भारत का तीनों देशों के साथ इतनी करीब संबंध है कि अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चाहें तो एक फोन कॉल से इस युद्ध को रोक सकते हैं। लेकिन वर्तमान कटुतापूर्ण माहौल में ऐसा कर पाना संभव नहीं दिख रहा है क्योंकि इजराइल अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। ईरान इजराइल के अस्तित्व को ही स्वीकार नहीं करता है, जबकि कई मुस्लिम राष्ट्र इजराइल के साथ राजनयिक संबंध स्थापित कर चुके हैं। इस लड़ाई में ईरान के साथ पर्दे के पीछे चीन और रूस जैसे देश भी खड़े हैं। ऐसे में भारत का सक्रिय हस्तक्षेप करना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं होगा। भारत को अपने हितों की सुरक्षा के लिए इन देशों से शांति और कूटनीतिक बातचीत की अपील के साथ-साथ बेहतर विकल्पों की तेजी से तलाश करनी चाहिए।
(लेखक आज अख़बार में नेशनल ब्यूरो हैं)




