लेखक-ओ.पी. पाल
पश्चिम बंगाल की सत्ता का रण एक बार फिर सज चुका है। भारत निर्वाचन आयोग ने राज्य की 294 विधानसभा सीटों के लिए चुनावी बिगुल फूंक दिया है, जहां की राजनीति हमेशा से ही ‘प्रतिबद्धता’ और ‘प्रतिरोध’ की प्रयोगशाला रही है। लेकिन इस बार का यह महामुकाबला केवल यह तय नहीं करेगा कि कोलकाता के ऐतिहासिक ‘राइटर्स बिल्डिंग’ में अगला मुख्यमंत्री कौन बैठेगा, बल्कि यह भारतीय चुनाव आयोग की उस वैश्विक साख की भी सबसे बड़ी परीक्षा साबित होने वाला है, जिसने 2021 के चुनाव और उसके बाद हुई भीषण हिंसा के दाग को धोने और ‘हिंसा मुक्त बंगाल’ का संकल्प लिया है। मसलन इस बार का चुनाव न केवल राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि सुरक्षा और चुनावी प्रक्रिया के प्रबंधन के लिहाज से एक बड़ी चुनौती वाला चुनाव है। आयोग ने इस बार अपने आत्मविश्वास को दर्शाते हुए पिछले 8 चरणों के लंबे कार्यक्रम को घटाकर मात्र दो चरणों में समेटने का ‘साहसिक’ फैसला लिया है, जो अपने आप में एक बड़ा दावं माना जा रहा है। हालांकि इसका असली परिणाम 23 और 29 अप्रैल को होने वाले दोनों चरणों के मतदान की शांति और सुरक्षा से तय होगा?
पश्चिम बंगाल के चुनावी इतिहास में ‘हिंसा’ एक ऐसा शब्द रहा है जिसने लोकतांत्रिक उत्सव को कई बार फीका किया है। 2021 के चुनाव और उसके बाद हुई हिंसा के कड़वे अनुभवों को देखते हुए, इस बार चुनाव आयोग का पूरा जोर ‘हिंसा मुक्त मतदान’ पर है, जिसके लिए पिछले सप्ताह कोलकाता का तीन दिवसीय दौरा करके मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने राज्य के प्रमुख राजनीतिक दलों भाजपा, तृणमूल कांग्रेस, सीपीआई(एम), कांग्रेस और अन्य दलों से रुबरु होकर स्पष्ट संदेश दिया है कि चुनाव आयोग पश्चिम बंगाल में निष्पक्ष, स्वतंत्र और पारदर्शी चुनाव कराने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने हिंसा, धमकाने की कोशिशों और चुनाव कर्मचारियों को प्रभावित करने वाली किसी भी गतिविधि के प्रति ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनाने का ऐलान किया है। मुख्य आयुक्त ने जोर देकर कहा कि आयोग पश्चिम बंगाल में निष्पक्ष, स्वतंत्र और पारदर्शी चुनाव कराने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। अब सवाल है कि क्या यह विधानसभा चुनाव राज्य के चुनावी इतिहास में ‘हिंसा-मुक्त’ होने का नया कीर्तिमान स्थापित कर पाएगा? हालांकि यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन आयोग की सक्रियता ने उन मतदाताओं में भरोसा जरूर जगाया है, जो लंबे समय से शांतिपूर्ण मतदान की बाट जोह रहे हैं। एक मायने में यह चुनाव न केवल बंगाल का भविष्य तय करेगा, बल्कि भारतीय लोकतंत्र में निष्पक्ष चुनाव कराने वाली सर्वोच्च संस्था की साख को भी पुनर्स्थापित करेगा। चुनावी कार्यक्रम के अनुसार इस बार पहले चरण के लिए 23 अप्रैल को उत्तर बंगाल और जंगलमहल के इलाके की 152 सीटों और दूसर चरण में 29 अप्रैल को दक्षिण बंगाल और कोलकाता के आसपास के इलाके की 142 सीटों पर मतदान होना है। जबकि चुनाव के नतीजे चार मई को आएंगे।
बेहद चुनावी मुकाबले के आसार
बंगाल की जमीन पर राजनीतिक बिसात भी दिलचस्प है, जहां चुनावी मुकाबला मुख्य रूप से सत्ताधारी टीएमसी और मुख्य विपक्षी दल भाजपा के बीच आर-पार का है। वहीं पिछले चुनाव में शून्य पर सिमटने के बाद, वाम मोर्चा और कांग्रेस वाला गठबंधन इस बार ‘प्रासंगिकता’ बचाने की जंग लड़ रहा है। टीएमसी की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के सामने चौथी बार सत्ता बरकरार रखने की बड़ी चुनौती है, जिसमें टीएमसी को ‘भ्रष्टाचार’ के गंभीर आरोपों और ‘एंटी-इनकंबेंसी’ (सत्ता विरोधी लहर) से लड़ना है। सत्तापक्ष के लिए हाल ही में मतदाता सूची के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (एसआईआर) को लेकर उपजे विवाद भी भी किसी चुनौती से कम नहीं होगा, जिसका मामला सुप्रीम कोर्ट तक भी पंहुचा है। आयोग के एसआईआर और केंद्रीय फंड में हो रही कटौती को लेकर फैली बेचैनी ने बंगाल में खासतौर से टीएमसी के लिए राजनीतिक चिंताएं बढ़ा दी हैं। वहीं 2021 में 77 सीटें जीतने वाली भाजपा इस बार सत्ता परिवर्तन की पुरजोर कोशिश में जुटी है। पार्टी व्यापक चुनावी रणनीति के साथ ‘घुसपैठ’ और ‘महिला सुरक्षा’ जैसे मुद्दों को आधार बना रही है, लेकिन उसे अभी भी स्थानीय स्तर पर एक सर्वमान्य मजबूत नेतृत्व और सांगठनिक एकजुटता की तलाश है। भले ही सीटों के मामले में टीएमसी आगे दिख रही हो, लेकिन वोट प्रतिशत के मामले में फासला बहुत कम रह गया है, जिसमें यह आंकड़ा बताता है कि बंगाल का मुकाबला बेहद करीबी होने वाला है। हालांकि क्या जमीन पर यह आंकड़े हकीकत में बदलेंगे या 4 मई के नतीजे कुछ और ही कहानी कहेंगे? यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा।
सुरक्षा आयोग की सर्वोच्च प्राथमिकता
पश्चिम बंगाल के चुनावी इतिहास में ‘हिंसा’ एक ऐसा शब्द रहा है जिसने लोकतांत्रिक उत्सव को कई बार फीका किया है। 2021 के चुनाव और उसके बाद हुई हिंसा के कड़वे अनुभवों को देखते हुए इस बार आयोग का पूरा जोर ‘हिंसा मुक्त मतदान’ पर है। इसी रणनीति के तहत चुनाव आयोग चुनाव की घोषणा से पहले ही केंद्रीय बलों 480 कंपनियां राज्य में भेज चुका हैं। आयोग ने स्पष्ट किया है कि केंद्रीय बलों का उपयोग केवल मतदान के दिन ही नहीं, बल्कि मतदाताओं में विश्वास पैदा करने के लिए बलों द्वारा एरिया डोमिनेशन और गश्त में पहले से कर रहा है। वहीं दागी अधिकारियों को लेकर भी चुनाव आयोग पूरी तरह से मुस्तैद है यानी आयोग इस बार कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता। इसलिए आयोग ने उन पुलिस अधिकारियों की सूची मांगी है जिन पर पिछले चुनावों में हिंसा को बढ़ावा देने या लापरवाही बरतने के आरोप लगे थे। ऐसे दागी अधिकारियों को चुनाव प्रक्रिया से दूर रखने के लिए आयोग ने उन्हें हटाने की कार्रवाई भी शुरु कर दी है। वहीं चुनाव आयोग इस बार ‘फर्जी मतदान’ की गुंजाइश खत्म करने की दिशा में मतदान केंद्रों के बाहर चेहरा सत्यापन के लिए विशेष काउंटर बनाने पर विचार कर रहा है, जहाँ बुर्का या घूंघट वाले मतदाताओं की पहचान महिला कर्मचारियों द्वारा की जाएगी।
बंगाल के चुनावी ‘एक्स-फैक्टर’
राजनीतिक जानकारों की माने तो पश्चिम बंगाल में महिलाएं अक्सर साइलेंट वोटर होती हैं। ‘संदेशखाली’ जैसी घटनाओं और ‘लक्ष्मी भंडार’ जैसी योजनाओं के बीच उनका झुकाव ही सत्ता की चाबी तय करेगा। राज्य में बढ़ती बेरोजगारी और भर्ती घोटाले युवाओं के बीच एक बड़ा चुनावी मुद्दा बन चुके हैं। बंगाल में बदलते राजनीतिक परिदृश्य ने नए अवसर पैदा किए हैं। कभी बनर्जी को संदेह की नजर से देखने वाले शहरी बंगाली ‘भद्रलोक’ मतदाता अब एसआईआर के दखल को लेकर अपनी नाराजगी साझा कर रहे हैं। वहीं, ‘मतुआ’ और ‘राजबंशी’ जैसे समुदाय जिनके समर्थन ने भाजपा को बंगाल में मुख्य विपक्षी दल के रूप में खड़ा करने में मदद की थी, अब उनमें भी बेचैनी के संकेत दिख रहे हैं। उत्तर बंगाल में भाजपा की पकड़ मजबूत रही है, जबकि दक्षिण बंगाल टीएमसी का किला है। इस बार दोनों दल एक-दूसरे के गढ़ में घुसपैठ की कोशिश कर रहे हैं। इसलिए इस बार पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव महज आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि यह उन करोड़ों मतदाताओं की उम्मीदों का परीक्षण है, जो दशकों से शांतिपूर्ण मतदान का सपना देख रहे हैं। यदि चुनाव आयोग हिंसा मुक्त मतदान कराने में सफल रहता है, तो यह भारतीय चुनाव प्रबंधन के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित होगा। 4 मई के नतीजे यह बताएंगे कि बंगाल ने ‘दीदी’ की ‘निरंतरता’ को चुना या ‘परिवर्तन’ के ‘केसरिया’ संकल्प को पर भरोसा जताया है।

(लेखक स्वतन्त्र पत्रकार हैं)



