लेखक: प्रयाग पाण्डे
धन लोलुपता के चलते कुछ स्वनामधन्य लोगों और संस्थानों ने भारत की प्राचीनतम चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद को अपनी तिजोरियां भरने का जरिया बना दिया है। कतिपय ऐसे लोगों और संस्थाओं की इस घोर वणिक प्रवृति एवं संकीर्ण सोच ने आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति के वैज्ञानिक आधार को पूर्ण रूप से खंडित कर दिया है।पिछले कुछ वर्षों से आयुर्वेद के नाम पर बाजारों में निम्न दर्जे की औषधियां एवं अन्य उत्पाद बेचने की गलाकाट प्रतियोगिता चल रही है। निहित स्वार्थों के कारण इस पुरातन चिकित्सा पद्धति का बाजारीकरण कर दिया गया है। आयुर्वेदिक के नाम पर बाजार में बेची जा रही निम्न स्तरीय दवाओं के कारण सदियों से जाँची- परखी इस चिकित्सा पद्धति के प्रति लोगों में अविश्वास की भावना उत्पन्न हुई है।
वस्तुतः आयुर्वेद, प्रकृति को समझने और उस समझ का प्रकृति को नियंत्रित करने के लिए उपयोग करने की प्रक्रिया के दौरान प्राप्त अनुभव से उत्पन्न ज्ञान है। इसीलिए आयुर्वेद को प्राचीनतम विज्ञान कहा जाता है। आयुर्वेद का इतिहास उतना ही पुराना है, जितना आदिम समाज का।
वेद प्राचीनकाल से ही मानव सभ्यता की नींव रहे हैं। आयुर्वेद को अथर्ववेद का उप वेद माना जाता है। अथर्ववेद ही आयुर्वेद का मूल आधार है। ईसा पूर्व लगभग छठी शताब्दी में तक्षशिला के चिकित्सा विज्ञान के शिक्षक आत्रेय के शिष्य- जातुकर्ण,भेला, क्षारपाणी,हरिता और पारासर आदि विद्वानों ने औषधि विज्ञान पर अनेक ग्रन्थों की रचना की थी। पांचवीं सदी ईसा पूर्व से छठी सदी के कालखंड में आयुर्वेद पर मौलिक रचनाएं लिखीं गईं। ईसा पूर्व लगभग दूसरी शताब्दी में पतंजलि और उनके बाद अनेक विद्वानों ने भारतीय चिकित्सा पद्धति के मुख्य ग्रन्थ ‘चरक संहिता’ पर टीकाएं लिखीं थीं। चरक संहिता और शल्य चिकित्सा के मूल ग्रन्थ ‘सुश्रुत संहिता’ का रचनाकाल ईसा से छह सौ वर्ष पूर्व माना जाता है। आयुर्वेद के इन प्राचीन ग्रन्थों में विभिन्न रोगों के लक्षण, निदान की सूची का वर्गीकरण, रोगों के उपचार पद्धतियों का वर्णन, औषधियों के गुण, औषधि देने की विधि और मात्रा आदि का सविस्तार वर्णन है।प्राचीनकाल से ही चरक संहिता और सुश्रुत संहिता आदि ग्रन्थ आयुर्वेद के मूलाधार रहे हैं।
आयुर्वेद में सब बीमारियों के लिए वात, पित्त और कफ़,तीन दोष माने गए हैं। इन दोषों में वायु को बलवान माना गया है।नाड़ी परिक्षादि विधि दी गई है। सुश्रुत संहिता में रोग की छह प्रकार की परीक्षा बताई गई है।पाँच श्रोत्रादि इंद्रियों से और छठी प्रश्न से।आयुर्वेद के प्राचीन ग्रन्थों में यह बात साफ तौर पर कही गई है कि बारंबार परीक्षा द्वारा ही रोग निश्चय करना चाहिए। यानी रोग की पहचान और उसके उपचार के लिए शोध को अनिवार्य बताया गया है।
भारत में प्राचीनकाल से ही समृद्ध स्वास्थ्य धरोहर रही है। 3000 ई. पू. के प्राचीन भारत में स्वच्छता और बेहतर जन स्वास्थ्य को विशेष महत्व दिया जाता था।वैदिक काल के दौरान सामुदायिक स्वच्छता के विभिन्न उपायों का उल्लेख वेदों में भी हुआ है। आयुर्वेद तथा मनु संहिता में स्वच्छता के प्रबंधन, व्यक्तिगत स्वच्छता और छूत के रोगों के नियंत्रण से जुड़े रोग निवारण का उल्लेख हुआ है।चन्द्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में विभिन्न रोगों के रोकथाम के लिए एक विकसित जन स्वास्थ्य प्रणाली थी। उस दौर में साफ -सफाई और स्वच्छता के प्रबंधन की जिम्मेदारी राज्य की होती थी। मध्यकाल के दौरान प्रकाशित अनेक काव्य संग्रहों में भी रोगों की रोकथाम के लिए अपनाए जाने वाले उपायों का उल्लेख हुआ है।
भारत में प्राचीन काल से ही रोगों के रोकथाम से जुड़ी अनेक प्रथाएं प्रचलित हैं। मसलन- भोजन से पहले और भोजन के बाद हाथ धोना,घर के भीतर जाने से पहले जूते – चप्पल बाहर उतारना,रोजाना स्नान करना,रसोईघर में सबको नहीं जाने देना, प्रसूति के बाद माँ और बच्चे को एक निश्चित समय के लिए अलग रखन,ताकि माँ और नवजात शिशु को संक्रमण से बचाया जा सके। प्राचीन भारत के निवासी टीकाकरण से भी बखूबी वाक़िफ़ थे।उस काल में चिकित्सा के बजाय रोगों की रोकथाम पर अधिक ध्यान दिया जाता था।
करीब ढाई हजार साल पहले भारत में चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई। लौह युगीन भारत में चरक और सुश्रुत के शिष्य गाँव-गाँव जाकर रोगियों की शल्य चिकित्सा करते थे।शल्य चिकित्सा से पहले रोगी को मदिरा पिलाई जाती थी। ताकि शल्य चिकित्सा के दौरान होने वाले दर्द की वजह से रोगी बेहोश न होने पाए और उसे उपकरणों की चुभन का भी अनुभव न हो। यह प्राचीन भारत की चिकित्सा पद्धति में अपनाए गए वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तकनीक का प्रारंभिक चरण था।हालाँकि चरक और सुश्रुत के शिष्यों के इस वैज्ञानिक दृष्टिकोण के कारण उन्हें अक्सर धर्माधिकारियों के क्रोध का भी सामना करना पड़ता था।
आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति आध्यात्मिक विश्वास पर आधारित है। लिहाजा प्रारंभिक वैदिक काल में रोगी के उपचार का दायित्व पुरोहितों का था। रोगियों का उपचार करना पुरोहित का कर्तव्य माना जाता था।
आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति पर शार्ङ्गधर नाम के एक विद्वान ने
शार्ङ्गधरसंहिता लिखी है। शार्ङ्गधरसंहिता का रचनाकाल 12वीं शताब्दी माना जाता है।शार्ङ्गधरसंहिता में आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति में रोग की पहचान और संबंधित रोग के लिए दवा बनाने की लंबी और जटिल प्रक्रिया का विस्तृत वर्णन है।शार्ङ्गधरसंहिता के श्लोक संख्या-तीन में लिखा गया है कि:-
हेत्वादिरूपाकृतिसात्म्यजातिभेदै: समीक्ष्यातुरसर्वरोगान।।
चिकित्सितं कर्षणबृंहणाख्यं कुर्वीत वैद्यो विधिवत्सुयोगे:।।3।।
अर्थात: प्रथम वैद्य हेतु आदिरूप आकृति सात्म्य जाति इन भेदों से रोगी के संपूर्ण रोगों को जान फिर यथाशास्त्र उत्तम प्रकार के प्रयोगों से कृषण और बृहण द्विविध चिकित्सा यथाक्रम करे।अन्यथा दोष लगता है।
वाग्भट्ट लिखते हैं -कि जो बिना दोषों को जाने वैद्य चिकित्सा कर्म को करता है वो उस कर्म की सिद्धि को तथा सुख और सद्गति को नहीं प्राप्त होता।।3।।
शार्ङ्गधरसंहिता में औषधि कैसे,किस प्रकार और किस स्थान से लाई जा सकती है, इसका पूरा विधान दिया गया है। जड़ी- बूटियों की गुणवत्ता में स्थान और ऋतु का बहुत महत्व बताया गया है।शरद ऋतु (आश्विन- कार्तिक) महीने की संपूर्ण औषधि को रस से परिपूर्ण बताया गया है।
शार्ङ्गधरसंहिता में श्मशान भूमि, बंजर,रास्तों की जड़ी – बूटियां और कीड़े की खाई,आग से जली तथा पाले की मार वाली जड़ी-बूटियों को वर्जित बताया गया है। औषधि लाने की जटिल विधि बताई गई है। कहा गया है कि औषधि लाने के निमित्त प्रातः काल उठ स्वस्थ्य चित्त करके, पवित्र होकर,उत्तम दिन,अर्थात-उत्तम तिथि,नक्षत्र,योग और लग्न में,सूर्य के सन्मुख मुख करके तथा सूर्य को प्रणाम कर और ह्रदय में परमात्मा का ध्यान कर,मौन में स्थिर हो, जंगल और अनुपरहित ऐसी साधारण पृथ्वी में उत्पन्न होने वाली और उत्तर दिशा में जो औषधि है,उनको ग्रहण करे। यह भी कहा गया है कि उत्तराश्रितं अर्थात उत्तराभिमुख होकर औषधि उखाड़े।
औषधियों में जड़ी-बूटियों के किस भाग का उपयोग किया जाना चाहिए, शार्ङ्गधरसंहिता में इसका भी विस्तार पूर्वक वर्णन है। कहा गया है कि जिन वृक्षों की बड़ी जड़ हो,जैसे नीम,वड़ और आम,उनकी छाल या जड़ की छाल लेनी चाहिए। जिन वनस्पतियों की छोटी जड़ हो,जैसे कटेरी, धमासा,गोखरू आदि उनके सभी अंग- जड़, पत्ता, फूल-फल और शाखाएं, सब लेनी चाहिए।
आम धारणा है कि आयुर्वेद की दवाएं या उत्पाद कालातीत नहीं होते। पर ऐसा नहीं है।
शार्ङ्गधरसंहिता में कहा गया है कि वन से लाई हुई औषधि एक वर्ष के पश्चात तेज और गुण रहित हो जाती है। कुछ चूर्ण दो महीने के पश्चात वीर्यहीन हो जाते हैं। हाँ, लवण भास्करादि चूर्ण, विजयादि गुटिका तथा खंडकादि अवलेह लंबे समय तक अपने गुणों को नहीं त्यागते। आसव, सुवर्ण आदि धातु की भस्म, चंद्रोदयादि रस और रसायन जितने पुराने हों,उतने ही गुण वाले होते हैं।
सोलहवीं शताब्दी के मध्य तक भारतीय विज्ञान का दर्जा यूरोपीय विज्ञान के बराबर था। मुगल काल में भारत में विज्ञान की प्रगति में ठहराव आ गया। यह बात दीगर है कि अकबर के दरबार में चिकित्सकों की सूची में आयुर्वेदिक चिकित्सक भी थे। तब शल्य चिकित्सा सामान्य बात थी। कहा जाता है कि चिकित्सक अंग प्रत्यारोपण भी करते थे।
औपनिवेशिक शासन काल में भारत में विज्ञान और प्रौद्योगिकी की गौरवशाली भारतीय परंपरा का ह्रास प्रारंभ हो गया। कालांतर में भारतीय चिकित्सा विज्ञान की वैज्ञानिक ओजस्विता क्रमशः क्षीण होती चली गई।
आयुवेर्दिक चिकित्सा पद्धति के बनिस्बत पाश्चात्य चिकित्सा पद्धति एकदम नई है। यह कुछ शताब्दी पहले ही अस्तित्व में आई है।हालांकि पाश्चात्य चिकित्सा पद्धति अत्याधुनिक है,बेहतरीन है और असरदार भी।लेकिन इसने दूसरी परंपरागत चिकित्सा पद्धतियों का अस्तित्व को खतरे में डाल दिया है।
भारत की प्राचीन स्वास्थ्य देखभाल पद्धति अत्यंत जीवंत थी। इस पद्धति का अपना यशस्वी अतीत रहा है। कुछ रोगों को दूर करने के लिए अभी भी इन्हें सर्वोत्तम समझा जाता है और ये हैं भी। बशर्ते कि जड़ी-बूटियों के एकत्रीकरण, दवा बनाने और रोगी को उपयुक्त समय एवं मात्रा में दवा खिलाने आदि के संबंध में आयुर्वेद के प्राचीन ग्रन्थों में उल्लिखित विधान का निःस्वार्थ भाव से पूर्णतः पालन किया जाय।व्यावसायिक दृष्टि से व्यापक स्तर पर दवाओं के उत्पादन की स्थिति में यह संभव नहीं है।ऐसा निःस्वार्थ एवं परोपकारी प्रवृति के वैद्य ही कर सकते हैं।बड़े आयुर्वेदिक दवा निर्माता कंपनियों ने गाँव-क्षेत्र स्तर की परंपरागत वैद्यकी को अप्रासंगिक बना दिया है। बाजार में जिसने जो जड़ी-बूटी जिस नाम से बेची,दवा निर्माता उसे उसी नाम से खरीद कर आगे बेच दे रहे हैं। आज बाजार में आयुर्वेद के नाम पर बिकने वाली अधिकांश दवाएं या अन्य उपभोक्ता वस्तुएं जरूरी नहीं कि आयुर्वेदिक ही हों। कुछ संस्थाओं और लोगों ने आयुर्वेदिक चिकित्सा प्रणाली का व्यवसायीकरण और बाजारीकरण कर दिया है। आज बाजार आयुर्वेदिक दवाओं एवं अन्य उत्पादों से भरे पड़े हैं। संबंधित दवा या उत्पाद में जिस जड़ी-बूटी के होने का दावा किया गया है, इतनी अधिक मात्रा में वो जड़ी-बूटियां किस जंगल या खेत से आती हैं। उनकी गुणवत्ता वही है,जो आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति में बताई गई है। यह बड़ा सवाल है। विचारणीय भी। संभव है कि आयुर्वेद के नाम पर अधिकांश उत्पादों में आयुर्वेदिक ग्रन्थों में सुझाई गईं जड़ी-बूटियां नहीं,बल्कि आयुर्वेद की प्राचीनतम एवं समृद्ध धरोहर को बेचा जा रहा हो।
आयुर्वेद को कारगर इलाज पद्धति बनाने के लिए बड़ी-बड़ी दवा निर्माता कंपनियों की नहीं,वैद्यों की जरूरत है। अन्यथा लोगों का लंबे अरसे तक आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति पर भरोसा कायम रख पाना संभव नहीं होगा।

(लेखक मान्यता प्राप्त स्वतन्त्र पत्रकार हैं और अपने 42 वर्षीय पत्रकारिता व लेखन यात्रा के दौरान विभिन्न विषयों पर 6 पुस्तकें लिख चुके हैं)



