लेखक:ओ.पी. पाल
भारतीय राजनीति में ‘महिला आरक्षण’ एक ऐसा ब्रह्मास्त्र है जिसे हर दल चलाना चाहता है, लेकिन इसकी ‘कमान’ किसके हाथ में रहेगी, इसी पर असली युद्ध छिड़ा है। वर्तमान परिस्थितियों में परिसीमन वह पुल है, जिसे पार किए बिना आरक्षण की मंजिल तक पहुंचना नामुमकिन है। यदि लोकसभा में वर्तमान 543 सीटों पर ही 33 प्रतिशत आरक्षण लागू होता है, तो लगभग 181 सीटें सीधे तौर पर पुरुषों के हाथ से निकल जाएंगी। इससे राजनीतिक दलों के भीतर अंदरूनी विद्रोह और पुरुष प्रधान राजनीति में असंतोष पैदा हो सकता है। मसलन महिलाओं को आरक्षण देने के लिए परिसीमन ही एक समाधान है, जिसके बाद लोकसभा सीटों की संख्या बढ़कर 800 से अधिक होने पर यदि महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित भी होती हैं, तो भी पुरुषों के लिए उपलब्ध सीटों की संख्या वर्तमान की तुलना में कम नहीं होगी। यही कारण है कि ‘सीटें बढ़ाना’ इस गतिरोध का एकमात्र व्यावहारिक समाधान है। सरकार का भी शायद यही मकसद है कि लोकसभा सीटें बढ़ाने के बाद ही 33 प्रतिशत आरक्षण लागू हो, ताकि पुरुष सांसदों की सीट पर असर न पड़े। इसके विपरीत, मौजूदा सीटों में ही आरक्षण लागू करना भी संभव माना जाता है, जो इसे बिना सीट बढ़ाए भी मुमकिन बनाता है।
भारतीय लोकतंत्र में समावेशिता के लिए इन दोनों विधेयकों (आरक्षण और परिसीमन) पर सर्वसम्मति अनिवार्य है। यदि ऐसा नहीं होता, तो यह मुद्दा केवल चुनावी घोषणापत्रों तक सीमित रहेगा। हालांकि महिला आरक्षण (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) को परिसीमन से जोड़ना एक जटिल राजनीतिक और संवैधानिक मुद्दा है। केंद्र सरकार ने साल 2023 के (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) महिला आरक्षण के क़ानून को लागू करने के लिए नोटिफ़िकेशन जारी करके महिला आरक्षण का ‘चेक’ तो काट दिया गया है, लेकिन उस पर ‘तारीख’ परिसीमन की डाली गई है। यह भी सत्य है कि सदनों में बिना सीटें बढ़ाए महिला आरक्षण लागू करने से ‘पुरुषों का हक’ छिनने का डर पैदा होगा। इसीलिए सरकार ने लोकसभा में केंद्र शासित प्रदेश क़ानून (संशोधन) विधेयक भी महिला आरक्षण (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) को परिसीमन के साथ पेश किया था, ताकि केंद्र शासित प्रदेशों के निर्वाचन, क़ानून व आरक्षण व्यवस्था को नए परिसीमन और लोकसभा के विस्तार ढांचे से जोड़ा जा सके। लेकिन विपक्ष ने इसे अटकाकर सरकार के इरादों पर पानी फेर दिया। लोकसभा में महिला आरक्षण क़ानून और डीलिमिटेशन से जुड़ा 131वां संवैधानिक संशोधन विधेयक गिरने के बाद राजनैतिक गलियारे में यह भी चर्चा है कि महिला आरक्षण और डीलिमिटेशन से जुड़े बिलों का गिरना भाजपानीत एनडीए के लिए झटका है या ‘मास्टरस्ट्रोक’? हालांकि विश्लेषकों की नजर में इस विधेयक का गिरना सरकार के लिए झटका है।
विपक्ष पर फूटा ठींकरा?
बहराल, लोकसभा में हालिया घटनाक्रम के बाद देश की महिलाओं के बीच जो संदेश गया है, उसके दो पहलू माने जा रहे हैं। इनमें एनडीए के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने इस बिल के जरिए जहां खुद को ‘नारी शक्ति’ का सबसे बड़ा पैरोकार साबित करने की कोशिश की है, वहीं सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की दृष्टि से इसे ‘नारी शक्ति वंदन’ नाम देकर एक भावनात्मक और सांस्कृतिक मुद्दा बना दिया गया है। इसलिए बिल के लागू होने में देरी या बाधा के लिए एनडीए सरकार अब विपक्ष को ‘महिला विरोधी’ करार दे रही है। गृहमंत्री अमित शाह का यह बयान कि विपक्ष को महिलाओं के क्रोध का सामना करना पड़ेगा, इसी रणनीति का हिस्सा है। सरकार का तर्क है कि सीटों की संख्या बढ़ाकर महिलाओं को आरक्षण देने से मौजूदा सीटों का पुनर्गठन नहीं करना पड़ेगा और पुरुष सांसदों का हक भी सुरक्षित रहेगा।
विपक्ष की चुनौती और तर्क
लोकसभा में पिछले 12 साल में ये पहली बार हुआ है, जब सदन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की सरकार की तरफ़ से पेश कोई संवैधानिक संशोधन विधेयक सदन में गिरा हो। सदन में इस विधेयक को लेकर हुई चर्चा के दौरान कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दलों (सपा, राजद) का तर्क दिया है कि बिना एससी/एसटी और ओबीसी महिलाओं के लिए अलग कोटे के, यह बिल केवल ‘सभ्रांत महिलाओं’ तक सीमित रह जाएगा। परिसीमन का संदेह जताते हुए विपक्ष ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार परिसीमन की आड़ में दक्षिण भारत की सीटें कम करना चाहती है और उत्तर भारत (जहां भाजपा मजबूत है) का प्रभाव बढ़ाना चाहती है। विपक्ष हवा-हवाई वादा करार देते हुए इसे ‘चुनावी जुमला’ कह रहा है, क्योंकि इसके लागू होने की तारीख (संभवतः 2029) बहुत दूर है। जबकि विपक्ष इस बिल को अटकाकर जातिगत जनगणना और तत्काल लागू करने की मांग कर रहा है।
अधूरी प्रतिबद्धता का प्रतीक
एनडीए ने महिला वोट बैंक’ लाड़ली बहना’ जैसी योजनाओं से महिलाओं में पकड़ मजबूत की है। एनडीए का मानना है कि महिलाओं को बराबरी का अधिकार देना केवल संवैधानिक मजबूरी नहीं, बल्कि एक सशक्त राष्ट्र के लिए नैतिक जिम्मेदारी है। इसलिए अब उनके ‘हक और हिस्सेदारी’ की बात कर ओबीसी और दलित महिलाओं को साधने के अलावा दक्षिण भारत के राज्यों के साथ ‘अन्याय’ का मुद्दा उठाकर क्षेत्रीय गौरव भुनाने की कोशिश की है। एनडीए को उत्तर-दक्षिण विभाजन उत्तर भारत में सीटों की बढ़ोत्तरी से बड़ा फायदा मिलने की उम्मीद है। एनडीए का मानना है कि महिलाओं को बराबरी का अधिकार देना केवल संवैधानिक मजबूरी नहीं, बल्कि एक सशक्त राष्ट्र के लिए नैतिक जिम्मेदारी है। लेकिन लोकसभा में महिला आरक्षण विधेयक का अधूरा रहना केवल एक विधायी पराजय नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की अधूरी प्रतिबद्धता का प्रतीक भी माना जा रहा है।
सामाजिक न्याय की राह
राजनैतिक विशेषज्ञ मानते है कि महिला आरक्षण विधेयक केवल सीटों के आवंटन का मामला नहीं है। यह नीतियों में संवेदनशीलता लाने का एक जरिया है। यदि विधानसभाओं और लोकसभा में महिलाओं की भागीदारी 33 प्रतिशत होती है, तो शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा जैसे बुनियादी मुद्दों पर निर्णय लेने की प्रक्रिया अधिक व्यावहारिक और मानवीय होगी। वर्तमान में संसद में महिलाओं की उपस्थिति 15 प्रतिशत से भी कम होना इस बात का प्रमाण है कि लोकतंत्र का यह हिस्सा अब भी असंतुलित है। दशकों तक यह विधेयक राजनीतिक असहमति के कारण अधर में लटका रहा। जनगणना आधारित सीटों के पुनर्वितरण (परिसीमन) और ‘कोटे के भीतर कोटा’ जैसी आपत्तियों ने इसे कभी पारित नहीं होने दिया। सपा और अन्य क्षेत्रीय दलों की अपनी आशंकाएं थीं, वहीं भाजपा के लिए दो-तिहाई बहुमत जुटाना एक कठिन चुनौती बनी रही। इन तमाम कारणों ने कई बार एक ऐतिहासिक अवसर को जन्म लेने से पहले ही समाप्त कर दिया।

(लेखक स्वतन्त्र पत्रकार हैं)




