लेखक- संजय राय
जंतर मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के नाटक के दूसरे हिस्से का आज रोमांचक पटाक्षेप हुआ। महज कुछ घंटे चले इस आंदोलन में युवाओं की अप्रत्याशित हुजूम उमड़ा हुआ था। सरकार और पुलिस प्रशासन ने इनके ऊपर लाठीचार्ज किया, आंसू गैस के गोले छोड़े। आक्रोशित युवाओं ने पुलिस पर भी हमला किया। दोनों तरफ से कई लोग घायल हुए।
इन घटनाओं के बीच सत्ता के नशे में चूर सरकार को होश आया। आंदोलन से जुड़े तीन प्रतिनिधियों के साथ सरकार बातचीत के लिए तैयार हुई। बातचीत के दौरान आंदोलनकारियों ने तीन मांगों के साथ अपना ज्ञापन सौंपा। सरकार की तरफ से केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने उनकी मांगों को सरकार तक पहुंचाने का आश्वासन दिया।
इसके कुछ देर बाद ही सोनम वांगचुक ने अभिजीत दीपके से अनशन तोड़ने की अपील की, जिसे अभिजीत ने मान लिया। सोनम का अनशन अस्पताल में भी जारी रहने की बात कही गई। शाम होते- होते जंतर मंतर से कॉकरोच जनता पार्टी का तंबू और मंच पुलिस ने उखाड़ दिया अब जंतर मंतर पर कोई भी प्रदर्शनकारी नहीं बचा है। सीजेपी प्रमुख अभिजीत दीपके आगे क्या करेंगे, पता नहीं, लेकिन उनके आंदोलन की कमान एक तरह से सोनम वांगचुक के हाथ में आ गई है।
प्रदर्शन में भाग लेने आए नोएडा और ग्रेटर नोएडा से कुछ युवा छात्रों से मैने बात करके उनका मनोभाव जानने की कोशिश की। उनके मन में निराशा का भाव था उन्हें खुद पता नहीं था कि वे आगे क्या करेंगे। एक छात्र से जब यह सवाल किया कि क्या कल भी तुम आओगे? उसका जवाब था “नहीं”। मैने पूछा क्यों? उसने कहा, “अंकल हमारा कोई नेता ही नहीं है।” सरकार के लाठीचार्ज और बल प्रयोग पर उसका कहना था कि सरकार को हम चुनते हैं, हमें अपनी आवाज उठाने का पूरा हक है। अगर सरकार हमारी बात नहीं सुनेगी तो कौन सुनेगा?
एक बच्चे ने से पूछा कि तुम्हें इस आंदोलन के बारे में कैसे पता चला? उसने कहा इंस्टाग्राम से। फिर उसने पूछा, “अंकल आप कहां से हो? मैने बताया मीडिया से हूं। उसने चेहरे पर नाराजगी का भाव लाते हुए कहा अंकल मीडिया भी तो असली खबर दिखाता नहीं रहा है। मैने कहा, मैं प्रिंट मीडिया से हूं और फिर उससे पूछा अखबार में तो खबरें आ रही हैं। अखबार पढ़ते हो कि नहीं? उसने कहा हम लोग अखबार नहीं पढ़ते हैं। सोशल मीडिया से ही हमें सब पता चलता है।
यह बातचीत हमारे वर्तमान समाज में युवाओं, मीडिया, सरकार और विपक्ष की दशा-दिशा का आईना है। यह कटु सत्य है कि अधिकतर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अपनी विश्वसनीयता खो चुके हैं। प्रिंट मीडिया कहीं न कहीं सभी तरह की खबरों को किसी न किसी पृष्ठ पर छाप देता है, लेकिन युवा अखबार पढ़ ही नहीं रहा है। जहां तक सोशल मीडिया की बात उसने सबको “पत्रकार” बना दिया है। नेताओं के बीच चेहरा दिखाकर तुरंत चर्चा में आने की प्रवृत्ति अपने चरम पर है। ऐसे में जमीन पर रहकर खबर लाने वाले हम जैसे पत्रकारों की बातों को समझना तो दूर, कोई सुनना भी नहीं चाहता है।
ऐसे में सच और झूठ का पता लगाना मुश्किल हो गया है। कहीं से भी पुरानी वीडियो उठाकर उसे आंदोलन से जोड़ देना, एआई से कुछ भी बनाकर अफवाह फैलाना, किसी के वक्तव्य को आधा अधूरा पेश करके लोगों को गुमराह करना अब बहुत आसान हो गया है।
आखिर में सरकार की बात। बहुत दिन तक सत्ता में रहकर राजनेता अंधे, गूंगे और बहरे हो जाते हैं। उनका नैतिक बल क्षीण हो जाता है। आज यही स्थिति है। हकीकत का सामना करने को कोई तैयार नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर आज के घटनाक्रम का क्या असर पड़ेगा ये तो समय ही बताएगा, लेकिन सत्य यही है कि आज वह युवाओं की नब्ज पहचानने में विफल साबित हुए हैं।
याद रहे, लोकतंत्र में सरकारें झुक कर बड़ी होती हैं, अकड़ कर नहीं। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। सत्र के बीच में भी मंत्रिमंडल में फेरबदल किया जा सकता है। यह समय की मांग है कि सिर्फ शिक्षा मंत्री ही नहीं, कई अन्य नाकारा मंत्रियों को यथाशीघ्र कैबिनेट से बाहर का रास्ता दिखाकर साफ सुथरे ईमानदार लोगों को मंत्री बनाया जाए। प्रधानमंत्री के पास अपनी विश्वसनीयता बहाल करने का इसके अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है।

(लेखक आज अख़बार में नेशनल ब्यूरो हैं)



