लेखक -मनोज श्रीवास्तव
जंतर-मंतर के लाठीचार्ज से वह भी आहत होने का अभिनय कर रहे हैं जिन्होंने दमन और नरसंहार के बल पर सत्ता चलाया है।
सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव राज्य सीमेंट निगम को अपने व्यवसायी मित्रों को कौड़ियों के भाव देने के लिये दिन- दहाड़े नरसंहार करवाने में भी नहीं हिचकिचाये। अयोध्या में कारसेवकों का दो बार और पृथक उत्तराखंड की मांग करने वालों का तीन राउंड नरसंहार करवाया।पूर्व भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने डॉ लक्ष्मीकांत वाजपेयी ने कहा कि अखिलेश यादव इतने संवेदशीलता का ड्रामा करते फोटो शूट करवा रहे हैं, लेकिन इनके मुख्यमंत्रित्व काल में जब मुजफ्फरनगर दंगे हुये तो यह सैफई महोत्सव में डूबे थे।कई दिन बाद जब जागे तो मुजफ्फरनगर जाने दंगाइयों को दंडित करने के बजाय दंगे के आरोपियों को स्टेट प्लेन से मुख्यमंत्री आवास बुला कर पुलिसकर्मियों का मनोबल तोड़ने के साथ बहुसंख्यक हिन्दू समाज का विस्वास खोया। जिसके कारण 2017 से लगातार सपा के चुनाव हारने के सिलसिला चला।
मुलायम सिंह यादव की उपलब्धि-
अयोध्या नरसंहार-
उत्तर प्रदेश में जनता दल सरकार के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के कार्यकाल में अयोध्या राम मंदिर आंदोलन के दौरान उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा मुख्य रूप से दो दिनों30 अक्टूबर 1990 और 2 नवंबर 1990 को कारसेवकों पर गोलीबारी की गई थी। सरकारी आंकड़ों के अनुसार इन घटनाओं में लगभग 15 से 17 लोगों की मौत हुई थी, जबकि विश्व हिंदू परिषद और अन्य संगठनों का दावा था कि इसमें 50 से अधिक कारसेवक शहीद हुए थे। शहादत प्राप्त करने वालों में कोलकाता तत्कालीन (कोलकत्ता) के उद्यमी परिवार से अयोध्या आये दो सगे भाई शरद कोठारी और रामकुमार कोठारी, वासुदेव गुप्ता, राजेन्द्र धरकार, रमेश पांडेय का नाम प्रमुख है। 2 नवंबर 1990 को हनुमानगढ़ी और रामलला के पास भारी संख्या में जुटे कारसेवकों पर पुलिस बल द्वारा दोबारा गंभीर गोलीबारी की गई। इसी दिन हनुमानगढ़ी के सामने वाली गली में लाल कोठी के पास कोलकाता के रहने वाले दो सगे भाई रामकुमार कोठारी और शरद कोठारी समेत कई अन्य राम भक्तों की पुलिस की गोली से जान चली गई थी।
सोनभद्र नरसंहार-
1991 में जनता दल सरकार के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने सोनभद्र जिले में उत्तर प्रदेश राज्य सीमेंट निगम की डाला, चुर्क और चुनार इकाइयों के प्रस्तावित निजीकरण और संपत्तियों को बेचे जाने का विरोध करने वालों पर दिन दहाड़े गोलियां चलवाया था। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, गोलीबारी शुरू होते ही पूरे इलाके में अफरा-तफरी मच गई। बाजार बंद होने लगे और कॉलोनियों में दहशत फैल गई। बताया गया कि इस गोलीकांड में कवि रामप्यारे विधि, शैलेंद्र राय, नरेश राम, दीनानाथ, रामधारी, सुरेंद्र द्विवेदी, नंदलाल, बालगोविंद और छात्र राकेश तिवारी की मौत हो गई। वहीं, 50 से अधिक लोग घायल हुए और बड़ी संख्या में श्रमिकों को गिरफ्तार किया गया।” इस कष्टदायक और ऐतिहासिक श्रमिक आंदोलन की याद में स्थानीय लोग हर साल 2 जून को ‘शहीद दिवस’ मनाते हैं। बताया जाता है कि राज्य सीमेंट निगम के संस्थानों को मुलायम सिंह यादव की सरकार ने औने पौने दाम पर बेचने के लिये मजदूर, गरीब, छात्र व जिसने भी विरोध किया उसकी जान लेने से भी बाज नहीं आये थे। मजदूरों का आरोप था कि सरकार सार्वजनिक संपत्तियों को बेहद कम कीमत पर बेचने की तैयारी कर रही है। मेज के नीचे बड़ी कमीशनखोरी की गई है।
उत्तराखंड राज्य की मांग को दबाने के लिये मुलायम सिंह यादव की सरकार ने तीन नरसंहार में 20 निर्दोषों को मारा!
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष व अविभाजित तत्कालीन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव उत्तराखंड राज्य की मांग के समर्थन में प्रदर्शन कर रहे निहत्थे आंदोलनकारियों पर वर्ष 1994 में उत्तर प्रदेश के खटीमा, मसूरी और मुजफ्फरनगर (रामपुर तिराहा) में पुलिस द्वारा बर्बर गोलीबारी की गई थी, जिसमें कई लोग शहीद हो गए थे।
1- खटीमा गोलीकांड (1 सितंबर 1994) को पृथक राज्य की मांग को लेकर खटीमा (उधम सिंह नगर) में शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे आंदोलनकारियों पर पुलिस ने गोली चलाई, जिसमें 7 आंदोलनकारी शहीद हुए।
2- मसूरी गोलीकांड (2 सितंबर 1994) को खटीमा की घटना के विरोध में मसूरी में मौन जुलूस निकाल रहे लोगों पर पुलिस और पीएसी ने गोलीबारी की, जिसमें 6 लोग (दो महिलाओं सहित) और एक पुलिस अधिकारी की जान गई।
3- रामपुर तिराहा कांड, मुजफ्फरनगर 1-2 अक्टूबर 1994 को गांधी जयंती पर दिल्ली में राजघाट पर धरना देने जा रहे आंदोलनकारियों पर मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहे पर पुलिस ने रात में कार्रवाई की, जिसमें 7 आंदोलनकारी शहीद हुए और महिलाओं के साथ अमानवीय अत्याचार के भी गंभीर आरोप लगे।
इन ऐतिहासिक बलिदानों और जन-आक्रोश के परिणामस्वरूप अंततः 9 नवंबर 2000 को उत्तर प्रदेश से विभाजित होकर उत्तराखंड एक अलग राज्य के रूप में अस्तित्व में आया।
मुख्यमंत्री के रूप में अखिलेश यादव ने अपनी उपलब्धि जो विधानसभा की कार्यवाही में बताया था, उसके अंश!
1- 2013 के मुजफ्फरनगर दंगे उत्तर प्रदेश , भारत के मुजफ्फरनगर जिले में हिंदू जाटों और मुसलमानों के बीच धार्मिक झड़पें थीं । इन झड़पों में कुल 62 लोग मारे गए, जिनमें से 42 मुसलमान और 20 हिंदू थे। 50,000 से अधिक लोग विस्थापित हुए।”
2- अखिलेश के कमान संभालने के बाद प्रदेश में लगभग 27 दंगे हुए। मुख्यमंत्री ने तीन मार्च को विधानसभा में एक प्रश्न के जवाब में बताया कि प्रदेश में 15 मार्च, 2012 से 31 दिसंबर, 2012 के बीच लगभग 27 दंगे हुए। इनमें मथुरा के पास कोसीकलां, बरेली, और फैजाबाद के दंगे काफी बडे़ थे, इनमे जान माल का ज्यादा नुकसान हुआ। सात दंगे ऐसे रहे जिनमें नुकसान थोड़ा कम हुआ। इनमें प्रतापगढ़ में दो, गाजियाबाद, बरेली, संभल, बिजनौर और इलाहाबाद में एक-एक दंगे हुए। इनके अलावा मेरठ में तीन, गाजियाबाद में दो, मुजफ्फनगर में तीन, कुशीनगर में दो, लखनऊ, बिजनौर, सीतापुर, बहराइच, संत रविदास नगर, मुरादाबाद और संभल में एक-एक दंगे हुए।”

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)




