लेखक :राजेन्द्र सिंह जादौन
मोदी सरकार से मोहन सरकार तक पत्रकारों की उपेक्षा की कहानी

लोकतंत्र में पत्रकारिता को चौथा स्तंभ कहा जाता है। पत्रकार सत्ता से सवाल करता है, जनता की आवाज उठाता है, भ्रष्टाचार उजागर करता है और सरकार को उसकी जिम्मेदारियां याद दिलाता है। लेकिन आज सवाल यह है कि जो पत्रकार लोकतंत्र की रक्षा के लिए मैदान में खड़ा है, उसके अधिकारों, सुविधाओं और सम्मान की रक्षा कौन करेगा? नेताओं को सुविधाएं देने वाली सरकारें पत्रकारों की सुविधाओं के मामले में पीछे क्यों हट जाती हैं? क्या पत्रकारों का काम सिर्फ सरकार की उपलब्धियां गिनाना और नेताओं के भाषण प्रकाशित करना रह गया है?केंद्र की मोदी सरकार के कार्यकाल में पत्रकारों की सुविधाओं को लेकर कई सवाल उठे हैं। मध्यप्रदेश में भी पत्रकारों को लेकर की गई घोषणाओं और जमीनी हकीकत के बीच अंतर होने की शिकायतें सामने आती रही हैं। शिवराज सिंह चौहान की सरकार हो या वर्तमान मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की सरकार, पत्रकारों के हितों पर ठोस और परिणामकारी काम को लेकर जवाब मांगना जरूरी है।नेताओं को मुफ्त सुविधाएं, पत्रकारों को रियायत के लिए इंतजार! देश में सांसदों, मंत्रियों और जनप्रतिनिधियों को नियमानुसार रेल यात्रा तथा अन्य आधिकारिक सुविधाएं मिलती हैं। उनकी यात्राओं और सरकारी व्यवस्थाओं पर खर्च होता है। दूसरी तरफ, पत्रकारों को मिलने वाली रेल यात्रा रियायत कोविड महामारी के दौरान बंद कर दी गई थी। इसके बाद पत्रकार संगठनों और जनप्रतिनिधियों की ओर से इसे बहाल करने की मांग उठती रही है। लेकिन पत्रकारों की पुरानी रेल रियायत अब तक बहाल नहीं हुई है।आखिर पत्रकारों की रेल रियायत बहाल करने में ऐसी कौन-सी कठिनाई है, जिसका समाधान सरकार नहीं निकाल सकती? पत्रकार भी इसी देश का नागरिक है। वह अपनी जेब से यात्रा करता है, खबरों के लिए लंबी दूरी तय करता है और कई बार सीमित वेतन में अपना परिवार चलाता है। ग्रामीण और छोटे समाचार पत्रों से जुड़े पत्रकारों की आर्थिक स्थिति तो और भी कठिन होती है।रेल मंत्री से सवाल होना चाहिए कि पत्रकारों की रेल रियायत बहाल करने पर सरकार की स्पष्ट नीति क्या है? यदि इसे बंद रखना जरूरी समझा गया है, तो उसके पीछे के आर्थिक और प्रशासनिक कारण सार्वजनिक किए जाने चाहिए। लोकतंत्र में किसी सुविधा की समीक्षा हो सकती है, लेकिन पत्रकारों की मांग को अनिश्चितकाल तक टालना उचित नहीं है।टोल टैक्स में छूट का सवाल भी पत्रकारों के बीच चर्चा का विषय रहा है। केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी के कार्यकाल में टोल संबंधी नियमों और छूट की पात्रता पर बहस होती रही है। हालांकि, सभी पत्रकारों को टोल छूटभी सिर्फ लोकल पत्रकारो और अधिमान्य पत्रकारो का अधिकार मान है फिर भी सवाल जायज है कि खबरों के लिए लगातार यात्रा करने वाले पत्रकारों की जरूरतों को ध्यान में रखकर कोई व्यावहारिक नीति क्यों नहीं बनाई जा सकती?अधिमान्यता कार्ड बना मंत्रालय में प्रवेश का पास? पत्रकार अधिमान्यता कार्ड को लेकर भी गंभीर बहस की जरूरत है। अधिमान्यता का उद्देश्य पत्रकार की पेशेवर पहचान सुनिश्चित करना और निर्धारित नियमों के तहत सरकारी कार्यक्रमों तथा सूचनाओं तक उसकी पहुंच आसान बनाना है। लेकिन क्या अधिमान्यता कार्ड पत्रकार की आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करता है? क्या इससे उसे पर्याप्त पेशेवर सुविधाएं मिलती हैं? क्या संकट के समय सरकार उसकी सुरक्षा और सहायता के लिए आगे आती है?पत्रकार को पहचान-पत्र थमा देने भर से सरकार की जिम्मेदारी पूरी नहीं हो जाती। अधिमान्यता के साथ पारदर्शी सुविधाएं, समय पर सूचना, शिकायतों के समाधान और पत्रकारों की सुरक्षा के लिए प्रभावी व्यवस्था भी जरूरी है।पत्रकार का सम्मान इस बात से तय नहीं होना चाहिए कि उसके पास किस श्रेणी का कार्ड है या वह किस बड़े मीडिया संस्थान से जुड़ा है। छोटे अखबारों, ग्रामीण संवाददाताओं और स्वतंत्र पत्रकारों की समस्याओं पर भी उतनी ही गंभीरता से विचार होना चाहिए।शिवराज की घोषणाएं कहां गईं, मोहन सरकार जवाब दे मध्यप्रदेश में पत्रकार भवन और पत्रकारों के कल्याण से जुड़ी घोषणाओं को लेकर लंबे समय से उम्मीदें रही हैं। शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल में पत्रकारों के लिए सुविधाओं और भवन निर्माण जैसे विषयों पर जो घोषणाएं हुईं, उनका हिसाब जनता के सामने आना चाहिए।मोहन यादव सरकार को बताना चाहिए कि पिछली सरकार की कौन-कौन सी घोषणाएं पूरी हुईं, किन योजनाओं पर काम हुआ और कौन-सी योजनाएं अब भी अधूरी हैं। यदि पत्रकार भवन के निर्माण या उससे जुड़ी किसी योजना की घोषणा की गई थी, तो उसकी वर्तमान स्थिति, बजट, स्वीकृति और क्रियान्वयन का विवरण सार्वजनिक किया जाना चाहिए।सरकार बदलने का अर्थ यह नहीं कि पिछली सरकार की हर घोषणा कूड़ेदान में डाल दी जाए। यदि घोषणा जनहित में थी और व्यावहारिक है, तो उसे पूरा करना वर्तमान सरकार की जिम्मेदारी है। यदि उसमें कोई समस्या है, तो उसकी समीक्षा करके स्पष्ट निर्णय लिया जाना चाहिए।पत्रकारों को केवल मंचों पर सम्मानित करने, स्मृति-चिह्न देने और बड़े-बड़े भाषण सुनाने से उनकी समस्याएं हल नहीं होंगी। उन्हें ऐसी व्यवस्था चाहिए, जिसमें वे सम्मान के साथ काम कर सकें और आर्थिक दबाव के बावजूद स्वतंत्र पत्रकारिता जारी रख सकें।छोटे अखबारों को विज्ञापन नहीं, तो कैसे बचेगी पत्रकारिता ?मध्यप्रदेश में छोटे और मध्यम समाचार पत्रों की स्थिति भी चिंता का विषय है। अखबार निकालना आसान नहीं है। कागज, छपाई, कर्मचारियों का वेतन, वितरण और दूसरे खर्च लगातार बढ़ते हैं। बड़े मीडिया संस्थानों के पास व्यावसायिक संसाधन होते हैं, लेकिन छोटे प्रकाशक सीमित पूंजी के सहारे अखबार चलाते हैं।ऐसे में सरकारी विज्ञापन की पारदर्शी और नियमित व्यवस्था छोटे समाचार पत्रों के लिए महत्वपूर्ण होती है। यदि किसी अखबार को निर्धारित नीति के अनुसार विज्ञापन नहीं मिल रहा, तो उसे स्पष्ट कारण बताया जाना चाहिए। यदि पात्रता की शर्तें पूरी हैं, तो आवेदन पर निष्पक्ष निर्णय होना चाहिए।पत्रकारों की शिकायत है कि छोटे अखबारों को नियमित विज्ञापन नहीं मिलते और घोषित नीतियों का पालन भी समान रूप से नहीं होता। इन शिकायतों की जांच आवश्यक है। सरकार को विज्ञापन आवंटन, पात्रता, अस्वीकृति और भुगतान की स्थिति का विवरण सार्वजनिक करना चाहिए।सरकारी विज्ञापन किसी अधिकारी की निजी कृपा नहीं है। यह जनता तक सरकारी योजनाओं और जरूरी सूचनाओं को पहुंचाने का माध्यम है। इसे किसी पसंदीदा मीडिया संस्थान को पुरस्कृत करने या सरकार की आलोचना करने वाले अखबार को दंडित करने का औजार नहीं बनने देना चाहिए।जनसंपर्क आयुक्त अधिकारी हैं, प्रदेश के भगवान नहीं ?मध्यप्रदेश के जनसंपर्क विभाग को लेकर पत्रकारों के बीच असंतोष और संवाद की कमी की शिकायतें गंभीरता से सुनी जानी चाहिए। पत्रकारों का आरोप है कि अधिकारियों तक पहुंचना कठिन होता जा रहा है और उनकी समस्याओं पर अपेक्षित सुनवाई नहीं होती।यदि पत्रकार किसी अधिकारी से मिलकर अपनी बात रखने से ही कतराने लगें, तो यह प्रशासनिक व्यवस्था के लिए आत्ममंथन का विषय है। अधिकारी का पद जनता की सेवा और प्रशासनिक जिम्मेदारी के लिए होता है, न कि अपनी ताकत का प्रदर्शन करने के लिए।जनसंपर्क आयुक्त न मुख्यमंत्री हैं, न जनसंपर्क मंत्री और न ही प्रदेश के भगवान। वे एक प्रशासनिक अधिकारी हैं, जिनकी शक्तियां नियमों से निर्धारित होती हैं और जिनसे जवाबदेही की अपेक्षा की जाती है।पत्रकार कोई एहसान मांगने नहीं आता। वह विज्ञापन नीति, अधिमान्यता, पत्रकार कल्याण या किसी प्रशासनिक निर्णय पर सवाल पूछ सकता है। यदि उसकी मांग नियमों के विरुद्ध है, तो उसे कारण सहित जवाब दिया जाना चाहिए। लेकिन यदि शिकायत जायज है, तो उस पर कार्रवाई भी होनी चाहिए।जनसंपर्क विभाग का दायित्व सिर्फ सरकार की उपलब्धियों का प्रचार करना नहीं, बल्कि मीडिया के साथ पारदर्शी और सम्मानजनक संबंध बनाए रखना भी है। सरकार की आलोचना करने वाला पत्रकार भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना सरकार की उपलब्धियों की खबर प्रकाशित करने वाला पत्रकार।अब सरकार जवाब दे! मोदी सरकार को पत्रकारों की रेल रियायत के सवाल पर स्पष्ट रुख बताना चाहिए। मध्यप्रदेश की मोहन यादव सरकार को पत्रकार भवन, पत्रकार कल्याण और छोटे अखबारों की विज्ञापन नीति पर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। जनसंपर्क विभाग को पत्रकारों की शिकायतों और विज्ञापन आवंटन की पारदर्शी व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए।पत्रकारिता सरकार की प्रचार एजेंसी नहीं है। उसका काम सत्ता से सवाल करना है। पत्रकार यदि सुविधाओं के अभाव में कमजोर होगा, तो सबसे ज्यादा नुकसान उस जनता का होगा, जिसकी आवाज वह उठाता है।सरकारों को यह समझना होगा कि लोकतंत्र केवल चुनाव कराने और बहुमत हासिल करने से मजबूत नहीं होता। लोकतंत्र तब मजबूत होता है, जब पत्रकार बिना डर, दबाव और आर्थिक विवशता के सवाल पूछ सके।सवाल सीधा है नेताओं की सुविधाओं के लिए व्यवस्था है, तो पत्रकारों के अधिकारों के लिए ठोस नीति क्यों नहीं? घोषणाओं की भरमार है, तो उनका हिसाब सार्वजनिक क्यों नहीं? और यदि जनसंपर्क विभाग पत्रकारों की समस्याएं नहीं सुनेगा, तो फिर पत्रकार अपनी आवाज लेकर किसके पास जाएगा?पत्रकार सत्ता का दरबारी नहीं, लोकतंत्र का प्रहरी है। उसकी कलम को कमजोर करने वाली हर व्यवस्था पर सवाल उठना चाहिए, क्योंकि जब कलम की आवाज दबती है, तब जनता की आवाज भी कमजोर पड़ती है। यही पत्रकारिता की असली लड़ाई है और यही सरकारों की लोकतांत्रिक परीक्षा भी।(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)




