★मुकेश सेठ★
★मुम्बई★
प्रधानमंत्री आवास में चेन्नई से आये सन्तों के मुख से गूँजे विधिवत मन्त्र,पीएम मोदी को अंगवस्त्रम भी सन्तों ने ओढ़ा दिया आशीर्वाद
14 अगस्त 1947 में वायसरॉय लार्ड माउंटबेटन के द्वारा इसी सेंगोल से पीएम नेहरू को सत्ता हस्तांतरण के बीच मंत्रोच्चार करने वाले अंतिम बचे संत भी मोदी को सेंगोल मिलते वक्त रहे मौजूद
नेहरू के आवास आनंदभवन जो कि अब संग्रहालय है में इस सेंगोल को नेहरू की टहलने वाली छड़ी बताकर रखने की ख़बर गत वर्ष अंग्रेजी अख़बार टाईम्स ऑफ़ इंडिया में छपने के बाद हरक़त में आयी थी केन्द्र सरकार
♂÷भारत की नई संसद का उद्घाटन महामहिम राष्ट्रपति द्वारा न कराए जाने को लेकर काँग्रेस समेत 20 विपक्षी दलों के आगबबूला होने व देश के लिए गौरवशाली ऐतिहासिक उद्घाटन समारोह के बहिष्कार करने का मन बनाये जाने के बीच आज शनिवार को अधिनम सन्तों नें प्रधानमंत्री को सेंगोल सौंपा।
प्रधानमंत्री आवास पर चेन्नई से आये 21 अधिनम सन्तों ने नरेन्द्र मोदी से मुलाकात की,और विधि विधान व वैदिक मंत्रोच्चार के साथ राष्ट्र की संप्रभुता व सत्ता,शासन के प्रतीक चिन्ह सेंगोल कहिए, राजदण्ड कहिए या फ़िर धर्मदण्ड को प्रधानमंत्री को सौंपी।

सन्तों नें प्रधानमंत्री को चेन्नई से लाये गए विशेष अंगवस्त्रम को ओढ़ाकर उनको आशीर्वाद भी दिया,जिस पर प्रधानमंत्री नें सभी आगत सन्तों को प्रणाम कर आभार प्रकट किया।
प्रधानमंत्री द्वारा भी प्रमुख सन्तों को अंगवस्त्रम ओढ़ाकर उनका शुभाशीष ग्रहण किया।
इस मौके पर वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण प्रधानमंत्री के बगल में खड़े होकर आदरपूर्वक ताली बजाती रही।
इस मौके पर उल्लेखनीय रूप से 90 वर्ष से अधिक उम्र वाले वह एकलौते संत भी मौजूद रहे जिन्होंने 14 अगस्त वर्ष 1947 को ब्रिटिश हुकूमत के अंतिम वाइसराय माउंटबेटन के द्वारा दिल्ली में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को जब पॉवर ट्रान्सफर के रूप में इस सेंगोल को सौंपा था, तब मद्रास से आये तमाम सन्तों में उस वक्त के 21,22 वर्ष के रहे यह संत भी मंत्रोच्चार करनें में शामिल रहे थे।

मालूम हो कि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने इस सेंगोल को सदन में स्थापित न कर इलाहाबाद के संग्रहालय आनन्द भवन जो कि उनका पारिवारिक आवास था में भिजवा दिया और यह सेंगोल गुमनामी के अंधेरे में पड़े रहने को बाध्य हो गया।
वेदना पूर्ण स्थित यह रही कि इस गौरवशाली राजदण्ड को आनन्द भवन के संग्रहालय में नेहरू के द्वारा टहलने के दौरान इस्तेमाल करने वाली छड़ी के रूप में प्रदर्शित की जाती रही न कि ब्रिटिश साम्राज्य से देश को मिली आज़ादी के तहत सत्ता हस्तांतरण के प्रतीक सम्प्रभुता प्राप्त होने का अनमोल प्रतीक चिन्ह।

आज़ाद देश के मनमस्तिष्क से भुलवा दिए गए इस सेंगोल के बारे में कहा जाता है कि वर्ष 1978 में भी खबर छपी थी लेकिन कुछ हुआ नही।
पिछले वर्ष प्रतिष्ठित अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया के तमिलनाडु रिपोर्टर नें अमृत महोत्सव के अवसर यानी 15 अगस्त को इस सेंगोल पर स्टोरी प्रकाशित कर इसकी दशा व गुमनामी की रिपोर्ट प्रकाशित तो स्वभाविक है कि हलचल मचनी थी क्योंकि अब केंद्र में गैर कांग्रेसी मोदी सरकार है।
केन्द्र सरकार ने जाँच कराई तो मालूम पड़ा कि प्रयागराज संग्रहालय यानी आनन्द भवन में यह प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू की टहलने वाली सोने की छड़ी के रूप में रखी गयी है न कि सत्ता हस्तांतरित सेंगोल के प्रतीक रूप में।

तब केंद्र सरकार के आदेश पर उत्तरप्रदेश सरकार नें सम्मापूर्वक नवम्बर 2022 को इस ऐतिहासिक व गौरवशाली राजदण्ड को भारत सरकार को भेजा।
इस सेंगोल को दक्षिण के वुडूमकी बंगारू ज्वेलर्स परिवार ने अधिनम मठ के एक पीठाधीश्वर के कहने पर सोने का सेंगोल बनाया था। उन संत से तत्कालीन तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी राजगोपालाचारी का अच्छा सम्बन्ध था।
बताया जाता है कि सी राजगोपालाचारी,पण्डित जवाहरलाल नेहरू के बहुत क़रीबी थे,जब वायसरॉय लार्ड माउंटबेटन नें जवाहरलाल नेहरू से पूछा कि सत्ता हस्तांतरण किस प्रतीक चिन्ह के तौर पर करेंगे तब सी राजगोपालाचारी ने नेहरू जी को भारतीय राजदण्ड के इतिहास के बारे में जानकारी देकर वैसा ही करने की सलाह दी थी।
प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा विशेष विमान से मद्रास से दिल्ली बुलाये गए 21 अभिनम सन्तो नें 14 अगस्त 1947 को 11 बजकर 45 मिनट की अर्धरात्रि में भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के अंतिम प्रतिनिधि के रूप में शासनाधिकारी लार्ड माउंटबेटन नें मंत्रोच्चार के बीच अंग्रेजी सरकार से भारतीय सरकार के प्रतिनिधि के रूप में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को इसी सेंगोल यानी राजदण्ड सौंप कर सत्ता हस्तांतरण किया था।
ज्ञातव्य हो कि भारत के दक्षिण के चोला सम्राटों नें दुनियां के बड़े साम्राज्य पर शासन किया तो उन्होंने भगवान शिव के अनन्य भक्त नन्दी बैल की आकृति उकरी राजदण्ड को ही साम्राज्य चलाने के लिए धर्मदण्ड मानकर शताब्दियों तक राज किया,इसके पूर्व चाणक्य के शिष्य व चक्रवर्ती सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य,सम्राट अशोक,हर्षवर्धन,महाभारत काल मे भी भीष्म पितामह द्वारा पांडवो के युद्ध जितने के पश्चात युधिष्ठिर को राज चलाने के लिए धर्मदण्ड धारण करने को कहा गया था।
सेंगोल को विदेशों में ब्रिटिश साम्राज्य, सहित अन्य राजशाही के द्वारा भी सेंगोल रखने की परंपरा है तो वहीं कई मुग़ल बादशाह भी शासन की निशानी के रूप में राजदण्ड रखते थे।
कल रविवार को विधिविधान से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नए संसद का ऐतिहासिक उद्घाटन, समारोह पूर्वक करने के पश्चात इस पवित्र धर्मदण्ड को लोकसभा अध्यक्ष पीठ के बगल में स्थापित करेंगे।
ब्रिटिश सत्ता द्वारा बनाये गए संसद को अब मोदी सरकार संग्रहालय के रूप में परिवर्तित कर आम जनता के लिए खोलने जा रही है।




