लेखक~डॉ.के. विक्रम राव
♂÷ मिस्र के प्रधानमंत्री मुस्तफा कमाल मैडबोली ने (गत सप्ताह : 25 जून को) राजधानी काहिरा में नरेंद्र मोदी के स्वागत में एक जलसा आयोजित किया था। तब महिला दर्शकों ने कवि आनंद बक्शी की पंक्तियां गाई थीं : “ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे” (फिल्म शोले)। बड़ा अर्थपूर्ण, लाक्षणिक, सामयिक तथा सूचक था। इसका प्रमाण भी गत वर्ष मिला था तब युद्ध के कारण रूस और यूक्रेन से काहिरा में गेहूं आना बंद हो गया था। मिस्र विश्व का सबसे बड़ा गेहूं आयातक है। उस समय भारत ने ही उसको गेहूं भेजा था। हालांकि मोदी सरकार ने भारत में दाम बांधने और महंगाई पर नियंत्रण करने के लिए गेहूं का निर्यात बिल्कुल निषिद्ध कर दिया था। केवल मिस्र को ही छूट दी गई थी। मोदी की यह यात्रा किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री की विगत 25 वर्षों में पहली यात्रा है। जब भारत तथा मिस्र ने निर्गुट राष्ट्रों के गठबंधन को 1961 में बनाया था तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पन्द्रह वर्ष के थे। मैडबोली उसके पाँच वर्ष बाद जन्मे थे। दोनों का ज्ञान किताबी ही है। जवाहरलाल नेहरू और जमाल अब्दुल नासिर उसके शिल्पी थे। मार्शल जोज़ टीटो के साथ। मगर काहिरा में गत सप्ताह मोदी और मैडबोली की भेंट से नए सिरे से इन एशियाई और अफ्रीकी गणराज्यों का नजरिया रेखांकित हुआ है। सामीप्य सर्जा है। मिस्र से नवीनीकृत सौहार्द्र के नतीजे में भारत की अफ्रीकी, अरब और पड़ोसी एशियाई राष्ट्रों से नजदीकी अब ज्यादा बढ़ेगी। व्यापार और पर्यटन में खासकर। विदेश नीति की दृष्टिकोण से भी भारत और मिस्र में स्नेहिल समन्वय फैला है। दोनों ने रूस और यूक्रेन युद्ध पर समान दृष्टिकोण और मंतव्य बनाए रखा। दोनों ने अमेरीकी तथा नाटो देशों के दबाव के बावजूद रूस की भर्त्सना नहीं की। दूरी बनाए रखी। यूक्रेन की कूटनीतिक मदद भी करते रहे।
इसी बीच जी-20 शिखर वार्ता में मिस्र को विशेष आमंत्रित कर भारत ने सामीप्य ही नहीं, मित्रता भी अधिक बढ़ा ली। क्योंकि इस्लामी दुनिया में पाकिस्तान के अनवरत प्रचार तथा अभियान के कारण मुस्लिम जगत को सेक्युलर भारत से दूर रखने की साजिश इस्लामाबाद करता रहा। इस्लामी अरब गुट में मिस्र सिरमौर है। उसका वर्चस्व है। भारत को इसका लाभ मिलता रहा है। इस संदर्भ में नरेंद्र मोदी की काहिरा में हजारों वर्ष पुरानी अल हकीम मस्जिद की यात्रा भी बड़ी महत्वपूर्ण है। खासकर अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा की भारत में मुसलमानों की सुरक्षा पर की गई टिप्पणी तथा “वॉल स्ट्रीट जर्नल” की मुस्लिम महिला संवाददाता द्वारा वाशिंगटन से मोदी से भारत के मुसलमानों पर हो रहे कथित कठोरता पर उस प्रेस कॉन्फ्रेंस में पूछ गए प्रश्न के कारण। इस मस्जिद में जाकर मोदी ने अपने पंथनिरपेक्ष छवि को उजागर किया। मुसलमानों को आश्वस्त तो किया ही, प्रभावित भी। प्रधानमंत्री मोदी काहिरा की हजार वर्ष पुरानी अल-हाकिम मस्जिद में भी खासकर हाजिर रहे। तब उनका एक वैश्विक प्रभाव पड़ा।
अमेरिका से भारत-वापसी की अपनी यात्रा के समय में मोदी मिस्र की राजधानी काहिरा में रुके थे। उनकी राष्ट्रपति अब्दुल फतह अल-सिसी से भेंट हुई जो पिछले गणतंत्र दिवस पर नई दिल्ली में विशेष अतिथि रहे। चंद महीनों बाद वे फिर भारत आने वाले हैं। इस “अल-हाकिम द्वि-अम्र अल्लाह” मस्जिद में उनकी उपस्थिति ने एक दूरगामी संदेश प्रेषित किया। यह मस्जिद भारत में बसे लाखों दाऊदी बोहरा मुसलमानों को है जो अधिकांश दक्षिण गुजरात में रहते हैं। मोदी के गृहराज्य में। यह लोग पैग़ंबरे इस्लाम हज़रत मोहम्मद साहब के वंशज हैं। दाऊदी बोहरा मुख्यत: सूरत, अहमदाबाद, जामनगर, राजकोट, दाहोद और महाराष्ट्र के मुंबई, पुणे, नागपुर, राजस्थान के उदयपुर व भीलवाड़ा और मध्य प्रदेश के उज्जैन, इन्दौर, शाजापुर जैसे शहरों और कोलकाता तथा चेन्नई में बसते हैं। पाकिस्तान के सिंध प्रांत के अलावा ब्रिटेन, अमेरिका, दुबई, ईराक, यमन व सऊदी अरब में भी उनकी अच्छी संख्या हैं। बोहरा समुदाय 11वीं शताब्दी में उत्तरी मिस्र से भारत पहुंचा था। ज्यादातर व्यापार आदि में हैं। मूलत: मिस्र में उत्पन्न और बाद में अपना धार्मिक केंद्र यमन फिर 11वीं शताब्दी में धर्म प्रचारकों के माध्यम से भारत में इन उदार मुसलमानों के सहयोग से मोदी भारत के कट्टर मुसलमानों को समझाना भी चाहते हैं। मानसिक परिवर्तन हेतु। जब समुदाय बहुत बड़ा हो गया, तब 1539 के बाद इस मत का मुख्यालय यमन से भारत में सिद्धपुर आ गया। उत्तर गुजरात के पाटन जनपद का यह सिद्धपुर नगर सरस्वती नदी तट पर है। यहां पांडव अज्ञातवास में रहे थे।
अल-हकीम मस्जिद मिस्र का भारत के लिए भी महत्व है। अतः मोदी का जाना जरूरी था। यह चौथी सबसे बड़ी अकीदतमंदों का पूजास्थल है, मोहम्मद बुरहानुद्दीन द्वारा 1980 में सफेद संगमरमर और सोने की ट्रिम में इस मस्जिद का बड़े पैमाने पर पुनर्निर्माण और नवीनीकरण किया गया था। जीर्णोद्धार में 27 महीने लगे और 24 नवंबर 1980 को मिस्र के राष्ट्रपति अनवर सादात, और अन्य उच्च पदस्थ मिस्र के अधिकारियों द्वारा आयोजित एक समारोह में मस्जिद को आधिकारिक रूप से फिर से खोला गया। प्लास्टर नक्काशियों, लकड़ी के टाई-बीम और कुरान के शिलालेखों सहित मूल सजावट के अवशेष संरक्षित किए गए हैं। चार आर्केड्स से घिरे इस मस्जिद का बड़ा सा आंगन है। दो मीनारें हैं। मस्जिद का इस्तेमाल 14वीं सदी में रोक दिया गया, और इसका अस्तबल के तौर पर इस्तेमाल किया गया। नेपोलियन के आधिपत्य में फ्रांसिसी अभियान के दौर तक इस मस्जिद का जेल के रूप में उपयोग किया जाता था। फ्रांसिसी मस्जिद के मीनार का वॉच टॉवर के रूप में लगाया था। समृद्ध सजावट और कुफिक लिपि को मस्जिद के अंदरूनी हिस्सों पर, मीनारों के शाफ्ट पर और मिहराब (जहां इमाम खड़े होते हैं) के ऊपर, गुंबद की खिड़कियों पर स्टुको फ्रिज़ सजावट पर देखा जा सकता है। मस्जिद अल-हकीम के पुनर्निमाण की कई बार नौबत आई। भूकंप की वजह से 13वीं सदी से पहले मस्जिद ध्वस्त हो गया था। बाद में बायबर्स अल-गशांकिर के दौर में और फिर सुल्तान हसन के दौर में इसका विकास किया गया।
मोदी के प्रति मिस्र के राष्ट्रपति अल सीसी ने अपनी गहरी श्रद्धा तथा स्नेहभाव दर्शाया। भारतीय प्रधानमंत्री को मिस्र का उच्चतम नागरिक सम्मान “आर्डर ऑफ दि नाइल” प्रदान किया। यह भारत रत्न के समान है। यह पुरस्कार अब तक पाने वालों में सोवियत नेता निकिता खुश्चेव, हिंदेशिया के अहमद सुकर्ण, दक्षिण अफ्रीका के नेल्सन मंडेला, महारानी एलिजाबेथ, अमेरिकी राष्ट्रपति जिम्मी कार्टर आदि। इसके अतिरिक्त अन्य इस्लामी राष्ट्रों से मोदी द्वारा प्राप्त पुरस्कारों में से अब्दुल अजीज अल साउद, अफगानिस्तान का गाजी अमीर अमानुल्लाह खान, फिलिस्तीन का ग्रांड कालर ऑफ दि स्टेट, अमीरात का जायद पुरस्कार, मालदीव का निशाने इजुद्दीन आदि रहे।
यहां उल्लेखनीय है कि मिस्र के राष्ट्रपति अब्दुल फतह अल-सीसी भारत के गणतंत्र दिवस 2016 में नई दिल्ली आने के बाद से अब शीघ्र ही चौथी बार भारत आने वाले हैं। मोदी-अब्दुल फतह की मित्रता के माध्यम से मिस्र से मित्रता व्यापक हुई है। वह नेहरू-नासिर जैसी। इन दोनों महाद्वीपों (अफ्रीका व एशिया) के उन दोनों नायकों के माध्यम से शांति प्रयास में मदद भी मिलेगी।

÷लेखक IFWJ के नेशनल प्रेसिडेंट व वरिष्ठ पत्रकार/स्तम्भकार हैं÷




