लेखक-अरविंद जयतिलक
♂÷कांग्रेस की हिंदू विरोधी मानसिकता एक बार फिर उजागर हुई है। वह कर्नाटक की जंग जीतने के लिए इस कदर बेकरार है कि उसने अपने घोषणा पत्र में एलान कर दिया है कि सत्ता में आने पर वह पाॅपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया (पीएफआई) और बजरंग दल को प्रतिबंधित करेगी। मतलब साफ है कि कांग्रेस की सोच और नजर में बजरंग दल और पीएफआई दोनों संगठन एक जैसे हैं। पीएफआई की तरह बजरंग दल भी समाज व देशविरोधी गतिविधियों मे लिप्त है। बेशक कांग्रेस के पास बजरंग दल के खिलाफ कोई पुख्ता सबूत है तो उसे देश के सामने रखना चाहिए। लेकिन अगर कोई सबूत नहीं है और वह चुनाव जीतने के लिए बजरंग दल पर प्रतिबंध की बात कर रही है तो यह कुलमिलाकर उसकी हिंदू विरोधी मानसिकता को ही दर्शाता है। जहां तक बजरंग दल का सवाल है तो यह एक हिंदुत्ववादी-राष्ट्रवादी संगठन है। उसकी कार्य संस्कृति में समाज व राष्ट्रनिर्माण शीर्ष प्राथमिकता में है। वह सनातन मूल्यों की बात करता है और उसकी रक्षा के लिए तत्पर रहता है। देश के हर राज्यों में उसका संगठन है। बजरंग दल का नारा है-सेवा, सुरक्षा व संस्कृति। मतलब साफ है कि उसकी सोच राष्ट्रवादी है और उसका लक्ष्य भारतीय मूल्य, परंपरा और संस्कृति की रक्षा करना है। गौर करें तो 1984 में गठन काल से ही बजरंग दल समाज सेवा से जुड़ा हुआ है। अभी तक उस पर जितने भी आरोप लगे हैं सब निराधार साबित हुए हैं। 1992 में अयोध्या में विवादित ढांचा विध्वंस के बाद उस पर प्रतिबंध भी लगाया गया लेकिन एक वर्ष बाद ही हटा लिया गया। लेकिन आश्चर्य है कि इसके बावजूद भी कांग्रेस बजरंग दल की तुलना पीएफआई से कर रही है। बिडंना यह कि केंद्र में जब भी कांग्रेस और वामपंथी दलों की सरकार बनी है हिंदुत्ववादी संगठनों को बदनाम करने की भरपूर चेष्टा हुई है। सिर्फ बजरंग दल ही नहीं बल्कि विश्व हिंदू परिषद और आरएसएस पर भी गंभीर आरोप लगाए गए। खुद राहुल गांधी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) की तुलना मुस्लिम ब्रदरहुड जैसे आतंकी संगठन से करते सुने गए। उन्होंने 2014 में एक चुनावी जनसभा में गांधी जी की हत्या के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को जिम्मेदार ठहराया था। जब मामला अदालत में पहुंचा तो यू-टर्न ले लिए। तब उच्चतम न्यायालय ने उन्हें आड़े हाथों लेते हुए कहा था कि वह या तो वह माफी मांगे या मानहानि के मुकदमें का सामना करने के लिए तैयार रहें। न्यायालय ने यह भी कहा कि ‘आप किसी संगठन की सामुहिक रुप से निंदा नहीं कर सकते। आप बहुत आगे चले गए।’ न्यायालय की इस टिप्पणी के बाद जब राहुल गांधी को लगा कि वह इस मामले में फंस सकते हंै तो वह अपने बयान से पलट गए। उन्होंने अपने हलफनामें में कहा कि उन्होंने नहीं कहा था कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने एक संस्था के तौर पर महात्मा गांधी की हत्या की। याद होगा 2019 लोकसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस सांसद शशि थरुर ने कहा था कि अगर 2019 के आम चुनाव में भाजपा जीतती है तो भारत हिंदू पाकिस्तान बन जाएगा। हिंदुओं को नीचा दिखाने की यह प्रवृत्ति तब भी देखी गयी जब कांग्रेस नेतृत्ववाली मनमोहन सिंह की सरकार के समय भगवा आतंकवाद की थ्योरी गढ़ी गयी। तत्कालीन सरकार ने एक कथित जांच रिपोर्ट को आधार बनाते हुए कहा था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी आतंकवादी टेªनिंग कैंप चलाते हैं। यही नहीं इस धारणा को सही ठहराने के लिए तत्कालीन सरकार ने मक्का मस्जिद विस्फोट में असली गुनाहगारों को छोड़कर हिंदू संगठनों के सदस्यों को गिरफ्तार कर लिया और कुतर्क गढ़ा कि विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल जैसे दल अपने सदस्यों को हथियार चलाने का प्रशिक्षण देते हैं। दुर्भाग्यपूर्ण यह कि भगवा आतंकवाद को सही ठहराने के लिए उस दौरान जितने भी विस्फोट हुए सभी में हिंदू संगठनों के सदस्यों को ही आरोपी बनाया गया। 2007 के समझौता एक्सप्रेस धमाके में भारतीय सेना के अफसर रहे श्रीकांत पुरोहित को गिरफ्तार किया गया। इसी तरह 2007 के अजमेर दरगाह धमाके में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को घेरने की कोशिश की गयी। 2008 मालेगांव धमाके में एक हिंदू संगठन को कथित रुप से जिम्मेदार ठहराया गया। हद तो तब हो गयी जब तत्कालीन गृहमंत्री पी चिदंबरम यह कहते सुने गए कि भगवा आतंकवाद देश की आंतरिक सुरक्षा के लिहाज से बेहद खतरनाक है। याद होगा 26 नवंबर, 2008 को मुंबई पर हुए हमले पर अजीज बर्नी ने एक पुस्तक लिखी जिसका नाम था-‘26ध्11 आरएसएस की साजिश’।

इस पुस्तक का लोकार्पण कांग्रेस के नेता दिग्विजय सिंह ने 6 दिसंबर, 2010 को दिल्ली में किया। गत वर्ष पहले विकिलीक्स ने खुलासा किया था कि राहुल गांधी ने अमेरिकी राजदूत टिमोथर से कहा था कि इस्लामिक आतंकवाद से ज्यादा खतरा हिंदू कट्टरवाद से है। कांग्रेस की तुष्टीकरण के इस दांव से साफ है कि सत्ता गंवाने के बाद भी उसकी हिंदू विरोधी मानसिकता अभी खत्म नहीं हुई है। पीएफआई की बात करें तो उस पर केरल में हत्या, दंगे, धमकाने और आतंकी संगठनों से जुड़े होने का आरोप लग चुका है। 2012 में केरल के तत्कालीन मुख्ण्मंत्री ओम्मन चांडी के नेतृत्व में खुद कांग्रेस की तत्कालीन सरकार ने उच्च न्यायालय को बताया था कि पीएफआई प्रतिबंधित सिमी का ही स्वरुप है। केरल सरकार ने एक शपथपत्र में उच्च न्यायालय के समक्ष यह भी कहा था कि पीएफआई का असल मकसद समाज का इस्लामीकरण करना है। 2010 में भी पीएफआई के सिमी से कनेक्शन के आरोप लगे थे। 2017 में एक स्टिंग आॅपरेशन में पीएफआई के संस्थापक सदस्यों में से एक अहमद शरीफ ने स्वीकारा था कि उसके संगठन का मकसद भारत को इस्लामिक स्टेट बनाना है। यह भी तथ्य सामने आ चुका है कि भारत को इस्लामिक राज्य बनाने के लिए पीएफआई को इस्लामिक देशों से फंडिंग होती है। वर्ष 2020 में ईडी ने जांच के बाद दावा किया था कि 4 दिसंबर, 2019 से 6 जनवरी, 2020 के बीच पीएफआई से जुडे़ दस एकाउंट्स में 1.04 करोड़ रुपए आए। इसी दौरान पीएफआई ने अपने खातों से 1.34 करोड़ रुपए निकाले थे। गौरतलब है कि 6 जनवरी के बाद ही सीएए के खिलाफ विरोध तेज हुए थे। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने संयुक्त कार्रवाई कर 15 राज्यों में पाॅपुलन फ्रंट आॅफ इंडिया (पीएफआई) के 93 ठिकानों पर छापेमारी कर एक सैकड़ा से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया। यह गिरफ्तारी इस मायने में महत्वपूर्ण रहा कि इस संगठन का संबंध आतंकी संगठनों से जुड़े होने की जांच की जानी थी। एनआईए की मानें तो छापेमारी आतंकवादियों को धन मुहैया कराने, आतंक की टेªनिंग देने और लोगों को बरगलाने के मामले में हुई। याद होगा एनआईए ने सबसे पहले तेलंगाना और आंध्रपदेश के उन 32 जगहों पर छापेमारी की जहां जूडो-कराटे टेªनिंग के जरिए आतंकी टेªनिंग कैंप चलाया जा रहा था। उत्तर प्रदेश की जांच एजेंसियां पहले ही उद्घाटित कर चुकी हैं कि इस संगठन के सदस्यों ने हाथरस में जातीय हिंसा फैलाने की भरपूर कोशिश की। इसके अलावा साल 2020 में नागरिकता कानून के विरोध में हुई हिंसा में भी इस संगठन का नाम सामने आया था। याद होगा वर्ष 2012 में दक्षिण भारत में विशेषकर कर्नाटक में उत्तर भारतीयों के खिलाफ कैंपेन चलाया गया था। तब पीएफआई और हरकत-उल-जिहाद-उल-इस्लामी द्वारा उत्तर भारतीयों को मैसेज भेजकर डराया गया। नतीजा उत्तर भारतीयों को कुछ इलाकों से जाना पड़ा। बंगलुरु से ही महज तीन दिन में 30 हजार से ज्यादा उत्तर भारतीयों को जाना पड़ा। देश के कुछ राज्यों में पीएफआई की जड़े इतनी मजबूत हैं कि अब यह संगठन राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बना चुका है। कांग्रेस की मति ही मारी गई है कि ऐसे संगठन की तुलना बजरंग दल से कर रही है। सवाल लाजिमी है कि क्या बजरंग दल भी ऐसा करता है? अगर नहीं तो फिर उस पर प्रतिबंध की बात क्यों? क्यों न माना जाए कि कांग्रेस बजरंग दल पर प्रतिबंध की बात करके कर्नाटक चुनाव में तुष्टिकरण का दांव चल रही है। गौर करें तो यह पहली बार नहीं है जब कांग्रेस चुनाव जीतने के लिए तुष्टीकरण के घातक हथियार को आजमा रही है।

÷लेखक राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं÷




