लेखक-अरविंद जयतिलक
भारत राष्ट्र निर्माण में राजनीतिक यात्राओं की प्रभावी भूमिका रही है। राजनीतिक यात्राओं के जरिए ही जनमत निर्माण के भावात्मक पक्ष से राष्ट्र के संस्कार को अभिसिंचित किया गया। बात चाहे आजादी से पूर्व राजनीतिक यात्राओं के जरिए आजादी की लड़ाई को धार देने की रही हो अथवा संकल्पों और उद्देश्यों को आयाम देकर आजादी के लक्ष्य को हासिल करने की, राजनीतिक यात्राएं सदैव ही जनमत की कसौटी पर कसी जाती रही हैं। एक खुली सच्चाई यह भी है कि राजनीतिक यात्राएं न सिर्फ जनमत निमार्ण का मंत्र सिद्धि बनी बल्कि सत्ता संधान का सोपान भी बनी। देश एक बार फिर ऐसी ही दो राजनीतिक यात्राओं के समक्ष गवाह बनकर खड़ा है। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस पार्टी के शीर्ष नेता राहुल गांधी 14 जनवरी से 20 मार्च तक ‘मणिपुर टू मुंबई’ भारत जोड़ो न्याय यात्रा पर हैं। वहीं भारतीय जनता पार्टी अपनी संकल्प यात्राओं के जरिए देश को मथ रही है। सैद्धांतिक तौर पर राहुल गांधी की भारत जोडो न्याय यात्रा का उद्देश्य पार्टी कार्यकर्ताओं, देश के युवाओं, महिलाओं और हाशिए के लोगों से संवाद स्थापित करना है। उनके विचारों को जानना-सुनना, समझना और परखना है। किंतु व्यवहारिक दृष्टि से देखें तो इस भारत जोड़ो न्याय यात्रा का मकसद देश के 15 राज्यों के 110 जिलों को कवर कर अपने राजनीतिक हितों की पूर्ति करना है। ये वहीं राज्य और इलाके हैं जहां 2014 और 2019 के आमचुनाव में कांग्रेस पार्टी को करारी शिकस्त मिली थी। चुंकि 2024 के आमचुनाव में अब कुछ महीने ही शेष रह गए हैं ऐसे में राहुल गांधी और उनकी पार्टी भारत जोड़ो न्याय यात्रा के जरिए जनता के बीच अपनी स्वीकार्यता-ग्राह्यता को धार देकर अपनी खोई हुई सियासी जमीन को उर्वर बनाना चाहती है। जबकि एक राजनीतिक दल की यात्रा का मकसद देश में जनजागृति के जरिए देश की एकता-अखंडता को मजबूत बनाना शीर्ष प्राथमिकता में होनी चाहिए। राजनीतिक यात्राओं का तब तक कोई मूल्य-महत्व नहीं जब तक कि उसका विजन राष्ट्रनिर्माण के अनुकूल न हो। वह यात्रा तब तक प्रासंगिक नहीं जब तक कि उसमें सर्जनात्मकता और समर्पणता का भाव निहित न हो। राजनीतिक यात्राओं की प्रासंगिकता तभी स्वीकार्य-ग्राह्य होती है जब उसमें जनसरोकारी भाव के बीज निहित होते है।ं अन्यथा ऐसी राजनीतिक यात्राएं संकीर्णताओं के खोल में सिमटकर रह जाती है। राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा के भाव भी कुछ इसी तरह के उद्देश्यों से प्रेरित जान पड़ते हैं। उनकी पिछली भारत जोड़ो यात्रा के दौरान ऐसे ही दृश्य-परिदृश्य देखने को मिले जिससे साफ ध्वनित हुआ था कि वे और उनकी पार्टी सरकार के खिलाफ नकारात्मक वातावरण निर्मित कर जनमानस को दिग्भ्रमित करना चाहते हैं। यही नहीं जिस तरह उनकी पार्टी और सहयोगी-समर्थक दलों ने संसद के शीतकालीन सत्र को बाधित कर संसदीय कामकाज में बाधा पहुंचाने की कोशिश की उससे साफ है कि भारत जोड़ा न्याय यात्रा का उद्देश्य भी सरकार के खिलाफ अनावश्यक वितंडा खड़ा कर देश को भ्रमित करना है। बेशक एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में विपक्ष को अधिकार है कि वह धरना, प्रदर्शन, सत्याग्रह और राजनीतिक यात्राओं के जरिए सरकार की कमियों को उजागर करे और जनता को सचेत करे। जनकल्याण से जुड़े मुद्दों को संसद में उठाकर सरकार का ध्यान आकर्षित करे। लेकिन इसका तात्पर्य यह भी नहीं कि अनावश्यक और झूठे आरोपों-प्रलापों के जरिए संसदीय गरिमा और लोकतंत्र के भाव को धूल-धुसरित कर अपने राजनीतिक स्वार्थ की पूर्ति करे। भारत जोड़ो यात्रा के दौरान भी राहुल गांधी सरकार पर झूठे आरोप लगाकर लोकतंत्र विरोधी भावनाओं को प्रचारित-प्रसारित करते देखे गए थे। वे उन मुद्दों को उठाते नजर आए जिनका जनसरोकार से कुछ भी वास्ता नहीं था। यह प्रवृत्ति ठीक नहीं है। यह देश के साथ छल है। इस बात की प्रबल आशंका है कि राहुल गांधी भारत जोड़ो न्याय यात्रा के दौरान भी कुछ इसी तरह का प्रलाप करते नजर आएंगे। चूंकि उनकी यात्रा 14 जनवरी से मणिपुर के इंफाल से शुरु हो रही है उससे साफ है कि उनका मकसद गत वर्ष मणिपुर में हुई हिंसा की आग को हवा देकर सियासी माइलेज बढ़ाना है। सवाल लाजिमी है कि एक राजनीतिक दल जिसका उत्तरदायित्व समाज में समरसता घोलना होना चाहिए भला वह अपनी राजनीतिक यात्राओं के जरिए नफरत की चिंगारी को हवा देकर क्या सिद्ध करना चाहता है? भला देश की जनता ऐसी भारत जोड़ो न्याय यात्रा को राष्ट्रहित के अनुकूल कैसे मान सकती है? कोई भी न्याय उचित-अनुचित के नीर-क्षीर विवेक से परिलक्षित होती है। विशेष रुप से तब और जब वह राष्ट्र के जीवन से जड़ा हो। एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में राष्ट्र को गढ़ने-बुनने की जिम्मेदारी सत्ता और विपक्ष दोनों की होती है। समझना होगा कि राजनीतिक यात्राएं और जनसंवाद लोकतंत्र के बुनियादी आधार बिंदू हैं। चूंकि कांग्रेस पार्टी मुख्य विपक्षी दल है और सात दशक तक सत्ता का भोग लगा चुकी है, ऐसे में उसका उत्तरदायित्व और भी अधिक व्यापक होना चाहिए। कांग्रेस पार्टी को स्पष्ट करना चाहिए कि वह अपने दीर्घ शासन काल में न्याय को फलीभूत क्यों नहीं किया? देश को धर्म-जाति और संप्रदायों में क्यों बांटा? गरीबी, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, परिवारवाद, क्षेत्रवाद और भाषावाद के मसले पर सियासत क्यों की? न्याय क्यों नहीं किया? ढ़ेरों ऐसे सवाल है जिसका उत्तर कांग्रेस पार्टी और उसके शीर्ष नियंताओं को देना चाहिए। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण है कि राहुल गांधी और उनकी पार्टी इन सवालों से बच निकलना चाहती है। सवाल लाजिमी है कि फिर वे किस मुंह से भारत जोड़ो न्याय यात्रा के जरिए देश को जोड़ने की बात कर रहे हैं? आखिर देश का जनमानस उन पर अथवा उनकी पार्टी पर भरोसा क्यों करे? दूसरी यात्रा भारतीय जनता पार्टी की संकल्प यात्रा है जिसके जरिए उसके कार्यकर्ता केंद्र्र सरकार की योजनाओं के बारे में लोगों को जागरुक कर रहे हैं। इसे सुविधा प्रदान और प्रशिक्षित करने की मुहिम के तौर पर चला रहे हैं। भाजपा के शीर्ष नेता और कार्यकर्ता लाभार्थियों की सुविधा के लिए केंद्र सरकार की विभिन्न योजनाओं मसलन पीएम बीमा योजना, अटल पेंशन योजना, पीएम उज्जवला योजना, जनधन योजना, पीएम गरीब कल्याण योजना, आयुष्मान योजना, पीएम आवास योजना, मुद्रा योजना, प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना, स्टैंडअप इंडिया योजना, पीएम विश्वकर्मा योजना एवं स्वच्छ भारत मिशन इत्यादि से संबंधित जानकारी देने के लिए शिविर आयोजित कर रहे हैं। उनका मकसद संकल्प यात्रा के जरिए जनकल्याणकारी योजनाओं को हासिल करने के लिए लाभार्थियों को प्रेरित और प्रशिक्षित करना है। यह एक सराहनीय पहल है। ऐसा इसलिए कि भारत गांवों का देश है। देश के अधिकांश लोग किसान और मजदूर हैं। कम पढ़े-लिखे हैं। उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए दूसरे पर निर्भर रहना पड़ता है। लेकिन अगर उन्हें जागरुक और प्रशिक्षित किया जाए तो उनमें आत्मविश्वास पैदा होगा और वे अपने अधिकारों के प्रति जागरुक होंगे। सरकारी योजनाओं का आसानी से लाभ उठाएंगे। उदाहरण के लिए सरकार की मिशन इंद्रधनुष योजना को समझने के लिए ग्रामीण महिलाओं को जागरुक किया जाना बेहद आवश्यक है। यह योजना उनके स्वास्थ्य और सुरक्षा से जुड़ी है। अगर भारतीय जनता पार्टी संकल्प यात्रा के जरिए देश की करोड़़ों महिलाओं को प्रशिक्षित कर उन्हें सशक्त कर रही है तो यह प्रशंसनीय पहल है। इससे महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा मिलेगा और वे आत्मनिर्भर बनेंगी। फिलहाल इन दोनों यात्राओं पर देश की गहरी और कड़ी नजर है। देश इन दोनों यात्राओं को राष्ट्र निर्माण की कसौटी पर परखेगा और मूल्यांकन करेगा। फिलहाल जो नजर आ रहा है उससे साफ है कि कांग्रेस पार्टी और उसके शीर्ष नेता राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा का मकसद जनता को जागरुक और लोकतंत्र को मजबूत करना नहीं बल्कि सरकार के खिलाफ माहौल निर्मित कर सत्ता तक पहुंचना है। जबकि भारतीय जनता पार्टी अपनी संकल्प यात्रा के जरिए जनता को जनकल्याणकारी योजनाओं से कनेक्ट करती साफ दिख रही है।

(लेखक राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं)




