लेखक- अमित सिंघल
चीन की एक कंपनी ने ChatGPT या Gemini जैसी कृत्रिम बुद्धिमत्ता से लैस DeepSeek बना दिया है है जो एक मानव की तरह संवाद एवं लेख, सोशल मीडिया पोस्ट, निबंध, कोड और ईमेल सहित विभिन्न लिखित सामग्री की रचना कर सकता है।
जहाँ ChatGPT या Gemini के निर्माण के लिए कई हज़ार करोड़ रुपये का निवेश करना पड़ा था, वही DeepSeek पर केवल 6 मिलियन डॉलर या 50 करोड़ रूपये व्यय करना पड़ा। DeepSeek के समाचार के कारण अमेरिकी टेक कंपनियों की वैल्यू 86 लाख करोड़ रुपये (भारत की जीडीपी का एक-चौथाई) एक दिन में गिर गयी।
मैं इस विषय को एक अलग दृष्टिकोण से देखता हूँ।
जून 2023 में भारत यात्रा के दौरान ChatGPT के संस्थापक सैम ऑल्टमैन से पूछा गया था कि क्या भारत कुछ 10 मिलियन डॉलर या 85 करोड़ रूपये निवेश करके अपने कुछ टॉप इंजीनियर को लगाकर ChatGPT जैसी कृत्रिम बुद्धि का निर्माण कर सकता है। तब ऑल्टमैन ने उत्तर दिया था कि हमारे साथ प्रतिस्पर्धा करना पूरी तरह से निराशाजनक (hopeless) है। अर्थात, भारत ऐसी कृत्रिम बुद्धि नहीं बना सकता है।
लेकिन चीन ने DeepSeek के द्वारा कर दिखाया है। मुझे संदेह नहीं है कि भारत भी कृत्रिम बुद्धि का ऐसा मॉडल सस्ते में इस वर्ष बना लेगा।
जब भारत ने मंगलयान भेजा था, तब मुकेश अंबानी ने सितम्बर 2014 में बताया था कि भारत के मंगल मिशन की लागत केवल 7 रुपये प्रति किलोमीटर है, जो दिल्ली में एक तिपहिया ऑटो रिक्शा किराए पर लेने से भी सस्ता है। जबकि प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत का मंगल मिशन हॉलीवुड फिल्म, ग्रेविटी, बनाने से भी काम लागत में बना है।
लेकिन DeepSeek या मंगल मिशन महत्वपूर्ण नहीं है। कभी ना कभी तो अन्य कुछ चुने हुए देशो को यह उपलब्धि प्राप्त करनी ही थी। प्रधानमंत्री मोदी ने बस इन उपलब्धियों के लिए प्रोत्साहन दिया, राष्ट्र की महत्वाकांक्षा को पंख लगाया।
महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि ChatGPT जैसा कुछ ओरिजिनल भारत या चीन में क्यों नहीं बना? यही स्थिति इंटरनेट, गूगल, फेसबुक, स्मार्ट फोन, ट्विटर या X, अमेज़न, Airbnb, इंटेल एवं Nvidia चिप, पर्सनल कंप्यूटर या लैपटॉप, उबेर, परमाणु बम इत्यादि की है। पहले अमेरिका में बना, बाद में कोरिया, चीन या कुछ छोटे स्तर पर भारत में निर्माण हुआ। यही स्थिति नयी दवाओं, मेडिकल तकनीकी, सेल्फ-ड्राइविंग कार की है।
आखिरकार इन सभी कंपनियों का उदय पिछले 20 वर्षो में ही हुआ है। ज़ुकरबर्ग ने फेसबुक की नींव हॉस्टल में डाली थी, एप्पल कंप्यूटर एवं अमेज़न गैराज में शुरू हुए थे। आखिरकार ऐसी क्या कमी रह जाती है हम में? या फिर चीन में।
हम कुछ वर्ष बाद सस्ती कॉपी तो बना लेते है, लेकिन कुछ अग्रणी, क्रांतिकारी रिसर्च एवं उत्पाद की परिकल्पना नहीं कर पाते है, ऐसे अत्याधुनिक उत्पाद को सर्वप्रथम मार्केट में नहीं उतार पाते है।
कारण यह है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था किसी भी थ्योरी, विचार, तथा घटनाओं पर गहन रूप से सोचना नहीं सिखाती। किसी भी विषय के बारे में उत्सुकता होने के बाद भी हम केवल मतलब की पढ़ाई और रटाई करते है। बिना अर्थ समझे सिर्फ परिभाषाएं रटी जाती थी और कुछ रटे हुए तर्क-वितर्क के माध्यम से उत्तर पुस्तिका भर दी जाती थी।
पढ़ाई का एक ही लक्ष्य होता है – किसी भी तरह UPSC निकाल लेना; UPSC न मिले, तो कोई अन्य सरकारी नौकरी में लग जाना।
युवा वर्ष के शुरुआती वर्षों में रिस्क लेने की क्षमता होती है, कुछ नया कर दिखाने का उत्साह होता है। लेकिन सरकारी नौकरी का लक्ष्य ऐसे सभी अरमानों का गला घोट देती है चाहे उसको ज्वाइन करने में आप सफल हो जाएं या असफल। फिर वह युवा एक बनी-बनाई कंपनी तो चला सकता है; लेकिन एकदम नए उत्पाद के लिए एक नयी कंपनी नहीं खड़ी कर सकता। क्योकि उस उत्पाद की परिकल्पना करना उसकी क्षमता के बाहर है।
अगर किसी ने रिस्क लेकर उद्यम लगाना चाहा, तो नियम-कानूनों एवं पूँजी के चक्कर में उसे हताश कर दिया जाता था। आखिरकार कांग्रेसियो ने एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण किया था जिसमें निर्धनता उन्मूलन और सेकुलरिज्म के नाम पर अपने आप को, अपने नाते रिश्तेदारों, कुछ उद्यमियों और मित्रों को समृद्ध बना सकें। अपनी समृद्धि को इन्होंने विकास और सम्पन्नता फैलाकर नहीं किया, बल्कि जनता के पैसे को धोखे से और भ्रष्टाचार से अपनी ओर लूट कर किया।
तभी स्वतंत्रता के इतने वर्षों बाद भी समस्याएं सुरसा के मुंह की तरह सामने खड़ी रहती थी; समाधान खोजने का कोई सत्यनिष्ठ प्रयास नहीं किया जाता था क्योंकि उसके लिए आपको रटे-रटाए से अलग हटकर सोचना होगा।

(लेखक रिटायर्ड IRS अफ़सर हैं)




