लेखक- राजेश बैरागी
बहुचर्चित हिंदी फिल्म मुगल-ए-आजम में पुत्र से युद्ध के लिए जा रहे बादशाह अकबर को परंपरा के अनुसार तलवार सौंपते हुए जोधाबाई के हाथ से तलवार गिर जाती है। इस पर अकबर कहता है,-जिन हाथों से चूड़ियां नहीं संभाली जातीं वो तलवार क्या संभालेंगे।’ दरअसल पुत्र से युद्ध के लिए अपने पति को तलवार सौंपते हुए किसी भी मां के हाथ से तलवार गिर सकती है, जोधाबाई अपवाद नहीं है। परंतु एक सदी तक न्याय के लिए सीधे हाथ में तलवार रखने वाली न्याय की देवी से तलवार क्यों छीन ली गई है? उसकी आंखों पर बंधी काली पट्टी तो हमेशा से आलोचना के दायरे में थी, आंखों से बड़ी कोई तराजू नहीं होती है। आंखें ही किसी तराजू के पलड़ों के संतुलन को देख कर सही गलत का निर्णय कर सकती हैं, तराजू केवल एक उपकरण मात्र है पहले की न्याय की देवी की मूर्ति में कई विसंगतियां थीं।
उनकी आंखों पर पट्टी नहीं बंधी होनी चाहिए थी, तराजू बांएं के स्थान पर दांएं हाथ में होनी चाहिए थी। तलवार से न्याय का युग अब नहीं है परंतु बिना दंड न्याय की पूर्ति कैसे संभव है।संसद के नये भवन में सेंगोल दंड की स्थापना का क्या उद्देश्य है?
शासन का एक महत्वपूर्ण साधन दंड भी है तो कानून के शासन में दंड की अनुपस्थिति कैसे हो सकती है। अब न्याय की देवी के हाथ में एक पुस्तक दी गई है जिसे संविधान कहा जा रहा है। संविधान से संचालित देश में में सतहत्तर वर्ष बाद भी संविधान में वर्णित नागरिकों की अपेक्षाओं की खोज जारी है।हाथ में संविधान की प्रति लिए हर चौराहे पर खड़े बाबासाहेब आंबेडकर आज भी संविधान को पूरी तरह लागू करने की गुहार लगाते दिखाई देते हैं। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की इच्छा पर न्याय की देवी की मूर्ति में किए गए बदलाव इतिहास में किए गए बदलाव के जैसे हैं। इतिहास से सबक लेकर बेहतर भविष्य का निर्माण किया जा सकता है,हर युग में ऐसा होता रहा है। क्या मूर्ति में बदलाव से न्यायिक व्यवस्था में बदलाव संभव है? सुप्रीम कोर्ट ने वादों के निस्तारण के लिए समय-सीमा तय करने के लिए दायर एक याचिका को यह कहकर खारिज कर दिया है कि यह अमेरिका का सुप्रीम कोर्ट नहीं है।
क्या मुकदमों का एक निश्चित समय में निस्तारण नहीं होना चाहिए?
इस प्रश्न पर विचार करने और व्यवस्था में बदलाव करने से आंखें फेरते हुए एक बार फिर सत्ता और न्याय व्यवस्था ने प्रतीकों में बदलाव की नाटकीय परंपरा को ही आगे बढ़ाया है। हालांकि आसानी से मुकदमे निस्तारित न कर न्याय व्यवस्था उन नये मुकदमेबाजों को तो निरुत्साहित करती ही है जो गलत उद्देश्य से न्यायालय आते हैं, उन्हें भी बेहद निराश करती है जिन्हें न्याय की वास्तविक आवश्यकता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और यह उनके निजी विचार हैं)




