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जो मोदी को समझ नहीं सकते, उनके लिए मोदी एक खुली किताब हो गया
♂÷पूर्व क़ानून मन्त्री किरेन रिजिजू पर परेशान होने की
जरूरत नहीं है – उनका मिशन पूरा हो गया “Big Salute to Rijiju”।
यही सत्य है कि सुबह जब से किरेन रिजिजू को कानून मंत्री के पद से हटाने का समाचार आया तभी से अनेक लोगों ने अपने अपने ज्ञान के भंडार खोल दिए। जिस मोदी की सोच हमारे 1000 कदम दूर से शुरू होती है, उसे कुछ मित्रों ने और यूट्यूब पर बैठे विद्वानों ने तुरंत एक पल में समझ लिया और मोदी की One 2 Three कर दी।
कुछ कहने से पहले मैं सभी ज्ञानी मित्रों से एक बात कहना चाहता हूं कि जरा एक बार ध्यान से सोचिये कि यदि आपका कोई पड़ोसी, कोई एक मित्र या कोई एक ऑफिस में साथ काम करने वाला आपके खिलाफ कुछ छोटा सा भी काम कर दे तो क्या आप परेशान नहीं हो जाते, क्या उसे जवाब देने या बदला लेने का प्लान बनाने में समय बर्बाद नहीं करते – जरूर करते हो ।
फिर सोचिये कि पीएम नरेंद्र मोदी देश,विदेश के कितने शत्रुओं से लड़ रहै है लेकिन फिर भी देश को results दे रहे हैं क्या उनके काम को किसी एक छोटी मोटी बात पर मिट्टी में मिला देना चाहिए।
हमारे लिए किसी बात को लेकर निंदा करना बहुत सरल होता है। आज एक परम मित्र ने कई बातों का जिक्र करते हुए नूपुर शर्मा का भी जिक्र किया कि कैसे भाजपा ने उसे बेसहारा छोड़ दिया पार्टी से निकाल कर परंतु किसी को अहसास है कि खाड़ी देश कतर से नूपुर का सबसे पहले विरोध हुआ और उस मुल्क की 30 लाख आबादी में 22% लोग यानी 6.6 लाख भारतीय रहते हैं क्या मोदी नूपुर शर्मा मुद्दे पर घरेलू राजनीतिक फ़ायदा उठाने के लिए उन 6 लाख 60 हज़ार भारतीयों जिनमें बड़ी सँख्या में मुस्लिम ही थे फीर भी अपने नागरिकों का जीवन खतरे में डाल देते उचित होता।
यह मेरा मानना है कि किरेन रिजिजू ने अपने करीब 2 वर्ष के कार्यकाल में न्यायपालिका को उनकी संवैधानिक दायित्व व कार्य करने के तरीकों को लेकर आईना दिखाने का काम किया है – और यह वह अपने आप से नहीं कर रहे थे, वो इसी मिशन पर थे कि न्यायपालिका की आंखों में आंखें डाल कर बात करें।
जिस परिवारवाद के खिलाफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अभियान छेड़े हुए हैं वह सही मायने में केवल राजनीतिक दलों तक ही सीमित नहीं है बल्कि न्यायपालिका को भी उस “असाध्य रोग” से मुक्त कराने का अभियान है क्योंकि न्यायपालिका को कॉलेजियम ने इसी परिवारवाद में जकड़ा हुआ है, और यह आइना किरेन रिजिजू ने कदम कदम पर न्यायपालिका को दिखाया – Shame on Judiciary जो जरूरत से ज्यादा हथियाई हुई शक्ति के भार से एक दिन स्वयं दब जाएगी।
रिजिजू जैसा एक non practicing law graduate ही न्यायपालिका को उनकी वास्तविक जगह दिखा सकता था, क्योंकि उन्हें सुप्रीम कोर्ट में जाकर जजों के सामने मुकदमें नहीं लड़ने होते जैसे कपिल सिब्बल, प्रशांत भूषण, सिंघवी और अन्य कथित कोर्ट फ़िक्सर वकील लड़ते हैं और जजों के आगे अपने हक़ में फैसले लेने के लिए हर उपाय अमल में लाते हैं ।
किरेन रिजिजू की जगह अब अर्जुनराम मेघवाल को कानून मंत्री बनाया गया है और वह भी लॉ ग्रेजुएट हैं परंतु कभी कोर्ट में प्रैक्टिस नहीं की – और वे भी कानून मंत्री का काम सही तरह से कर सकेंगे क्योंकि आधार तो पूर्व क़ानून मन्त्री किरेन रिजिजू ने बना ही दिया है।
यह सत्य है कि न्यायपालिका और सरकार के बीच टकराव हर समय नहीं चल सकता इससे दोनों संवैधानिक संस्थाओ की गरिमा जनमन में छीजती है।
जो न्यायपालिका आज संसद से भी ख़ुद को ऊपर रखी हुई है,तमाम निर्णयों में परिपाटी को भी अक्सर दरकिनार कर देती हो,सेम सेक्स मैरिज के केस में सरकार देश और धर्मगुरुओं के तीखे विरोध पर सुप्रीम कोर्ट को यू टर्न लेकर ख़ुद अपनी प्रतिष्ठा दाव पर लगा देती है, उस पर अंकुश लगाने का काम करेगा रिजिजू को हटाना। लेकिन इसे यह समझना सर्वथा अनुचित होगा कि प्रधानमंत्री मोदी ने रिजिजू की बलि चढ़ा दी या उनकी नज़र में रिजिजू का महत्त्व किसी प्रकार से कम हुआ है रिजिजू,वह इसी से समझा जा सकता है कि क़ानून मन्त्री के पद से हटाने के तुरंत बाद ही उन्हें दूसरे विभाग का मन्त्री बना दिया गया है।
रिजिजू पीएम मोदी के एक मजबूत स्तम्भ हैं जिन्होंने अपना काम कर दिया जिसके लिए वे बधाई के पात्र हैं।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट के कतिपय जजों की रह रह कर किरेन रिजिजू की एक एक बात नींद में खलल डालती रहेगी कि एक अनाड़ी के कानून मंत्री ने हमारी बखिया उधेड़ दी जिसे वे रफू भी नहीं करा सकते –

(लेखक सुभाष चन्द्र विधि मामलों के ज्ञाता हैं और यह उनके निजी विचार हैं)




