लेखक-अरविंद जयतिलक
अमेरिकी टैरिफ से उपजे आर्थिक अस्थिरता के बीच मलेशिया की राजधानी कुआलालंपुर में संपन्न आसियान शिखर सम्मेलन ढेर सारे निहितार्थों को समेटे हुए है। बदलते वैश्विक परिदृश्य के नजरिए से देखें तो आसियान सम्मेलन के जरिए भारत ने एक बार फिर अपनी प्रभावी भूमिका को निरुपित किया है। 22 वें आसियान शिखर सम्मेलन को वर्चुअल तरीके से संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट कहा कि 21 वीं सदी भारत और आसियान की सदी है और साल 2026 आसियान-इंडिया ईयर ऑफ मेरीटाइम कोऑपरेशन के रुप में मनाया जाएगा। प्रधानमंत्री का संबोधन रेखांकित करने के लिए पर्याप्त है भारत वैश्विक संगठन आसियान की सार्थकता और उपादेयता को लेकर बेहद गंभीर और सक्रिय है। प्रधानमंत्री मोदी ने आसियान संगठन में भारत की भूमिका को स्पष्ट करते हुए कहा कि भारत और आसियान मिलकर विश्व की लगभग एक-चौथाई जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करते हैं जो न सिर्फ भूगोल साझा करते हैं बल्कि गहरे ऐतिहासिक संबंधों और साझे मूल्यों की डोर से भी जुड़े हुए हैं। दोनों ग्लोबल साउथ के सहयात्री हैं। गौर करें तो आसियान भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी का मुख्य आधार है जो शुरु से ही आसियान के केंद्रीय और वैश्विक उद्देश्यों का समर्थन करता है और दक्षिण-पूर्वी एशिया क्षेत्र की उन्नति का पक्षधर है। यहां ध्यान देने वाली बात है कि आसियान के ग्यारह देशों (इंडोनेशिया, सिंगापुर, वियतनाम, मलेशिया, थाईलैंड, म्यांमार, बु्रनेई, फिलीपींस, लाओस, कंबोडिया और तिमोर लेस्ट) के बीच समन्वय और साझेदारी विकसित करने के लिए भारत की भूमिका सराहनीय रही है। याद होगा कि वर्ष 2018 में भारत के आमंत्रण पर 69 वें गणतंत्र दिवस समारोह में तब दस आसियान देशों के राष्ट्र प्रमुखों ने शिरकत की थी और सभी ने राजनीतिक, आर्थिक, रणनीतिक संबंधों को मजबूत करने के साथ क्षेत्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर एकदूसरे की मदद का संकल्प लिया था। तब हिंद-प्रशांत महासागर क्षेत्र में नियम आधारित नौवहन व्यवस्था को गति देने के साथ कट्टरवाद, उग्रवाद, मानव तस्करी जैसे चुनौतियों से मिलकर मुकाबला करने पर सहमति बनी थी। गौर करें तो आसियान के गठन का उद्देश्य ही दक्षिण-पूर्व एशिया में आर्थिक प्रगति को गति देना और उसके आर्थिक स्थायित्व को बनाए रखते हुए आपसी विवादों को शांतिपूर्ण ढंग से निपटाना है। भारत और आसियान देशों की कुल आबादी 2.13 बिलियन है। आसियान दुनिया का चौथा सबसे बड़ा व्यापारिक परिक्षेत्र भी है। इसका संयुक्त सकल घरेलू उत्पाद 4.13 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर है। इसके बढ़ते आर्थिक प्रभाव का नतीजा है कि न केवल भारत, रुस, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, अमेरिका, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड जैसे देशों के साथ उसके संबंध प्रगाढ़ हैं बल्कि विश्व के अनेक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय और गैर-सरकारी संगठनों का भी उससे मजबूत संबंध हैं। वैश्विक आर्थिक रंगमंच पर आसियान की भूमिका कितनी प्रभावी है इसी से समझा जा सकता है कि विश्व के लगभग चार दर्जन गैर आसियान देशों और संगठनों ने जकार्ता स्थित आसियान के सचिवालय में अपने राजदूतों की नियुक्ति की है। आसियान का महत्व इसलिए भी बढ़ गया है कि उसकी तुलना में आज उत्तरी अमेरिका और यूरोप की अर्थव्यवस्था धीमी गति से आगे बढ़ रही है वहीं पूर्वी यूरोप एवं रुस का आर्थिक ढांचा चरमराया हुआ है। दूसरी ओर अफ्रीका महाद्वीप में आर्थिक अस्थिरता का माहौल है। ऐसे में अगर कहा जाए कि आज आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्र अमेरिका, यूरोप और पश्चिम एशिया के बजाए दक्षिण पूर्व एशिया बन गया है तो गलत नहीं होगा। माना जा रहा है कि है कि आने वाले वर्षों में पूंजी निवेश की उपलब्धता के कारण यह क्षेत्र अति आधुनिकतम तकनीक एवं विज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी होगा। जहां तक भारत का सवाल है वह दक्षिण पूर्व एशिया की ओर व्यापार, पूंजीनिवेश तकनीक, बाजार की उपलब्धता, एवं आदान-प्रदान के रुप में देखता है जो आज की जरुरत है। वहीं बदलती हुई नयी विश्व व्यवस्था में दक्षिण पूर्व एशिया के देश भी भारत की ओर आर्थिक आदान-प्रदान की दृष्टि से देख रहे हैं। इसलिए और भी कि आज भारत आसियान के लिए छठा सबसे बड़ा करोबारी साझीदार बन चुका है। भारत और आसियान का द्विपक्षीय व्यापार तकरीबन 123 बिलियन डॉलर का है। दोनों के बीच 2010 में फ्री ट्रेड एग्रीमेंट यानि एफटीए हुआ था। फिलहाल भारत इस एफटीए की समीक्षा करना चाहता है। इसलिए कि आसियान देशों के 40-60 फीसदी के बनिस्बत भारत के तरफ से 71 फीसदी उत्पादों पर टैक्स छूट दिए जाने से असंतुलन की स्थिति उत्पन हो गई है। बदलती आर्थिक स्थितियों को ध्यान में रखते हुए मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम ने उचित कहा कि विश्व में व्याप्त संरक्षणवाद और आर्थिक अनिश्चितता का सामना करने के लिए अनुकूलनशीलता और सहयोग की जरुरत है। गौर करें तो तमाम विसंगतियों और तनावों के बीच गुजरते वक्त के साथ आसियान की भूमिका व्यापक और प्रभावी हो रही है। माना जा रहा है कि 2050 तक यूरोपीय संघ, अमेरिका और चीन के बाद आसियान के चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था होने का अनुमान है। भारत की बात करें तो पिछले डेढ़ दशक के दौरान आसियान देशों से भारत में लगभग छः लाख करोड़ रुपए से अधिक का निवेश किया है। आज की तारीख में भारत का आसियान के साथ व्यापार, भारत के विश्व व्यापार का लगभग 11 प्रतिशत से अधिक है। लेकिन यहां ध्यान देना होगा कि उस अनुपात में आसियान भारत में अपने विश्व व्यापार का सिर्फ 2 प्रतिशत ही व्यापार करता है। ऐसे में भारत को व्यापारिक संतुलन स्थापित करने के लिए सेवा क्षेत्र में व्यापार के लिए ठोस पहल करनी चाहिए। लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि आसियान देशों का झुकाव पश्चिमी देशों की ओर अधिक है। गौर करें तो इंडोनेशिया के अलावा आसियान के अन्य सदस्य देश मसलन मलेशिया, सिंगापुर, फिलिपीन एवं थाईलैंड पश्चिमी देशों के साथ सुरक्षात्मक समझौते से जुड़े हुए हैं। उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के अनेक मुद्दों पर ही नहीं, बल्कि हिंदचीन मसले पर भी पश्चिमी शक्तियों का साथ दिया है। हालांकि मौजुदा परिस्थितियां अब पहले जैसी नहीं रही। बदलते वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में भारत की भूमिका बढ़ी है। आज भारत दुनिया के सबसे बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है और सभी क्षेत्रों में तेज गति से विकास कर रहा है। इससे प्रभावित होकर ही आसियान देशों ने जनवरी 1992 में 4 क्षेत्रों में ‘क्षेत्रक वार्ताकार सहयोगी’ और दिसंबर 1995 में ‘पूर्ण वार्ताकार सहयोगी’ का दर्जा दिया। 23 जुलाई, 1996 को भारत सामरिक दृष्टिकोण से बनाए गए ‘आसियान क्षेत्रीय मंच’ (एआरएफ) का भी सदस्य बना। इसके अलावा आर्थिक सहयोग को क्रियान्वित करने के लिए संस्थागत कार्यप्रारुप उपलब्ध कराने के उद्देश्य से भारत एवं आसियान ने 8 अक्टुबर, 2003 को कार्यप्रारुप समझौता अथवा व्यापाक आर्थिक समझौता यानी सीईसीए पर हस्ताक्षर किए। हालांकि भारत अभी ‘एशिया-प्रशांत आर्थिक सहयोग आयोग’ एवं ‘प्रशांत आर्थिक सहयोग आयोग का सदस्य नहीं है फिर भी आसियान का सहयोगी वार्ताकार एव ‘आसियान क्षेत्रीय मंच’ का सदस्य होने से इस क्षेत्र के सभी देशों से उसके संबंध मधुर हैं। भारत आसियान संबंधों की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि दोनों पक्षों के बीच बैंकाक में 13 अगस्त 2009 को हुआ भारत-आसियान मुक्त व्यापार समझौता (एएफटीए) है जो 1 जनवरी 2010 से लागू है। इस समझौते में आपसी व्यापार की लगभग 80 प्रतिशत वस्तुओं (कुल 4000) पर व्यापार शुल्क न्यूनतम स्तर पर करने पर सहमति हुई। लेकिन भारत के संदर्भ में विचार करें तो आर्थिक असंतुलन की स्थिति उत्पन हुई है जिसकी समीक्षा किए जाने की जरुरत है। आसियान की पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो यह ग्यारह दक्षिण पूर्व एशियाई देशों का समूह है, जो आपस में आर्थिक विकास एवं समृद्धि को बढ़ावा देने और क्षेत्र में शांति तथा स्थिरता स्थापित करने के लिए काम करते हैं। इसकी स्थापना 8 अगस्त, 1967 को थाईलैंड की राजधानी बैंकाक में की गयी। इसके संस्थापक सदस्य देश थाईलैंड, इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलिपींस, सिंगापुर के विदेश मंत्रियों ने बैंकॉक में घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर किए थे। तब इसका मुख्य मकसद साम्यवाद से बचना और सदस्य देशों के बीच आर्थिक भागीदारी को बढ़ावा देना था। लेकिन बदलते वैश्विक परिदृश्य में आसियान का मकसद पहले से कहीं ज्यादा व्यापक, प्रभावी और संतुलनकारी है।

(लेखक राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं)




