लेखक:मंगला मिश्रा
रिजर्वेशन में शामिल जातियों को धर्म बदलने पर आरक्षण की सुविधा समाप्त हो जाएगी. सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि हिंदू धर्म से इस्लाम या किसी अन्य गैर हिंदू धर्म में धर्मांतरण करने पर व्यक्ति को पूर्व की जाति के आधार पर आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा. यह फैसला तमिलनाडु सरकार की याचिका खारिज करते हुए दिया गया. तमिलनाडु सरकार ने एससी, ओबीसी और अति पिछड़े वर्गों से इस्लाम अपनाने वाले लोगों को पिछड़े मुस्लिम वर्ग के तहत आरक्षण देने का प्रावधान किया था. इस आदेश को मद्रास हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया था. इसी के खिलाफ यह याचिका लगाई गई थी. सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को सही ठहराया. सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि हिंदू सामाजिक व्यवस्था का पिछड़ापन धर्म बदलने के बाद दूसरे धर्म की सामाजिक व्यवस्था में स्वतः लागू नहीं होता. संविधान के अंतर्गत अनुसूचित जाति आदेश 1950 के तहत अनुसूचित जाति का दर्जा केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के मानने वालों को ही मिलता है. सुप्रीम कोर्ट ने एक अन्य मामले में दोहराया है कि ईसाई धर्म अपनाने पर एससी दर्जा और एससी, एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम का संरक्षण तुरंत समाप्त हो जाएगा. धर्मांतरण एक सामाजिक और राजनीतिक समस्या के रूप में हमारे सामने विद्यमान है. खासकर दलित, पिछड़े और वंचित जातियों को लालच में धर्मांतरण कराने के प्रयास किए जाते हैं. अब तो विभिन्न राज्यों में धर्मांतरण के खिलाफ़ सख्त कानून लाए गए हैं. सुप्रीम कोर्ट के इस स्पष्टीकरण से धर्मांतरण पर भी रोक लगेगी. हिंदू समाज को भी संरक्षण मिलेगा. इसके साथ ही रिजर्वेशन का दुरुपयोग रुकेगा. रिजर्वेशन का लाभ संविधान की मंशा के मुताबिक हिंदुओं की उन्हीं जातियों को मिलेगा जिनके लिए इसको लागू किया गया है. आरक्षण पर जो भी प्रावधान देश में प्रभावशील है, सब सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर ही आधारित हैं. सरकारें तो इसको चुनावी लाभ के लिए हथियार के रूप में उपयोग करती हैं. सुप्रीम कोर्ट इसे संविधान और कानून की नजर से देखता है. रिजर्वेशन पर अभी कई मामले सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं, जिसमें सबसे महत्वपूर्ण मामला एससी, एसटी वर्ग में क्रीमीलेयर की व्यवस्था लागू करने से जुड़ा हुआ है. धर्मांतरण पर अगर आरक्षण की सुविधा रोकी जा सकती है तो फिर धनांतरण पर भी इसे लागू होना जरूरी है. जैसे धर्म बदलने पर आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा. वैसे ही आरक्षित श्रेणी में जिनका धनांतरण हो गया है, उनको आरक्षण मिलना संविधान का उल्लंघन है. संविधान के तहत आरक्षण जाति के साथ ही वंचित, शोषित और पिछड़े लोगों के लिए है. जिन भी जातियों पर आरक्षण की व्यवस्था लागू है, उनमें जो संपन्न हो गए हैं, उनको लगातार आरक्षण मिलते रहना उस व्यवस्था का दुरुपयोग नहीं तो क्या है. आरक्षण की समीक्षा की बात इसीलिए की जाती है, कि यह पता लग सके कि इसका लाभ क्या वास्तविक रूप से गरीबों तक पहुंचा है. अब तक तो ऐसा ही होता रहा है, कि आरक्षित जातियों में भी कुछ खास परिवार ही इसका लगातार लाभ उठाते रहे हैं. ऐसी जातियों के जिन लोगों के पास पढ़ाई-लिखाई की सुविधा है, जो बेहतर शिक्षा के लिए धन खर्च करने की क्षमता रखते हैं, वही बार-बार उसका लाभ उठाते हैं. आरक्षण का लाभ उठाकर जिन जातियों के कुछ लोग और परिवार सांसद, विधायक, मंत्री, मुख्यमंत्री, आईएएस, आईपीएस और बड़े-बड़े पदों पर पहुंच गए हैं, उनको रिजर्वेशन लगातार मिलते रहना इस व्यवस्था का खुला दुरुपयोग है. भारत की राष्ट्रपति आदिवासी महिला हैं. कई राज्यों में मुख्यमंत्री, एससी,एसटी, ओबीसी समुदाय से हैं. कई जिलों के कलेक्टर, कमिश्नर और पुलिस कप्तान आरक्षण का लाभ लेकर बने हैं. ऐसे परिवारों को लगातार आरक्षण क्यों मिलना चाहिए. जो संविधान की मंशा के मुताबिक गरीब बचे ही नहीं हैं. उनको आरक्षण नहीं मिले ऐसी व्यवस्था करना संविधान का सम्मान होगा. लोकतंत्र बहुमत की राजनीति पर चलता है. रिजर्वेशन उसमें एक हथियार जैसा उपयोग होता है. युवाओं का एक समूह रिजर्वेशन की समीक्षा का मामला सोशल मीडिया पर जोर-शोर से उठा रहा है. यह कोई कंफ्रंटेशन का विषय नहीं है, जो लोग आरक्षण का लाभ उठाकर आगे आ चुके हैं, उन्हें खुद इसको छोड़ना चाहिए. इसका लाभ उनकी जाति के गरीब और वास्तविक लोगों को मिले. राजनीतिक दलों से तो उम्मीद नहीं की जा सकती है. हर दल एक दूसरे को चुनावी पटखनी देने के लिए इसका उपयोग दुरुपयोग करने से पीछे नहीं रहता है. सुप्रीम कोर्ट का बंधन नहीं होता तो अब तक आरक्षण की पचास प्रतिशत सीमा को भी राजनीतिक प्रक्रिया में समाप्त कर दिया गया होता. रिजर्वेशन के मामले में न्याय संगत फैसले की उम्मीद केवल सुप्रीम कोर्ट से है. आरक्षित और अनारक्षित वर्गों के बीच का यह संघर्ष नहीं है. अब यह मामला आरक्षित जातियों के बीच में गहराता जा रहा है. जब आरक्षित जाति का गरीब व्यक्ति गरीबी में जीवन-यापन करने के लिए मजबूर है. उसी जाति का साधन और सुविधा संपन्न व्यक्ति लगातार बार-बार आरक्षण का लाभ उठाकर उच्चता हासिल कर रहा है तो फिर जाति के भीतर निराशा होना स्वाभाविक है. आरक्षण में जब गरीबी सबसे मुख्य आधार है, तो फिर क्रीमी लेयर हर आरक्षण में जरूरी है. धर्मांतरण के बाद भी रिजर्वेशन का लाभ उठाने की प्रवृत्ति राजनीतिक कारणों से प्रोत्साहित की जा रही थी. जो भी धर्मांतरण होता है, वह हिंदू समाज से ईसाई और इस्लाम में ही होने की समस्या है. जब भी ऐसा होता है तो राजनीतिक दल वोट बैंक के हिसाब से कदम उठाते हैं. तमिलनाडु में सरकार ने भी ऐसा ही सोचकर आदेश जारी किया था. सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला रिजर्वेशन में सुधार की दिशा में बड़ा कदम है. अब रिजर्वेशन में सबसे बड़ा सुधार गरीबी का आधार को हर हालत में सुनिश्चित करना है. जिन्होंने भी उस सीमा को क्रॉस कर लिया है, उनको रिजर्वेशन की सीमा से बाहर करने में कोई भी विलंब नहीं होना चाहिए.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)




