लेखक:मुनेश त्यागी
पूरी दुनिया यूरोप के नौ देशों समेत दूसरे कई देशों में जन असंतोष की आंधियां देख रही है। यूरोप के नौ देशों जैसे फ्रांस, बेल्जियम, स्पेन, इटली, ट्यूनीशिया, पुर्तगाल, यूनान, अल्बानिया और अर्जेंटीना में राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक मोर्चों पर जनता के भारी असंतोष का सामना कर रहे हैं। इन देशों में आगजनी, हिंसा, लूटपाट और धमाकों की घटनाएं देखी जा रही हैं। एक टाउन हॉल को आग के हवाले कर दिया गया है। कई सरकारी और गैर सरकारी इमारतें फूंक दी गई हैं। सैकड़ों दुकानें क्षतिग्रस्त कर दी गई हैं। इन घटनाओं के अनेक कारण हैं जैसे बढ़ती हुई महंगाई, जीवन यापन संकट, सरकारी भ्रष्टाचार, स्कूलों की जर्जर अवस्था, शिक्षा बजट में कमी, शिक्षकों की कमी, लगातार बढ़ता किराया, घरों की कमी, ट्रंप की नीतियों का विरोध, कठोर आर्थिक नीतियां, ईंधन की कमी, नये भूमि कानून, पेंशन की समस्याएं, बढ़ती बेरोजगारी, असुरक्षित भविष्य, बढ़ता कर्ज, घटते वेतन, आजादियों पर हमले और पढाई का बढ़ता खर्च। इन समस्याओं से वहां की जनता का बड़ा हिस्सा पीड़ित है और लगातार कोशिश करने और मांग करने के बाद भी इन समस्याओं के निपटारे पर कोई ध्यान नहीं दिया गया है। जन समस्याओं से पीड़ित और परेशान जनता द्वारा कई टाउन हॉल आग के हवाले कर दिए गए हैं। सरकारी और गैर सरकारी इमारतें आग के हवाले कर दी गई हैं। सैकड़ों दुकानें क्षतिग्रस्त कर दी गई हैं। अधिकारियों के अनुसार 6 लाख से ज्यादा लोग प्रदर्शनों में शामिल रहे हैं। जबकि आयोजकों के अनुसार 8 लाख से ज्यादा लोगों ने प्रदर्शनों में भाग लिया है। 2 हजार से ज्यादा लोगों को हिंसा और लूटपाट के आरोपों में गिरफ्तार कर लिया गया है। 600 से ज्यादा सुरक्षा कर्मी घायल हो चुके हैं। सैकड़ों दुकानों में लूटपाट की गई है। कई शहरों में विरोध प्रदर्शन, हिंसा, दंगे और कर्फ्यू लगाए गए हैं। आंदोलनकारी को नियंत्रण में लेने के लिए गैस और वॉटर कैनन का इस्तेमाल किया जा रहा है। जनता की समस्याओं को लेकर, इन देशों के बहुत से छात्र, नौजवान, मजदूर यूनियनें, किसान संगठन और विपक्षी दल इन प्रदर्शनों में शामिल हैं। इन देशों की कई सरकारें वामपंथियों को इस सबके लिए जिम्मेदार ठहरा रही हैं। बढ़ते जा रहे हालात पर कोई काबू नहीं किया जा रहा है। कई देशों में तो आपातकाल लगाने की बातें की जा रही हैं। यहां पर हकीकत है कि समस्याएं तो कुछ है और बातें कुछ और बनाई जा रही हैं जैसे प्रवासियों के आने को इस सबके लिए जिम्मेदार बताया जा रहा है। इन प्रदर्शनों के असली कारणों पर कोई चर्चा या बात नहीं हो रही है। सरकार और शोषक वर्ग की मुनाफाखोर नीतियों पर प्रभावी चर्चा से दूर भागा जा रहा है। इन पर कोई कारगर बात नहीं हो रही है। शिक्षा विरोधी नीतियों पर, विद्यालयों की जर्जर अवस्था पर और विद्यालयों में शिक्षकों की घटती संख्या पर कोई चर्चा नहीं हो रही है। लगातार बढ़ती बेरोजगारी और बढते जीवन खर्चों पर सही नीतियां नहीं अपनाई जा रही हैं। बढ़ती महंगाई और सरकारी भ्रष्टाचार बेलगाम हैं। किराए आसमान छू रहे हैं। घरों की कमियां मौजूद हैं। जनविरोधी आर्थिक नीतियों के खात्मे पर कोई बातचीत या चर्चा नहीं हो रही है। ईंधन की कमियों को दूर करने पर कोई समुचित बातचीत नहीं हो रही है। नये भूमि कानून बनाने से जनता की समस्याएं बढ़ गई हैं। पेंशन की परेशानियों, कठिनाइयों और समस्याओं पर कोई बात नहीं हो रही है। लगातार बढ़ती जा रही बेरोजगारी से युवक परेशान हैं। उनके माता-पिता परेशान हैं। इन पर भी कोई चर्चा नहीं हो रही है। नौजवानों के असुरक्षित भविष्य, चर्चा और प्रभावी नीतियों से बाहर हैं। लोगों की आजादियां छीनी जा रही हैं और वेतन घटाये जा रहे हैं। इन सभी समस्याओं पर भी कोई कारगर बातचीत करके कोई प्रभावी और कारगर समाधान नहीं निकाले जा रहे हैं। सरकार और प्रशासन जैसे इन सभी समस्याओं से भाग रहे हैं। हालात बता रहे हैं कि इन सभी समस्याओं से आम जनता परेशान है। सरकारी विभाग और पैसे वाले धन-धान्य से परिपूर्ण लोगों को तो जैसे कोई समस्या नहीं है। उनकी मुनाफाखोर नीतियों, शासन प्रशासन और शोषणकारी व्यवस्था और निज़ाम को कोई परेशानी नहीं है। मुनाफाखोर नीतियों और शिक्षा विरोधी नीतियों, बढ़ती जा रही बेरोजगारी और जनता की गरीबी पर, कोई चर्चा नहीं हो रही है। पूंजीवादी साम्राज्यवादी नीतियों की जनविरोधी और जनविनाशकारी प्रभाव की नीतियों से बचने पर और जनता को समुचित राहत देने पर कोई चर्चा नहीं हो रही है। ये समस्त हालात और वहां की सरकारों और शासन प्रशासन की जनविरोधी नीतियां और तौर-तरीकें बता रहे हैं कि जनता को सड़कों पर उतारने और संघर्षों की इन परिस्थितियों के लिए, वहां कि पूंजीवादी साम्राज्यवादी नीतियां, तोर तरीके और मुनाफाखोर शासन प्रणाली जिम्मेदार है। वहां की जनता के पास अब संघर्ष के मैदान में उतरने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचा है। कितना अच्छा हो कि वहां की संघर्षशील जनता इस जन विरोधी शोषणकारी व्यवस्था को बदलने के अभियान को अपना मुख्य मुद्दा बनाये और सबको रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सर्व-कल्याण की वैज्ञानिक समाजवादी नीतियों को अपना मुख्य मुद्दा बनाये और किसानों मजदूरों की सत्ता और सरकार कायम करने की नीतियों को अपनाने की घोषणा करे। ऐसे तौर-तरीकों को अपनाकर की उनकी समस्याओं का कारगर समाधान संभव है।
(लेखक वामपंथी विचारक हैं और यह उनके निजी विचार हैं)




