(मुकेश शर्मा)
(ग्वालियर)
गोहद की ग्राम पंचायत में सरपंच पर वित्तीय अनियमितता के आरोप ग्रामीण बोले – ‘डोंगल बंद करो, जाएंगे हाईकोर्ट‘
सत्ता, पैसा और पंचायत। ये तीन शब्द जब एक साथ आएं तो गांव का सियासी समीकरण बदल जाता है। ऐसा ही कुछ हो रहा है जनपद पंचायत गोहद की ग्राम पंचायत एण्डोरी में। यहां सरपंच श्रीमती सुनीता जाटव पर लगभग 70 लाख रुपये के भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे हैं।
बीते दिवस ग्राम पंचायत के पंच,उपसरपंच, पूर्व सरपंच और दर्जनों ग्रामीणों ने कलेक्टर भिण्ड के सामने एक मोटा ज्ञापन रखा। मांग साफ थी: निष्पक्ष जांच हो, और तब तक सरपंच का डोंगल बंद हो।
ग्रामीणों की शिकायत में सरपंच के साथ उपयंत्री और सहायक यंत्री रोहित उनिया को भी आरोपी बनाया गया है। आरोप है कि पंचायत की सभी योजनाओं में वित्तीय गड़बड़ी की गई।

लेकिन असली विवाद जांच प्रक्रिया से शुरू हुआ। 26 मई 2026 को जनपद ने एक जांच दल बनाया। ग्रामीणों का कहना है कि इसी दल में रोहित उनिया को रखा गया, जिन पर खुद भ्रष्टाचार के आरोप हैं।
मामले ने तब तूल पकड़ा जब पंचायत सचिव रामवीर सिंह चौहान को निलंबित कर दिया गया। सचिव का आरोप है कि उन्होंने नियम विरुद्ध राशि निकालने का विरोध किया था। जवाब में उन पर फर्जी ऑडियो का आरोप लगाकर कार्रवाई कर दी गई। जबकि शिकायत में साफ लिखा है कि सरपंच पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।
शिकायत सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं है इसमें सरपंच के पुत्र राहुल जाटव का एक कथित ऑडियो भी शामिल है। आरोप है कि उसमें अधूरे कामों को बैक डेट में पास कराने की बात है।
दूसरा बड़ा आरोप विधायक केशव देसाई की निधि से जुड़ा है। भौरे का पुरा में श्मशान घाट के लिए मिली राशि का काम आज तक शुरू नहीं हुआ। ग्रामीणों का कहना है कि पैसा आया, पर जमीन पर ईंट नहीं दिखी।
इस सन्दर्भ में गत 29 जून को सचिव ने सरपंच को नोटिस भेजा जिसमें कहा गया कि 3 दिन में या तो काम पूरा दिखाओ या पैसा वापस करो, पर बात नहीं बनी। अब ग्रामीणों ने अंतिम चेतावनी दी है अगर 12 बिंदुओं की निष्पक्ष जांच नहीं हुई तो सीधे ग्वालियर उच्च न्यायालय खण्डपीठ जाएंगे।
इस खबर के लिखे जाने तक कलेक्टर कार्यालय, जिला पंचायत CEO या सरपंच सुनीता जाटव की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं मिली है। उधर प्रशासन का कहना है कि मामला जांच के अधीन है।

एण्डोरी की लड़ाई सिर्फ 70 लाख की नहीं है। ये गांव के भरोसे की लड़ाई है। पंचायत राज का मतलब ही है पारदर्शिता। अगर वही सवालों के घेरे में आ जाए, तो जनता का कोर्ट का दरवाजा खटखटाना लाजिमी है। अब देखना ये है कि प्रशासन जांच को कितनी गंभीरता से लेता है?



