लेखक-अरुंधती राय
ढोंग और दोगलेपन की भी एक सीमा होती है, लेकिन भारतीय राजनीति और सोशल मीडिया के सूरमाओं के लिए शायद वह सीमा कभी बनी ही नहीं। लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन, असहमति और सरकार से सवाल पूछना नागरिक अधिकार हैं, लेकिन जब इन्हीं अधिकारों का इस्तेमाल राजनीतिक सुविधा के हिसाब से होने लगे तो सवाल केवल किसी आंदोलन का नहीं, बल्कि राजनीतिक नैतिकता और सामाजिक सरोकारों की विश्वसनीयता का बन जाता है। आज यही सवाल देश के सामने खड़ा है कि जब किसी परीक्षा में पेपर लीक या अनियमितता का मुद्दा दिल्ली में उठता है तो राजनीतिक दलों, नेताओं और सोशल मीडिया के स्वयंभू युवामसीहाओं की सक्रियता अचानक क्यों बढ़ जाती है, जबकि झारखंड में परीक्षा संबंधी गंभीर आरोपों को लेकर छात्र लंबे समय से आंदोलनरत हों तो वही आवाजें सुनाई क्यों नहीं देतीं?
प्रतियोगी परीक्षाओं में शामिल होने वाला युवा किसी राजनीतिक दल का कार्यकर्ता नहीं होता। वह अपने परिवार की उम्मीदों, वर्षों की मेहनत और सीमित आर्थिक संसाधनों के साथ परीक्षा की तैयारी करता है। एक परीक्षा में अनियमितता उसके लिए महज प्रशासनिक समस्या नहीं, बल्कि उसके कई वर्षों के परिश्रम, समय और भविष्य से जुड़ा सवाल होती है। इसलिए छात्र हित की राजनीति का पैमाना सरकार या राजनीतिक दल देखकर नहीं, बल्कि समस्या की गंभीरता देखकर तय होना चाहिए।
कुछ समय पहले दिल्ली के जंतर-मंतर पर परीक्षा और पेपर लीक से जुड़े मुद्दों को लेकर विरोध प्रदर्शन हुए। इन प्रदर्शनों को राजनीतिक समर्थन मिला और कई बड़े नेताओं ने छात्रों के बीच पहुंचकर उनकी समस्याओं को राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाया। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी जैसे प्रमुख विपक्षी नेताओं की सक्रियता ने इन आंदोलनों को राजनीतिक और मीडिया दोनों स्तरों पर व्यापक दृश्यता दी। सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे से संबंधित पोस्ट, वीडियो और अभियान तेजी से प्रसारित हुए। विपक्ष का सरकार से सवाल पूछना लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है और छात्रों की आवाज उठाना स्वागतयोग्य भी है। लेकिन लोकतंत्र की असली परीक्षा तब होती है जब वही मानदंड अपने राजनीतिक प्रभाव वाले राज्यों या अपने राजनीतिक सहयोगियों की सरकारों के मामले में भी अपनाए जाएं।
यहीं से झारखंड का सवाल सामने आता है। झारखंड में जेपीएससी और जेएसएससी की परीक्षाओं तथा भर्ती प्रक्रिया को लेकर छात्रों और अभ्यर्थियों की ओर से गंभीर आरोप लगाए गए हैं। परीक्षा प्रक्रिया की पारदर्शिता और कथित पेपर लीक जैसे मुद्दों को लेकर छात्र आंदोलन कर रहे हैं। राजधानी रांची में छात्र धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं और सड़क पर रात गुजारने तक की स्थिति सामने आई है। छात्र नेता देवेंद्र नाथ महतो ने भूख हड़ताल का रास्ता अपनाया और उनकी तबीयत बिगड़ने की खबरें सामने आईं। आंदोलन के दबाव के बीच झारखंड लोक सेवा आयोग से जुड़े घटनाक्रम ने भी सवाल खड़े किए हैं। ऐसे में यह पूछना स्वाभाविक है कि जिन नेताओं और सोशल मीडिया हस्तियों ने दिल्ली में युवाओं के अधिकारों की आवाज को राष्ट्रीय मुद्दा बनाया था, उनकी आवाज रांची पहुंचते-पहुंचते इतनी धीमी क्यों पड़ गई?
यहां किसी व्यक्ति या राजनीतिक दल के पक्ष अथवा विपक्ष में खड़े होने के बजाय एक व्यापक सवाल पर विचार होना चाहिए। यदि परीक्षा व्यवस्था में गड़बड़ी का आरोप दिल्ली में छात्रों के भविष्य पर हमला माना जाता है तो वही आरोप झारखंड में छात्रों के भविष्य से कैसे अलग हो जाता है? सरकारी नौकरी की तैयारी करने वाला युवा वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करता है। उसके परिवार का आर्थिक और सामाजिक भविष्य भी अक्सर इसी उम्मीद से जुड़ा होता है। खासकर आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए सरकारी नौकरी केवल रोजगार नहीं, बल्कि सामाजिक सुरक्षा और स्थिर जीवन का माध्यम होती है। ऐसे में किसी परीक्षा में कथित अनियमितता का निष्पक्ष और समयबद्ध समाधान होना जरूरी है।
सरकार कोई भी हो—भाजपा, कांग्रेस, झामुमो या कोई अन्य दल—छात्रों की शिकायतों पर समान संवेदनशीलता अपेक्षित है। यदि विपक्ष में रहते हुए किसी राजनीतिक दल का छात्र हितों के लिए सड़क पर उतरना लोकतंत्र की आवाज है तो सत्ता में उसके सहयोगी दलों की सरकार होने पर भी छात्र हित के सवाल उतने ही महत्वपूर्ण रहने चाहिए। लोकतांत्रिक राजनीति की नैतिकता यही मांग करती है कि सत्ता के समीकरण बदलने से संवेदनशीलता के मानदंड न बदलें।
आज राजनीति केवल संसद और सड़कों तक सीमित नहीं है। सोशल मीडिया ने आंदोलनों को एक नया मंच दिया है। किसी मुद्दे पर कुछ घंटों में वीडियो वायरल हो सकता है, हैशटैग चल सकता है और कोई स्थानीय समस्या राष्ट्रीय चर्चा में बदल सकती है। लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी है। सोशल मीडिया पर मुद्दों की प्राथमिकता कई बार उनकी वास्तविक गंभीरता से ज्यादा उनकी वायरल होने की क्षमता तय करने लगती है। जिस विषय में कैमरा, बड़े चेहरे, राजनीतिक टकराव और लाखों व्यूज की संभावना हो, वह तेजी से चर्चा में आ जाता है। इसके विपरीत दूरदराज के राज्य में महीनों से चल रहा शांतिपूर्ण छात्र आंदोलन सुर्खियों से बाहर रह सकता है।
यहीं तथाकथित ‘सेलेक्टिव एक्टिविज्म’ का प्रश्न पैदा होता है। क्या किसी आंदोलन का समर्थन इसलिए किया जाना चाहिए कि उससे राजनीतिक लाभ मिलता है? क्या किसी छात्र की समस्या तभी राष्ट्रीय मुद्दा बनेगी जब उसके पीछे किसी विपक्षी दल का राजनीतिक हित हो? और क्या किसी राज्य में सत्ता के समीकरण बदलते ही न्याय, पारदर्शिता और युवाओं के अधिकारों की परिभाषा भी बदल जानी चाहिए?
यह सवाल केवल राजनीतिक दलों पर नहीं, बल्कि सोशल मीडिया के उन स्वयंभू इन्फ्लुएंसर्स पर भी लागू होता है जो खुद को युवाओं की आवाज बताते हैं। दिल्ली में कैमरों के सामने छात्रों के अधिकारों की बात करना आसान है, लेकिन रांची के उन छात्रों के बीच पहुंचना कठिन है जो बिना किसी बड़े राजनीतिक चेहरे और बिना किसी चमकदार मंच के अपने भविष्य के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यदि किसी की सक्रियता केवल उन्हीं मुद्दों तक सीमित है जिनसे उसके पसंदीदा राजनीतिक खेमे को फायदा मिलता है या जिनसे सोशल मीडिया पर अधिक व्यूज मिलते हैं, तो इसे निष्पक्ष जनसरोकार कहना मुश्किल है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि देश का युवा किसी राजनीतिक दल की जागीर नहीं है। वह भाजपा की सरकार में भी सवाल पूछ सकता है, कांग्रेस की सरकार में भी और किसी क्षेत्रीय दल की सरकार में भी। युवा को राजनीतिक नारों से अधिक निष्पक्ष व्यवस्था चाहिए। उसे यह भरोसा चाहिए कि परीक्षा में मेहनत करने के बाद उसका परिणाम उसकी योग्यता से तय होगा, न कि किसी पेपर लीक, भ्रष्टाचार या प्रशासनिक लापरवाही से। यह भरोसा टूटता है तो नुकसान केवल कुछ अभ्यर्थियों का नहीं होता, बल्कि पूरी प्रतियोगी परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।
इसलिए झारखंड के छात्रों की मांगों की राजनीतिक उपयोगिता तलाशने के बजाय उनकी शिकायतों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। यदि आरोप गलत हैं तो तथ्यों के साथ स्थिति स्पष्ट की जाए और यदि गड़बड़ी हुई है तो दोषियों के खिलाफ कार्रवाई हो। छात्रों को लंबे समय तक अनिश्चितता में छोड़ देना किसी भी सरकार या आयोग के हित में नहीं है।
राजनीति में विरोध करना आसान है, लेकिन अपने राजनीतिक मित्रों और सहयोगियों से सवाल पूछना कठिन। विपक्ष में रहकर सरकार को कठघरे में खड़ा करना लोकतंत्र का सामान्य हिस्सा है, लेकिन सत्ता के निकट होने पर भी जनता की आवाज सुनना राजनीतिक चरित्र की असली परीक्षा है। यही कसौटी सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स पर भी लागू होती है। यदि कोई स्वयं को युवाओं की आवाज बताता है तो उसे यह साबित करना होगा कि उसकी सक्रियता कैमरे और ट्रेंडिंग हैशटैग की मोहताज नहीं है।
जंतर-मंतर और रांची के बीच दूरी केवल भौगोलिक नहीं है। यह उस राजनीतिक और सामाजिक मानसिकता की दूरी का प्रतीक बन सकती है जिसमें एक जगह छात्र की पीड़ा राष्ट्रीय मुद्दा बन जाती है और दूसरी जगह वही पीड़ा राजनीतिक सुविधा के कारण हाशिए पर चली जाती है। लोकतंत्र में किसी भी आंदोलन को समर्थन देना या न देना राजनीतिक दलों का अधिकार हो सकता है, लेकिन छात्रों के अधिकारों के लिए दोहरे मानदंड अपनाना लोकतांत्रिक नैतिकता पर सवाल जरूर खड़ा करता है।
आज जरूरत यह पूछने की नहीं है कि सरकार किसकी है, बल्कि यह पूछने की है कि छात्र के साथ न्याय हुआ या नहीं। जंतर-मंतर हो या रांची, दिल्ली हो या झारखंड—पेपर लीक का आरोप हो या परीक्षा व्यवस्था में किसी दूसरी तरह की अनियमितता—मानदंड एक ही होना चाहिए: छात्र की मेहनत का सम्मान, परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई।
क्योंकि युवा का भविष्य किसी पार्टी का राजनीतिक पोस्टर नहीं है। यदि राजनीति सचमुच युवाओं के साथ खड़ी है तो उसकी आवाज सत्ता की सुविधा देखकर नहीं, सिद्धांत देखकर उठनी चाहिए। यही अंतर वास्तविक जनसरोकार और ‘सेलेक्टिव क्रांति’ के बीच है।
जंतर-मंतर पर क्रांति और रांची में शांति क्यों? यह सवाल केवल नेताओं से नहीं, बल्कि उन तमाम लोगों से भी पूछा जाना चाहिए जो हर दूसरे मुद्दे पर युवाओं के अधिकारों और लोकतंत्र की दुहाई देते हैं। लोकतंत्र की विश्वसनीयता तभी बचेगी जब छात्र के दर्द को राजनीतिक चश्मे से नहीं, न्याय के चश्मे से देखा जाएगा। देश का युवा अब केवल नारों और कैमरे की चमक नहीं, बल्कि समान व्यवहार और वास्तविक जवाबदेही चाहता है।

(लेखक स्वतन्त्र पत्रकार हैं)





