लेखक-संजय राय
मुंबई में अगर किसी दिन “जे.जे.” नाम अचानक गायब हो जाए, तो शहर की पहचान अधूरी लगने लगे।
जे.जे. अस्पताल, जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट, जे.जे. कॉलेज ऑफ आर्किटेक्चर, महिम कॉज़वे, चरनी रोड… इन जगहों से हर दिन लाखों लोग गुजरते हैं। लेकिन कितने लोग जानते हैं कि इन सबके पीछे एक ऐसे भारतीय का हाथ था, जिसने अपनी दौलत को कभी अपनी ताकत नहीं, बल्कि समाज की अमानत माना।
आज जब उद्योगपतियों की चर्चा उनके अरबों रुपये के घरों, निजी विमानों, महंगी शादियों और दुनिया भर में फैले कारोबारी साम्राज्य के कारण होती है, तब उन्नीसवीं शताब्दी का एक पारसी व्यापारी हमें यह याद दिलाता है कि धन की सबसे बड़ी ताकत उसका प्रदर्शन नहीं, उसका सदुपयोग है। जिस दौर में अंग्रेज भारत पर शासन कर रहे थे, उस दौर में एक भारतीय व्यापारी ने ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया, जिसे आज भी परोपकार का सर्वोच्च मानक माना जाता है। उनका नाम था—सर जमशेदजी जीजीभॉय।
15 जुलाई 1783 को बॉम्बे में जन्मे जमशेदजी किसी रईस खानदान में पैदा नहीं हुए थे। उनके पिता मेरवानजी एक साधारण कपड़ा व्यापारी थे। लेकिन किस्मत ने कम उम्र में ही उन्हें सबसे बड़ा आघात दिया। मात्र 16 वर्ष की आयु में माता-पिता दोनों का निधन हो गया। सिर से परिवार का साया उठ गया और जीवन संघर्ष के भरोसे रह गया। मामा फ्रामजी नसरवानजी बाटलीवाला ने उन्हें सहारा दिया, लेकिन आगे का रास्ता उन्हें स्वयं बनाना था।
उन्होंने किसी बड़े कारोबारी के बेटे की तरह व्यापार नहीं संभाला। उनकी शुरुआत एक साधारण क्लर्क के रूप में हुई। सर रोजेरियो डी फारिया के व्यापारिक प्रतिष्ठान में काम करते हुए उन्होंने समुद्री व्यापार की बारीकियां सीखीं। जल्द ही चीन की यात्राएं शुरू हुईं। उस समय समुद्री यात्रा का अर्थ था—तूफान, महामारी, समुद्री डाकू, युद्ध और हर पल मौत का खतरा। लेकिन जोखिम उठाने वालों का इतिहास अलग होता है।
1805 की एक यात्रा ने उनकी जिंदगी बदल दी। चीन जाते समय उनके जहाज को फ्रांसीसी नौसेना ने पकड़ लिया। उन्हें युद्धबंदी बनाकर केप ऑफ गुड होप ले जाया गया। कई महीने कैद में बिताने के बाद वे किसी तरह डेनिश जहाज से कलकत्ता पहुंचे। यह अनुभव किसी भी व्यक्ति का साहस तोड़ सकता था, लेकिन जमशेदजी ने हार मानने के बजाय फिर समुद्र का रास्ता चुना। शायद उन्हें मालूम था कि बड़ी मंजिलें डरने वालों को नहीं मिलतीं।
लगातार मेहनत, ईमानदारी और व्यावसायिक सूझबूझ ने उन्हें शीघ्र ही भारत के सबसे सफल व्यापारियों की श्रेणी में ला खड़ा किया। चीन के साथ व्यापार, अपनी शिपिंग कंपनी और विशाल कारोबारी नेटवर्क के बल पर मात्र चालीस वर्ष की आयु तक वे दो करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति के स्वामी बन चुके थे। उस समय यह संपत्ति किसी रियासत के खजाने के बराबर मानी जाती थी। तत्कालीन गवर्नर लॉर्ड एल्फिन्स्टोन ने उनकी सत्यनिष्ठा और व्यापारिक नैतिकता की सार्वजनिक प्रशंसा की थी।
लेकिन उनकी असली महानता यहीं से शुरू होती है।
उन्होंने अपनी दौलत को निजी ऐश्वर्य का साधन नहीं बनने दिया। बचपन की गरीबी ने उन्हें यह एहसास कराया था कि अभाव कैसा होता है। इसलिए उन्होंने तय किया कि उनकी संपत्ति का सबसे बड़ा हक समाज का है। 1822 में उन्होंने बॉम्बे की सिविल जेल में बंद गरीब कैदियों का कर्ज चुकाकर उन्हें रिहा कराया। यह उनके परोपकार की शुरुआत थी, जो फिर कभी नहीं रुकी।
मुंबई आज जिस महिम कॉज़वे पर सहजता से चलती है, वह कभी लोगों के लिए बड़ी परेशानी का कारण था। ब्रिटिश सरकार ने पुल बनाने से हाथ खड़े कर दिए। तब उनकी पत्नी लेडी अवाबाई जीजीभॉय ने अपने निजी धन से पुल बनवाया। आज भी वह पुल इस बात का साक्षी है कि जब सत्ता पीछे हट जाती है, तब संवेदनशील समाज आगे बढ़कर इतिहास रचता है।
सर जे.जे. अस्पताल, ग्रांट मेडिकल कॉलेज, जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट, जे.जे. कॉलेज ऑफ आर्किटेक्चर और अनेक शैक्षणिक एवं चिकित्सकीय संस्थाएं उनकी दूरदर्शिता की जीवित मिसाल हैं। उन्होंने समझ लिया था कि किसी समाज का भविष्य केवल व्यापार से नहीं, बल्कि शिक्षा और स्वास्थ्य से बदलता है।
चरनी रोड की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। अंग्रेज सरकार ने पशु चराने पर कर लगा दिया था। गरीब पशुपालकों के सामने संकट खड़ा हो गया। तब जमशेदजी ने अपनी जमीन खरीदकर उसे निःशुल्क चरागाह बना दिया। मराठी में चरने की जगह को “चरनी” कहा जाता है और वही नाम आज मुंबई के एक प्रमुख रेलवे स्टेशन की पहचान बन चुका है।
उनकी उदारता की कोई धार्मिक सीमा नहीं थी। पारसी होते हुए भी उन्होंने हिंदू, मुस्लिम, ईसाई और पारसी—सभी की समान रूप से सहायता की। कुएं, धर्मशालाएं, अस्पताल, स्कूल, जलाशय, अकाल पीड़ितों की सहायता, आग और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं में खुलकर दान—जहां कहीं इंसानियत संकट में दिखी, वहां जमशेदजी का हाथ सबसे पहले पहुंचा।
1855 में क्रीमियन युद्ध के दौरान उन्होंने घायल सैनिकों की सहायता के लिए दान दिया, लेकिन साथ ही युद्ध की निरर्थकता पर जो विचार रखे, वे आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। उन्होंने कहा था कि युद्ध इतिहास में भले गौरवशाली दिखता हो, लेकिन उसकी असली तस्वीर भूख, खून, आंसू और विनाश है। अगर युद्धों पर खर्च होने वाला धन मानव कल्याण पर लगाया जाए तो दुनिया कहीं अधिक सुखी हो सकती है।
उनकी संवेदना मनुष्यों तक सीमित नहीं थी। उन्होंने बॉम्बे पिंजरापोल के माध्यम से बेसहारा पशुओं के संरक्षण का भी बीड़ा उठाया। उनके लिए दया का अर्थ हर जीव के प्रति करुणा था।
1842 में उन्हें ‘नाइट’ और 1857 में ‘बैरोनेट’ की उपाधि मिली। यह सम्मान पाने वाले वे पहले भारतीय थे। लेकिन इन उपाधियों ने उनके जीवन में अहंकार का एक कण भी नहीं जोड़ा। वे पहले की तरह सादगी से जीते रहे और समाज सेवा को ही अपना सबसे बड़ा कर्तव्य मानते रहे।
14 अप्रैल 1859 को जब सर जमशेदजी जीजीभॉय का निधन हुआ, तब मुंबई ने केवल एक उद्योगपति नहीं खोया था, बल्कि एक ऐसा संरक्षक खोया था जिसने शहर की आत्मा को आकार दिया था।
आज जब हम ऐसे दौर में जी रहे हैं, जहां सफलता का पैमाना अक्सर अरबों की संपत्ति, गगनचुंबी इमारतें और भव्य जीवनशैली बन गया है, तब जमशेदजी जीजीभॉय की कहानी एक जरूरी सवाल पूछती है—क्या किसी इंसान की महानता उसकी कमाई से तय होती है, या इस बात से कि उसने अपनी कमाई से कितनी जिंदगियां बदलीं?
मुंबई का इतिहास इस सवाल का जवाब बहुत पहले दे चुका है। इसलिए आज भी इस शहर में “जे.जे.” केवल एक नाम नहीं, बल्कि इंसानियत, करुणा और लोकसेवा का ऐसा प्रतीक है, जिसे समय कभी पुराना नहीं कर सकता।

(लेखक आज अख़बार में नेशनल ब्यूरो हैं)




